दोपहर की उस तपती हुई खामोशी में पूरा घर जैसे नींद की आगोश में डूबा हुआ था, लेकिन करण की आँखों में नींद का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं था। वह अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ा बाहर की लू को देख रहा था, पर उसका मन कहीं और ही भटक रहा था। बगल के कमरे में उसकी जवान भाभी संगीता आराम कर रही थीं, जिनके साथ उसका रिश्ता हमेशा से ही आदर और एक छिपी हुई कशिश के बीच झूलता रहा था। संगीता की उम्र करीब तीस साल रही होगी, लेकिन उनका शरीर किसी कच्ची कली की तरह खिला हुआ और मांसल था, जो हर देखने वाले के मन में हलचल पैदा कर देता था। करण अक्सर उन्हें चोरी-छिपे देखता और अपनी कल्पनाओं में उनके साथ उन वर्जित गलियों की सैर करता जहाँ जाना उसके लिए मुमकिन नहीं था।
संगीता भाभी के शरीर की बनावट किसी तराशी हुई मूरत जैसी थी, उनका कद मध्यम था लेकिन उनके अंग-प्रत्यंग में एक अजीब सी उत्तेजना भरी हुई थी। उनके सीने पर सजे दो विशाल और रसीले तरबूज किसी को भी अपनी ओर खींचने की कुव्वत रखते थे, जो साड़ी के तंग ब्लाउज से बाहर निकलने को बेताब दिखते थे। जब भी वह चलतीं, उनके भारी तरबूज हल्की सी थरथराहट पैदा करते, जिसे देख करण के अंदर एक अजीब सा तूफ़ान उठ खड़ा होता। उनका पिछवाड़ा भी काफी भरा हुआ और गोल था, जो साड़ी के कपड़े को टाइट कर देता था और उनकी कमर के लचीलेपन को और भी कामुक बना देता था। उनके चेहरे की मासूमियत और उनकी आँखों की गहराई किसी को भी मदहोश करने के लिए काफी थी।
उस दिन घर में उन दोनों के अलावा और कोई नहीं था, और यही वह पल था जिसका करण को शायद बरसों से इंतज़ार था। उसने धीरे से संगीता भाभी के कमरे का दरवाजा खटखटाया, तो अंदर से एक बहुत ही मधुर और सुरीली आवाज़ आई, जिसने उसे अंदर आने की इजाजत दे दी। संगीता भाभी बिस्तर पर अधलेटी अवस्था में थीं, उनकी साड़ी का पल्लू एक तरफ सरका हुआ था जिससे उनके एक रसीले तरबूज का ऊपरी हिस्सा और उस पर मौजूद छोटा सा मटर नुमा उभार साफ नजर आ रहा था। करण को देखते ही उन्होंने अपनी साड़ी को सँभालने की कोशिश की, लेकिन उनकी आँखों में एक शरारत भरी चमक थी जिसने करण के इरादों को और भी मजबूती दे दी।
करण ने पास जाकर बैठने का बहाना ढूँढा और उनकी पीठ में हो रहे दर्द की बात छेड़ दी, जिस पर संगीता ने भी सहमती जताई। जैसे ही करण ने अपना हाथ उनकी कमर पर रखा, उसे संगीता के रेशमी बदन की गर्माहट महसूस हुई और उसके रोंगटे खड़े हो गए। वह धीरे-धीरे उनकी पीठ को सहलाने लगा, और उसकी उंगलियाँ साड़ी के नीचे छिपी उनकी कोमल त्वचा को छूने लगीं। संगीता की साँसें तेज होने लगी थीं और उनकी आँखों में एक ऐसी प्यास झलक रही थी जिसे शब्द बयां नहीं कर सकते थे। झिझक का वह पर्दा धीरे-धीरे गिर रहा था और दोनों के बीच का आकर्षण अब एक ज्वालामुखी की तरह फटने को तैयार था।
करण का हाथ अब धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए उनके पेट के नीचे की ओर जाने लगा, और उसने महसूस किया कि संगीता अब विरोध नहीं कर रही थीं। उनके शरीर में एक सिहरन दौड़ रही थी और उनकी आँखें बंद होने लगी थीं। करण ने हिम्मत जुटाकर उनके होठों पर अपने होठ रख दिए, और उन गुलाबी पंखुड़ियों का रसपान करने लगा। संगीता ने भी अपनी बाहें उसके गले में डाल दीं और उसे अपनी ओर और जोर से खींच लिया। इस मधुर मिलन ने उनके बीच की सारी दूरियों को मिटा दिया था और अब वे दोनों वासना के उस समुद्र में गोते लगाने के लिए तैयार थे जहाँ सिर्फ जिस्मों की भाषा समझी जाती थी।
करण ने धीरे-धीरे उनकी साड़ी को उनके बदन से अलग किया, जिससे उनका दूध जैसा सफेद जिस्म पूरी तरह उजागर हो गया। उनके दोनों विशाल तरबूज अब आज़ाद थे और उन पर मौजूद गहरे रंग के मटर अब पूरी तरह सख्त हो चुके थे। करण ने एक तरबूज को अपने हाथ में लिया और उसे धीरे-धीरे दबाने लगा, जिससे संगीता के मुँह से एक मदभरी आह निकल गई। उसने अपने मुँह से उन मटरों को सहलाना शुरू किया, जिससे संगीता का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया। उनकी बंद आँखों और भारी होती साँसों ने बता दिया था कि वह अब पूरी तरह से इस खेल में डूब चुकी हैं।
