खूबसूरत पड़ोसन की चु@@ई—>समीर पिछले दो महीनों से इस नए अपार्टमेंट में रहने आया था, जहाँ उसकी बगल वाले फ्लैट में विनीता नाम की एक अत्यंत आकर्षक महिला रहती थी। विनीता की उम्र लगभग पैंतीस वर्ष रही होगी, लेकिन उसके शरीर की बनावट और चेहरे की चमक किसी बीस साल की नवयौवना को मात देने के लिए काफी थी। समीर अक्सर उसे बालकनी में कपड़े सुखाते हुए देखता था, जहाँ उसकी साड़ी का पल्लू हवा के झोंके से सरक जाता था, और समीर की नजरें उसके कसकते हुए बदन पर टिक जाती थीं। विनीता का व्यक्तित्व जितना शांत था, उसकी आँखों में उतनी ही गहरी रहस्यमयी तड़प छिपी हुई महसूस होती थी, जो समीर को अपनी ओर चुंबक की तरह खींचती थी।
विनीता के शरीर का आकार किसी तराशी हुई मूरत जैसा था, उसके भारी और गोल तरबूज उसकी कुर्ती के भीतर से अपनी मौजूदगी का पुरजोर एहसास कराते थे। जब वह चलती थी, तो उसका भारी पिछवाड़ा एक लयबद्ध तरीके से हिलता था, जिसे देख समीर के भीतर एक अजीब सी हलचल मच जाती थी। उसके चेहरे पर हमेशा एक हल्की सी मुस्कान रहती थी, लेकिन उसकी गहरी भूरी आँखें कुछ और ही कहानी बयां करती थीं। समीर अक्सर रात के सन्नाटे में उसके बारे में सोचते हुए करवटें बदलता था, उसका मन करता था कि वह बस एक बार उन नरम तरबूजों को अपने हाथों में भर ले और उनकी कोमलता को महसूस करे।
उन दोनों के बीच बातचीत की शुरुआत बहुत ही औपचारिक थी, कभी लिफ्ट में तो कभी पार्किंग में बस एक औपचारिक मुस्कान का आदान-प्रदान होता था। समीर को धीरे-धीरे एहसास होने लगा कि विनीता अपने घर में काफी अकेली रहती है, क्योंकि उसके पति अक्सर व्यापार के सिलसिले में शहर से बाहर ही रहते थे। इसी अकेलेपन ने शायद उनके बीच एक अनकहा भावनात्मक जुड़ाव पैदा करना शुरू कर दिया था, जहाँ बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ महसूस किया जा सकता था। समीर ने देखा कि विनीता भी अब उसे देख कर अपनी नजरें जल्दी नहीं हटाती थी, बल्कि उसकी आँखों में एक अजीब सी आमंत्रण वाली चमक दिखाई देने लगी थी।
एक शाम जब अचानक पूरे अपार्टमेंट की बिजली गुल हो गई, तो समीर ने हिम्मत जुटाकर विनीता के दरवाजे पर दस्तक दी यह पूछने के लिए कि क्या उसके यहाँ भी अंधेरा है। विनीता ने जैसे ही दरवाजा खोला, समीर की सांसें अटक गईं; उसने एक पतली रेशमी नाइटी पहनी हुई थी, जिसके नीचे उसके अंगों की रूपरेखा साफ झलक रही थी। मोमबत्ती की मद्धम रोशनी में उसके चेहरे की चमक और भी बढ़ गई थी और उसके उभरे हुए तरबूज समीर की आँखों के बिल्कुल सामने थे। विनीता ने उसे अंदर आने का इशारा किया, और उस रात की खामोशी में दोनों के दिलों की धड़कनें एक-दूसरे को साफ सुनाई देने लगी थीं।
समीर के मन में एक गहरा द्वंद्व चल रहा था; एक तरफ समाज की मर्यादा थी और दूसरी तरफ विनीता के जिस्म से उठती वह मादक खुशबू जो उसे दीवाना बना रही थी। विनीता ने बहुत ही धीरे से समीर का हाथ पकड़ा, उसके हाथों की कोमलता ने समीर के पूरे शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ा दी। समीर ने महसूस किया कि विनीता का हाथ कांप रहा था, जो उसकी छिपी हुई इच्छाओं और झिझक का प्रमाण था। कमरे में छाई उस धुंधली रोशनी ने उनकी शर्म की दीवारों को धीरे-धीरे गिराना शुरू कर दिया था, और अब उनके बीच की दूरी केवल कुछ इंच की रह गई थी।
समीर ने अपना हाथ धीरे से बढ़ाकर विनीता के गालों को छुआ, उसकी त्वचा मखमल जैसी मुलायम और गर्म थी। विनीता ने अपनी आँखें मूंद लीं और एक गहरी आह भरी, जो समीर के लिए हरी झंडी की तरह थी। समीर ने अपना चेहरा उसके करीब लाया और उसके होंठों का रस पीना शुरू किया, वह अहसास इतना गहरा और भावुक था कि दोनों सुध-बुध खो बैठे। उनके होंठ एक-दूसरे में इस कदर उलझ गए थे जैसे सदियों की प्यास बुझा रहे हों, समीर का हाथ अब धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़कर उसके भारी तरबूजों पर थम गया था।
