सफर की मदहोश चु@@ई—>
रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे और दिल्ली से मुंबई जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस अपनी पूरी रफ़्तार से पटरियों पर दौड़ रही थी। ट्रेन के एसी फर्स्ट क्लास के कूपे में एक अजीब सी खामोशी और गर्माहट घुली हुई थी। विक्रम, जो पेशे से एक आर्किटेक्ट था, अपनी निचली बर्थ पर बैठा एक किताब पढ़ने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसका ध्यान बार-बार सामने वाली बर्थ पर बैठी उस अजनबी महिला की ओर जा रहा था। उसका नाम निशा था, जैसा कि उसने चार्ट में पढ़ा था। निशा की उम्र लगभग तीस के करीब रही होगी, लेकिन उसके बदन की बनावट किसी कॉलेज जाने वाली लड़की जैसी कसी हुई और आकर्षक थी। उसने एक गहरे नीले रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी थी, जो उसके गोरे रंग पर कहर ढा रही थी। उस कूपे में सिर्फ वे दो ही मुसाफिर थे, जिसने माहौल में एक अनकहा सा तनाव पैदा कर दिया था।
निशा की शारीरिक बनावट इतनी कामुक थी कि कोई भी मर्द उसे देखकर अपना आपा खो दे। साड़ी के नीचे से उसके पेट की गोलाई और गहरी नाभि रह-रह कर झांक रही थी। उसके ब्लाउज की तंग फिटिंग उसके भारी और सुडौल तरबूजों को बड़ी मुश्किल से थामे हुए थी। जब भी वह सांस लेती, उसके तरबूज ऊपर-नीचे होते और विक्रम की धड़कनें बढ़ा देते। उसके तरबूजों के बीच की गहरी घाटी साफ नजर आ रही थी, जिससे विक्रम के मन में उथल-पुथल मच गई थी। निशा का पिछवाड़ा भी साड़ी में से उभर कर बाहर को निकल रहा था, जो उसे एक संपूर्ण नारी का रूप दे रहा था। विक्रम ने महसूस किया कि उसकी नजरें बार-बार निशा के उन अंगों पर जाकर टिक रही थीं, जहाँ नहीं टिकनी चाहिए थीं।
सफर की उस आधी रात में उन दोनों के बीच एक अनकहा जुड़ाव सा महसूस होने लगा था। निशा ने महसूस कर लिया था कि विक्रम उसे देख रहा है, लेकिन उसने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक और शरारत थी। उन दोनों के बीच की खामोशी अब भारी होने लगी थी। विक्रम का दिल जोरों से धड़क रहा था, और उसका खीरा उसकी पैंट के अंदर अब अपनी जगह बनाने के लिए छटपटाने लगा था। उसने गौर किया कि निशा ने भी अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा ढीला कर दिया था, जिससे उसके मटर की आकृति ब्लाउज के पतले कपड़े के ऊपर से ही साफ उभर कर दिखने लगी थी। वह दृश्य इतना उत्तेजक था कि विक्रम के लिए अपनी भावनाओं पर काबू रखना अब नामुमकिन सा होता जा रहा था।
विक्रम ने हिम्मत जुटाई और धीरे से बात शुरू की, जिससे वह अजनबी सा रिश्ता एक नया मोड़ लेने लगा। बातों-बातों में निशा ने बताया कि वह अकेली सफर कर रही है और उसका पति काम के सिलसिले में अक्सर बाहर रहता है। उसकी बातों में एक तरह का अकेलापन और प्यास झलक रही थी, जो विक्रम को अपनी ओर खींच रही थी। जैसे-जैसे रात गहराती गई, कूपे की ठंडी हवा में एक कामुक गर्माहट महसूस होने लगी। विक्रम अपनी बर्थ से उठकर निशा के करीब जाकर बैठ गया। निशा ने उसे मना नहीं किया, बल्कि उसके करीब आने पर उसने अपनी आंखें झुका लीं। उसके चेहरे पर फैली हया और इच्छा का मिश्रण विक्रम को पागल कर देने के लिए काफी था।
पहला स्पर्श हमेशा जादुई होता है। विक्रम ने धीरे से अपना हाथ निशा के हाथ पर रखा। निशा की देह में एक हल्की सी कंपकंपी दौड़ गई, जैसे बिजली का करंट लगा हो। उसने विक्रम की तरफ देखा और उसकी आंखों में छिपी आग को पढ़ लिया। विक्रम ने हौसला बढ़ाते हुए अपना हाथ उसके रेशमी बालों से होते हुए उसके गालों तक पहुँचाया। निशा ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी आह भरी। वह क्षण उन दोनों के लिए समर्पण का था। विक्रम ने धीरे से अपने होंठ निशा के होंठों पर रख दिए और उनका पहला गुल-स्पर्श हुआ। निशा ने भी अपनी बाहें विक्रम के गले में डाल दीं और उस मधुर रस का आनंद लेने लगी, जिससे माहौल पूरी तरह से कामुक हो उठा।
