रसीली साली की चु@@ई—>रात के सन्नाटे में जब पूरी दुनिया सो रही थी, तब मेरे कमरे की हवा कुछ अलग ही कहानी बयां कर रही थी। मेरी पत्नी पूजा अपने मायके गई हुई थी और घर में मेरे साथ मेरी साली कविता रुकी हुई थी, जो अपने कॉलेज की छुट्टियों का आनंद लेने आई थी। कविता की उम्र महज़ 24 साल थी, लेकिन उसका शरीर किसी तराशी हुई मूरत की तरह गढ़ा हुआ था। वह जब भी मेरे सामने से गुजरती, उसकी खुशबू मेरे मन में अजीब सी हलचल पैदा कर देती थी। उस रात बिजली कट गई थी और हम दोनों हॉल में सोफे पर बैठे मोमबत्ती की मद्धम रोशनी में बातें कर रहे थे। कविता ने एक बहुत ही पतला और ढीला नाइटगाउन पहना हुआ था, जिसमें से उसके शरीर की बनावट साफ झलक रही थी।
कविता के अंगों का उभार ऐसा था कि कोई भी पुरुष अपना संयम खो दे। उसके सीने पर दो बड़े और गोल तरबूज साफ नजर आ रहे थे, जो उसके हिलने-डुलने के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। उन तरबूज के ऊपर छोटे-छोटे मटर जैसे उभार नाइटगाउन के पतले कपड़े को चीरकर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे। उसकी कमर पतली थी और नीचे का पिछवाड़ा इतना भरा हुआ और सुडौल था कि उस पर से नजर हटाना नामुमकिन था। उसके पैरों की गोरी रंगत मोमबत्ती की रोशनी में सोने की तरह चमक रही थी। वह बार-बार अपनी जुल्फों को कान के पीछे करती, तो मेरी धड़कनें और भी तेज हो जाती थीं। उसके शरीर से आती उस मीठी और मादक गंध ने मेरे भीतर के सोए हुए पुरुष को जगा दिया था।
हमारे बीच हमेशा से एक शरारत भरा रिश्ता रहा था, लेकिन उस रात की खामोशी ने उस रिश्ते को एक नई गहराई दे दी थी। बातों-बातों में वह मेरे करीब आती गई और उसका कंधा मेरे कंधे से छूने लगा। मैंने महसूस किया कि उसके शरीर का तापमान बढ़ रहा है और वह भी मेरी उपस्थिति को लेकर उतनी ही असहज और उत्साहित है जितना कि मैं। वह अपनी पढ़ाई और भविष्य की बातें कर रही थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी, जो कुछ और ही कह रही थी। मुझे लगा जैसे हमारे बीच का भावनात्मक जुड़ाव अब एक शारीरिक आकर्षण में बदल रहा है। हम दोनों के बीच की झिझक अब धीरे-धीरे कम हो रही थी और कमरे का तापमान भी जैसे बढ़ने लगा था।
तभी अचानक कविता ने कहा कि उसके पैर में मोच आ गई है और वह बहुत दर्द महसूस कर रही है। मैंने बिना सोचे उसका पैर अपने पास खींच लिया और धीरे-धीरे उसे सहलाने लगा। मेरा हाथ उसके रेशमी पैरों पर फिसल रहा था और हर स्पर्श के साथ मेरे शरीर में बिजली की लहर दौड़ रही थी। मैंने धीरे-धीरे मसाज करते हुए अपना हाथ उसके घुटनों से ऊपर ले जाना शुरू किया। कविता ने एक ठंडी आह भरी और अपनी आँखें मूंद लीं। उसकी वह सिसकी मेरे कानों में शहद घोल रही थी। अब मेरे हाथ उसकी जांघों तक पहुँच चुके थे, जो बहुत ही कोमल और मखमली थीं। उसने मुझे रोका नहीं, बल्कि अपना शरीर मेरी ओर थोड़ा और झुका दिया, जिससे उसके तरबूज मेरे हाथ के करीब आ गए।
अब झिझक का पर्दा पूरी तरह हट चुका था। मैंने धीरे से अपना हाथ उसके नाइटगाउन के अंदर डाला और उसके रेशमी तरबूज को अपनी मुट्ठी में भर लिया। वह सिसक उठी और उसके मुँह से ‘जीजू’ शब्द निकला, जो अब किसी आदेश की तरह लग रहा था। मैंने उसके उन नरम तरबूज को धीरे-धीरे दबाना शुरू किया और उनके ऊपर मौजूद छोटे मटरों को अपनी उंगलियों से सहलाने लगा। वह तड़प उठी और उसने मेरा सिर पकड़कर अपने सीने से लगा लिया। मैं पागलों की तरह उसके तरबूज के रस को महसूस करने लगा और फिर मैंने ऊपर बढ़कर उसके होंठों का पपीता चखना शुरू किया। हमारे होंठ एक-दूसरे में इस तरह उलझ गए जैसे सालों की प्यास बुझा रहे हों। वह मेरे होंठों को ऐसे चूस रही थी जैसे कोई रसीला फल खा रही हो।