अब करण की नज़र उनकी जाँघों के बीच मौजूद उस गहरी और रेशमी खाई पर पड़ी, जहाँ घने और मुलायम बाल सजे हुए थे। वह खाई अब पूरी तरह से गीली और रसीली हो चुकी थी, जिससे एक भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी। करण ने अपनी उंगली से उस खाई की गहराई को नापना शुरू किया, तो संगीता तड़प उठीं और उन्होंने करण के बाल पकड़ लिए। वह बार-बार अपनी कमर ऊपर उठा रही थीं जैसे वह कुछ और चाहती हों। करण ने उस खाई को चखना शुरू किया और अपनी जुबान से वहाँ का सारा रस समेटने लगा, जिससे संगीता का शरीर काँपने लगा और उनके मुँह से बस ‘करण… और…’ के स्वर निकलने लगे।
करण का खीरा अब पूरी तरह से फन उठाकर तैयार खड़ा था और वह अपनी खुदाई शुरू करने के लिए बेकरार था। उसने संगीता को बिस्तर पर चित लिटाया और उनके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। संगीता की वह गहरी खाई अब उसके सामने पूरी तरह खुली हुई थी। उसने अपने खीरे को उस खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से अंदर धकेलने की कोशिश की। जैसे ही खीरा उस तंग और गर्म खाई के अंदर प्रवेश कर रहा था, संगीता ने जोर से आँखें बंद कर लीं और करण की बाँहों को जकड़ लिया। वह अहसास इतना सुखद और गहरा था कि दोनों के जिस्म एक पल के लिए जैसे ठहर से गए थे।
करण ने अब अपनी गति बढ़ानी शुरू की और धीरे-धीरे पूरे खीरे को उस खाई की गहराई में समाहित कर दिया। हर धक्के के साथ संगीता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके मुँह से निकलने वाली सिसकारियां कमरे की शांति को भंग कर रही थीं। वह सामने से खुदाई का पूरा आनंद ले रही थीं और करण के तालमेल के साथ अपनी कमर को भी हिला रही थीं। दोनों के शरीर पसीने से तर-बतर हो चुके थे, लेकिन उनकी प्यास अभी भी नहीं बुझी थी। करण ने उनके मटरों को अपने दांतों से हल्का सा सहलाया, जिससे खुदाई की तीव्रता और भी बढ़ गई और संगीता का पूरा बदन बिजली की तरह लहरें लेने लगा।
थोड़ी देर बाद करण ने उन्हें बिस्तर पर घुटनों के बल खड़ा किया ताकि वह पिछवाड़े से खुदाई का मज़ा ले सके। संगीता का भरा हुआ पिछवाड़ा अब पूरी तरह से करण के सामने था, और वह नज़ारा उसे पागल कर देने के लिए काफी था। उसने अपने खीरे को दोबारा उस गीली खाई में उतारा और पीछे से जोर-जोर से धक्के लगाने लगा। संगीता के दोनों हाथ बिस्तर की चादर को कसकर पकड़े हुए थे और वह हर धक्के पर करण का नाम पुकार रही थीं। उस गहराई तक पहुँचने का अहसास उन दोनों के लिए किसी जन्नत से कम नहीं था, जहाँ रूह और जिस्म एक हो जाते हैं।
खुदाई की वह प्रक्रिया अब अपने चरम पर पहुँच रही थी, और दोनों ही अब अपनी सीमाएं पार करने वाले थे। करण की गति अब बहुत तेज हो चुकी थी और संगीता का शरीर बेकाबू होकर काँप रहा था। अचानक संगीता ने करण को कसकर पकड़ लिया और उनके शरीर से एक गरम रस निकलने लगा, जो उनकी खाई को और भी फिसलन भरा बना गया। संगीता का रस छूटना शुरू हो चुका था और वह पूरी तरह से निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ीं। करण भी अब अपनी चरम सीमा पर था और कुछ ही क्षणों में उसने भी अपना सारा सफेद रस उनकी गहराई में छोड़ दिया, जिससे वह खाई पूरी तरह भर गई।
खुदाई के बाद दोनों एक-दूसरे की बाँहों में सिमटे हुए लेटे थे, उनकी धड़कनें अभी भी सामान्य नहीं हुई थीं। कमरे में सिर्फ उनकी भारी साँसों की आवाज़ गूँज रही थी और एक अजीब सा सुकून फैला हुआ था। संगीता ने करण के माथे को चूमा और उसकी आँखों में देखते हुए एक मन्द मुस्कान दी, जिसमें तृप्ति और प्यार दोनों शामिल थे। करण को महसूस हुआ कि आज उसने न केवल एक शरीर को पाया है, बल्कि एक रूह के साथ भी उसका गहरा जुड़ाव हुआ है। उस दोपहर की वह खुदाई उनके जीवन की सबसे यादगार घटना बन गई थी, जिसने उनके रिश्ते को एक नया और गहरा आयाम दे दिया था।
समय जैसे ठहर सा गया था और उन दोनों की हालत ऐसी थी जैसे किसी युद्ध से थके हुए दो सिपाही शांति से आराम कर रहे हों। संगीता के बदन पर अभी भी उस खुदाई के निशान और रस की महक मौजूद थी, जो उन्हें उस अद्भुत आनंद की याद दिला रही थी। धीरे-धीरे उन्होंने अपने कपड़े समेटे और खुद को फिर से उसी सामाजिक ढाँचे में ढालने की कोशिश की, लेकिन उनके मन अब बदल चुके थे। उस दिन के बाद से उनके बीच एक मूक सहमति बन गई थी, और उनकी आँखें अब एक-दूसरे को देख उस गुप्त राज़ को साझा करती थीं जो सिर्फ उन दोनों के बीच सिमटा हुआ था।