धीरे-धीरे विक्रम का हाथ निशा की साड़ी के पल्लू को हटाते हुए उसके भारी तरबूजों तक पहुँच गया। जैसे ही उसने एक तरबूज को अपनी हथेली में भरा, निशा के मुँह से एक सिसकारी निकल गई। विक्रम ने महसूस किया कि उसके तरबूज कितने नरम और गर्म थे। उसने अपनी उंगलियों से उन पर जमे हुए मटर को सहलाना शुरू किया, जिससे निशा का पूरा शरीर काम की अग्नि में जलने लगा। निशा ने विक्रम के खीरे को अपनी साड़ी के ऊपर से ही सहलाना शुरू किया, जो अब पूरी तरह से सख्त और लंबा हो चुका था। वह खीरा अब अपनी गहराई खोजने के लिए बेताब था। विक्रम ने निशा के ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले और उसके गोरे, चमकदार तरबूजों को आजाद कर दिया।
विक्रम अब पूरी तरह से निशा की देह पर हावी हो चुका था। उसने निशा को धीरे से बर्थ पर लिटाया और उसकी साड़ी और पेटीकोट को पैरों की तरफ खिसका दिया। जैसे ही निशा की रेशमी खाई विक्रम के सामने आई, उसकी आंखें फटी की फटी रह गई। वह खाई गुलाबी, गीली और बेहद आकर्षक थी, जिसके चारों तरफ काले और घने बाल थे। निशा ने शर्म से अपना चेहरा फेर लिया, लेकिन विक्रम ने उसकी खाई के पास अपना चेहरा ले जाकर उसे सूंघना शुरू किया। उसने अपनी जीभ से खाई चाटना शुरू किया, जिससे निशा बिस्तर पर तड़पने लगी। वह बार-बार विक्रम का सिर अपनी खाई की ओर दबा रही थी और उसके मुँह से सिर्फ बेतहाशा आहें निकल रही थीं।
निशा की उत्तेजना अब चरम पर थी, उसने विक्रम की पैंट खोलकर उसके विशाल और सख्त खीरे को बाहर निकाल लिया। खीरे की लंबाई और मोटाई देखकर निशा की आंखें चमक उठीं। उसने बिना देर किए उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया। विक्रम ने महसूस किया कि निशा कितनी महारत से उसका खीरा चूस रही थी। उसकी जीभ और होंठों का तालमेल विक्रम को स्वर्ग का अहसास करा रहा था। कुछ देर तक खीरा चूसने के बाद, विक्रम ने निशा को घुटनों के बल बिठाया ताकि वह उसे पिछवाड़े से खोद सके। निशा ने अपना भारी पिछवाड़ा विक्रम की ओर कर दिया और विक्रम ने अपने खीरे को उसकी गीली खाई के मुहाने पर टिकाया।
एक जोरदार झटके के साथ विक्रम ने अपना पूरा खीरा निशा की गहरी खाई के अंदर उतार दिया। निशा के मुँह से एक चीख निकल गई, जो खुशी और दर्द का अनोखा संगम थी। ट्रेन की पटरियों की आवाज़ और विक्रम की खुदाई की रफ़्तार अब एक हो चुकी थी। वह पागलों की तरह उसे खोद रहा था, और हर धक्के के साथ निशा का बदन उछल रहा था। उसके तरबूज बेतरतीब तरीके से हिल रहे थे और वह अपनी उंगलियों से अपनी खाई को भी सहला रही थी। कमरे में सिर्फ गोश्त के टकराने की आवाज़ें गूँज रही थीं। विक्रम ने फिर निशा को सीधा लिटाया और सामने से खुदाई शुरू की। निशा ने अपनी टाँगें विक्रम की कमर पर कस लीं ताकि वह और गहराई तक जा सके।
खुदाई की यह प्रक्रिया बहुत लंबी और जोरदार चली। दोनों के शरीर पसीने से तर-बतर हो चुके थे। विक्रम की रफ्तार अब बेकाबू हो गई थी और निशा भी अपने रस छूटने के करीब थी। विक्रम ने अपनी गति और बढ़ा दी और निशा की खाई के भीतर गहरा धक्का मारते हुए अपना सारा गर्म रस छोड़ दिया। उसी पल निशा की देह भी कांप उठी और उसका भी रस निकल गया। दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़ गए, उनकी सांसें तेज चल रही थीं और दिल की धड़कनें एक-दूसरे को सुनाई दे रही थीं। उस रात उस ट्रेन के कूपे में एक अजनबी रिश्ता अपनी पूर्णता को प्राप्त कर चुका था, और पीछे छोड़ गया था सिर्फ एक गहरी संतुष्टि और थकावट भरी नींद।