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अजनबी संग चु@@ई

होटल के उस आलीशान कमरे की खिड़की से बाहर पहाड़ों की धुंधली वादियाँ साफ़ नज़र आ रही थीं, लेकिन स्नेहा का मन वहाँ की शांति में नहीं बल्कि अपनी ही उलझनों में अटका हुआ था। उसने अपने शरीर पर एक कश्मीरी रेशम की मैक्सी पहन रखी थी, जो उसके उभारों को बखूबी बयां कर रही थी। स्नेहा की उम्र बत्तीस साल थी, लेकिन उसका यौवन किसी कच्ची कली की तरह आज भी महक रहा था, जिसके अंगों की बनावट किसी भी मर्द को दीवाना बनाने के लिए काफी थी। उसके शरीर के ऊपरी हिस्से में मौजूद दो रसीले तरबूज मैक्सी के पतले कपड़े के नीचे से अपनी मौजूदगी का एहसास करा रहे थे, मानो वो आज़ाद होने के लिए छटपटा रहे हों।

स्नेहा की कद-काठी एकदम सुडौल थी, उसकी कमर पतली और कूल्हे भारी थे, जो चलते समय एक मदहोश कर देने वाली लय पैदा करते थे। उसके तरबूजों के बीच की गहरी घाटी और उन पर उभरे हुए छोटे-छोटे मटर जैसे दाने उसकी उत्तेजना को छिपा नहीं पा रहे थे। तभी बगल वाले कमरे का दरवाज़ा खुला और एक लंबा, गठीले बदन वाला युवक बाहर निकला, जिसका नाम समीर था। समीर की चौड़ी छाती और उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जिसने पहली ही नज़र में स्नेहा के भीतर एक सिहरन पैदा कर दी। स्नेहा ने उसे देखा और एक पल के लिए दोनों की नज़रें मिलीं, जिससे हवा में एक अनकहा सा तनाव घुल गया।

बातों का सिलसिला शुरू हुआ जब समीर ने उससे बालकनी का दरवाज़ा ठीक करने में मदद माँगी। जैसे ही समीर स्नेहा के करीब आया, उसकी मर्दाना खुशबू स्नेहा के नथुनों में समा गई, जिससे उसकी साँसों की गति तेज़ हो गई। समीर ने गौर किया कि स्नेहा की मैक्सी के नीचे उसके तरबूज तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहे थे, जो उसके मन की बेचैनी और बढ़ते आकर्षण का सबूत थे। दोनों के बीच एक अनकहा खिंचाव था, जो किसी चुंबक की तरह उन्हें एक-दूसरे की ओर खींच रहा था। स्नेहा को अपनी झिझक और समाज की परवाह महसूस हो रही थी, लेकिन उसका मन उस अनजान पुरुष के स्पर्श के लिए लालायित हो रहा था।

धीरे-धीरे बातों का दौर रूम के अंदर तक पहुँच गया, जहाँ मद्धम रोशनी और ठंडी हवा ने माहौल को और भी कामुक बना दिया था। समीर ने धीरे से स्नेहा के कंधे पर अपना हाथ रखा, और उस पहले स्पर्श ने स्नेहा के पूरे बदन में बिजली की एक लहर दौड़ा दी। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और समीर के हाथ की गरमी को अपने रेशमी बदन पर महसूस किया। समीर ने अपने हाथों को धीरे-धीरे नीचे सरकाया और उसके भारी तरबूजों के पास ले आया, जिससे स्नेहा के मुँह से एक हल्की सी आह निकल गई। उसकी मटर जैसी कलियाँ अब पूरी तरह से सख्त हो चुकी थीं, जो समीर की उंगलियों के नीचे अपनी कठोरता का एहसास करा रही थीं।

समीर ने अपनी उंगलियों से उन मटरों को सहलाना शुरू किया, जिससे स्नेहा के भीतर दबी हुई इच्छाएँ ज्वालामुखी की तरह फटने को तैयार हो गईं। उसने समीर के गले में अपनी बाहें डाल दीं और उसके चेहरे को अपने पास खींच लिया। समीर ने स्नेहा के होंठों पर अपना अधिकार जमा लिया और उनका मधुर रस लेने लगा, जिससे स्नेहा का शरीर धनुष की तरह तन गया। उसके हाथ समीर के मज़बूत कंधों को जकड़ रहे थे, जबकि समीर का एक हाथ अब स्नेहा की मैक्सी के नीचे उसकी रेशमी जांघों को सहलाते हुए ऊपर की ओर बढ़ रहा था, जहाँ उसकी गहरी खाई उसका इंतज़ार कर रही थी।