उसने धीरे से मेरे पायजामे के ऊपर हाथ फेरा जहाँ मेरा खीरा अब पूरी तरह से अकड़ चुका था और बाहर आने को बेताब था। उसने मेरे पायजामे की डोरी खोली और मेरे गर्म और सख्त खीरे को अपने नन्हे हाथों में पकड़ लिया। उसके हाथ के स्पर्श से मुझे ऐसा लगा जैसे मेरा रस अभी निकल जाएगा। वह हैरानी से मेरे खीरे को देख रही थी और फिर उसने उसे अपने मुँह में ले लिया। कविता ने मेरे खीरे को इस तरह चूसना शुरू किया जैसे वह कोई लॉलीपॉप हो। उसकी जीभ की गर्मी और उसके मुँह का दबाव मुझे स्वर्ग का अहसास करा रहा था। मैं उसके बालों में अपनी उंगलियां फँसाकर उसे और अंदर तक खींचने लगा। खीरा चूसने की उस क्रिया ने मुझे पूरी तरह मदहोश कर दिया था।
अब बारी मेरी थी, मैंने उसे सोफे पर लिटाया और उसके नाइटगाउन को ऊपर उठा दिया। उसके नीचे की गहरी खाई अब मेरे सामने थी, जो घने और काले बालों से ढकी हुई थी। वह खाई पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वहाँ से एक नशीली खुशबू आ रही थी। मैंने अपनी जीभ से उसकी खाई को चाटना शुरू किया। वह जोर-जोर से कराहने लगी और सोफे के कवर को कसकर पकड़ लिया। मेरी जीभ जब उसकी खाई के दाने को सहलाती, तो वह अपना पिछवाड़ा ऊपर उठा देती थी। मैंने अपनी उंगली से उसकी खाई को खोदना शुरू किया, तो वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी। वह बार-बार कह रही थी, ‘जीजू, अब और बर्दाश्त नहीं होता, अपना खीरा मेरी खाई में डाल दो।’
मैंने उसे सामने से खोदने की पोजीशन में लिटाया और अपने सख्त खीरे को उसकी गीली और तंग खाई के मुहाने पर रखा। जैसे ही मैंने पहला धक्का मारा, वह जोर से चीखी, लेकिन वह चीख दर्द की नहीं बल्कि असीम आनंद की थी। मेरा खीरा उसकी तंग खाई में धीरे-धीरे समाने लगा। उसकी खाई इतनी तंग थी कि मेरा खीरा चारों तरफ से दब रहा था। मैंने उसे गहराई तक खोदना शुरू किया और कमरे में केवल हमारे शरीरों के टकराने की और उसके कराहने की आवाजें गूँजने लगीं। वह अपने दोनों पैर मेरे कंधों पर रखकर मुझे और भी अंदर खींच रही थी। हर धक्के के साथ वह चिल्लाती, ‘हाँ जीजू, और जोर से, पूरी तरह से खोद डालो मुझे।’
कुछ देर सामने से खोदने के बाद मैंने उसे पलटने को कहा। अब वह पिछवाड़े से खुदाई करवाने के लिए तैयार थी। उसका उभरा हुआ पिछवाड़ा मेरे सामने था और उसकी खाई पीछे से साफ नजर आ रही थी। मैंने पीछे से अपना खीरा उसकी खाई में उतारा और तेज झटकों के साथ खुदाई शुरू की। वह अपने हाथों को सोफे पर टिकाए हुए थी और हर धक्के के साथ उसके तरबूज आगे-पीछे झूल रहे थे। वह चिल्ला रही थी, ‘ओह जीजू, आपका खीरा मेरी खाई को फाड़ देगा, पर रुको मत, मुझे पूरा भर दो।’ उसकी सिसकियाँ और मेरी साँसों की गर्माहट ने माहौल को पूरी तरह से कामुक बना दिया था। हम दोनों पसीने से तर-बतर हो चुके थे, लेकिन खुदाई की रफ्तार कम नहीं हो रही थी।
काफी देर तक उसे अलग-अलग तरीके से खोदने के बाद मुझे महसूस हुआ कि मेरा रस अब निकलने ही वाला है। कविता भी अपने रस निकलने के करीब थी, उसका शरीर जोर-जोर से कांपने लगा था। उसने चिल्लाकर कहा, ‘जीजू, मेरा रस निकल रहा है, मुझे भर दो।’ मैंने आखिरी कुछ तेज धक्के मारे और अपना पूरा खीरा उसकी खाई की गहराई में उतार दिया। उसी पल हम दोनों का रस एक साथ छूटा। मेरा गर्म सफेद रस उसकी खाई के भीतर ज्वालामुखी की तरह भर गया। वह पूरी तरह ढीली होकर सोफे पर गिर पड़ी और मैं भी उसके ऊपर ही लेट गया। हम दोनों काफी देर तक इसी अवस्था में रहे, हाँफते हुए और एक-दूसरे के शरीर की गर्माहट को महसूस करते हुए।
उस अद्भुत खुदाई के बाद हम दोनों के शरीर शांत थे लेकिन मन में एक अजीब सी संतुष्टि थी। कविता ने मेरा माथा चूमा और मुझे कसकर गले लगा लिया। उसकी हालत ऐसी थी कि वह हिल भी नहीं पा रही थी, उसकी खाई से मेरा रस धीरे-धीरे बाहर रिस रहा था। हमने उस रात जो महसूस किया वह सिर्फ शारीरिक सुख नहीं था, बल्कि एक-दूसरे के प्रति उस छुपी हुई चाहत का समर्पण था। उसके बाद की वह रात हमने एक-दूसरे की बाहों में ही बिताई। वह अहसास, वह पसीना, और वह रस की गंध आज भी मेरे जेहन में ताजी है। हमने तय किया कि यह हमारा एक खूबसूरत राज रहेगा, जो हमें और भी करीब ले आया था।