स्नेहा की खाई अब पूरी तरह से गीली हो चुकी थी, जिसका रस उसकी जांघों तक पहुँचने को बेताब था। समीर ने जब अपनी उंगलियां उस खाई के बालों के बीच फंसाई, तो स्नेहा की कराह पूरे कमरे में गूँज उठी। वह अपनी कमर को ऊपर-नीचे हिलाने लगी, मानो वह समीर से और अधिक की मांग कर रही हो। समीर ने धीरे से अपनी एक उंगली को उस खाई के अंदर उतारा, जिससे स्नेहा को एक अनूठा सुख मिला। उसने अपनी उंगली से खोदना शुरू किया, जिससे स्नेहा का पूरा बदन कांपने लगा और उसके मुँह से समीर का नाम बार-बार निकलने लगा।

अब समीर ने अपनी पैंट की जिप खोली और अपना विशाल और सख्त खीरा बाहर निकाला, जो उत्तेजना के मारे फड़फड़ा रहा था। स्नेहा ने जब उस विशाल खीरे को देखा, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं, वह इतना लंबा और मोटा था कि उसे देखकर ही स्नेहा का आधा रस निकल गया। समीर ने स्नेहा को धीरे से बेड पर लेटाया और उसके दोनों तरबूजों को अपने हाथों में भरकर उन्हें मसलने लगा। वह बारी-बारी से उन मटरों को अपने मुँह में लेकर चूसने लगा, जिससे स्नेहा की उत्तेजना अपने चरम पर पहुँच गई और वह बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींचने लगी।

समीर ने स्नेहा की टांगों को फैलाया और अपने खीरे के अगले हिस्से को उसकी खाई के मुहाने पर टिका दिया। स्नेहा ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और समीर को अंदर आने का इशारा किया। जैसे ही समीर ने एक ज़ोरदार धक्का दिया, उसका पूरा खीरा स्नेहा की संकरी खाई को चीरता हुआ गहराई तक समा गया। स्नेहा के मुँह से एक तीखी चीख निकली, जो दर्द और सुख का एक अनोखा मिश्रण थी। समीर ने रुकने के बजाय अपनी खुदाई की गति बढ़ा दी, वह पूरी ताकत से स्नेहा के भीतर अपने खीरे को उतार रहा था, जिससे कमरे में मांस के टकराने की आवाज़ें आने लगीं।

खुदाई की यह प्रक्रिया बहुत ही लयबद्ध और तीव्र थी, समीर हर धक्के के साथ स्नेहा के गर्भाशय को छू रहा था। स्नेहा अब पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी, वह समीर के झटकों के साथ अपनी कमर ऊपर उठा रही थी ताकि खुदाई और भी गहरी हो सके। समीर ने उसे घुमाया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, जिससे स्नेहा को एक नया और अलग तरह का आनंद मिलने लगा। उसके भारी कूल्हे समीर के हर धक्के के साथ थरथरा रहे थे, और उसके तरबूज बेड पर लटकते हुए झूल रहे थे। समीर ने उसके बालों को मुट्ठी में पकड़ा और पूरी जंगली ताकत के साथ उसे खोदता रहा।

अंत में, दोनों ही अपनी चरम सीमा पर पहुँच गए थे। समीर के खीरे ने गर्म रस की फुहारें स्नेहा की खाई की गहराई में छोड़ दीं, और उसी समय स्नेहा का भी सारा रस निकल गया। दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़ गए, पसीने से लथपथ और हाफते हुए। उस रात की उस गहरी खुदाई ने उनके बीच एक ऐसा बंधन बना दिया था जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल था। स्नेहा ने महसूस किया कि उसका रोम-रोम शांत हो चुका है, लेकिन उसके भीतर की वह प्यास आज पहली बार सही मायने में बुझी थी। वह समीर के सीने पर सिर रखकर सो गई, जबकि बाहर पहाड़ों की हवा अब भी वही मदहोश करने वाली खुशबू बिखेर रही थी।

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