जैसे ही समीर ने अपने हाथों से उसके तरबूजों को हल्का सा दबाया, विनीता के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली कराह निकली। समीर ने नाइटी के ऊपर से ही उसके मटर जैसे निप्पलों को अपनी उंगलियों के बीच सहलाया, जिससे विनीता का शरीर धनुष की तरह तन गया। वह समीर के करीब और भी सट गई, मानों अपने शरीर को उसके भीतर समा देना चाहती हो। समीर ने धीरे से उसकी नाइटी के फीते खोले, और जैसे ही वह रेशमी कपड़ा जमीन पर गिरा, विनीता का दूधिया बदन समीर की आँखों के सामने पूरी तरह निर्वस्त्र खड़ा था।
समीर की नजरें उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव पर जा रही थीं, उसके घने काले बाल उसकी जांघों के बीच की गहरी खाई के ऊपर फैले हुए थे। समीर अब और इंतजार नहीं कर सकता था, उसने जल्दी से अपने कपड़े उतारे और अपने सख्त और गर्म खीरा को विनीता के शरीर से सटा दिया। विनीता ने जैसे ही उस गर्म खीरा का स्पर्श महसूस किया, उसकी सांसें और भी तेज हो गईं। समीर नीचे झुका और उसकी गहरी खाई के चारों ओर जमे हुए काले बालों को चूमते हुए अपनी जीभ से उस गीली खाई को चाटना शुरू किया, जिससे विनीता बिस्तर पर तड़पने लगी।
विनीता ने समीर के बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ लिया और उसका सिर अपनी खाई की ओर जोर से दबाने लगी। समीर की जीभ उस खाई के रस का आनंद ले रही थी, और उसकी उंगलियां विनीता के मटर को लगातार सहला रही थीं। विनीता का शरीर पसीने से भीग चुका था और वह लगातार सिसकियाँ भर रही थी, उसे ऐसा सुख पहले कभी महसूस नहीं हुआ था। समीर ने अब अपनी एक उंगली से उसकी खाई को खोदना शुरू किया, जिससे विनीता की कमर बार-बार ऊपर की ओर उछलने लगी और उसका शरीर कामुकता के चरम की ओर बढ़ने लगा।
अब समीर ने अपने खीरा को विनीता के हाथ में दे दिया, विनीता ने उसे देखते ही अपने मुँह में भर लिया और उसे बड़े चाव से चूसने लगी। खीरा उसके मुँह की गर्मी पाकर और भी ज्यादा फौलादी हो गया था, समीर अपनी आँखें बंद कर उस जन्नत जैसे अहसास का मजा ले रहा था। विनीता बड़ी कुशलता से खीरा चूस रही थी, जिससे समीर का धैर्य अब जवाब देने लगा था। उसने विनीता को सीधा लेटाया और उसके पैरों को अपने कंधों पर रखकर सामने से खुदाई करने की मुद्रा में आ गया।
समीर ने अपने खीरा की नोक को विनीता की गीली और तंग खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से भीतर धकेला। विनीता के मुँह से एक तेज चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि बेतहाशा आनंद की थी। जैसे-जैसे खीरा उस तंग खाई की गहराइयों को नाप रहा था, विनीता की आँखों से खुशी के आंसू छलक आए। समीर ने अब अपनी गति बढ़ानी शुरू की, हर धक्के के साथ विनीता के तरबूज हवा में लहरा रहे थे और कमरे में उनके शरीरों के टकराने की आवाज गूंज रही थी। समीर ने कहा, “विनीता, तुम कितनी तंग और रसीली हो, मुझे सब कुछ खोद देना है।”
विनीता ने मदहोश आवाज में जवाब दिया, “हाँ समीर, मुझे और जोर से खोदो, आज मेरा कोना-कोना तुम्हारी इस खुदाई से भर जाना चाहिए।” समीर अब पागलों की तरह उसे खोद रहा था, वह कभी उसे पिछवाड़े से खोदता तो कभी उसे अपने ऊपर बिठाकर अपनी गहराई तक पहुँचाता। विनीता का पूरा शरीर गुलाबी पड़ चुका था और उसकी सांसें उखड़ रही थीं। उनके बीच हो रही इस खुदाई ने भावनाओं और जिस्मानी भूख के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। समीर का खीरा अब पूरी तरह से विनीता की खाई के रस में डूब चुका था और दोनों ही अपने चरम की ओर बढ़ रहे थे।
अचानक विनीता का शरीर कांपने लगा और उसकी खाई से भारी मात्रा में रस निकलने लगा, समीर ने भी अपनी पकड़ मजबूत की और अपने खीरा का सारा गर्म रस उसकी गहराई में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़ गए, उनकी सांसें अब भी तेज थीं लेकिन मन को एक असीम शांति मिल चुकी थी। कमरे की हवा में अब भी उनके पसीने और मिलन की सोंधी खुशबू रची-बसी थी। समीर ने विनीता के माथे को चूमा और उसे अपने सीने से लगा लिया, विनीता ने अपनी आँखें बंद कर लीं और समीर की धड़कनों में खो गई।
खुदाई के बाद की वह शांति बहुत ही सुखद थी, जहाँ शब्दों की जरूरत नहीं थी। विनीता का शरीर अब भी हल्का सा कांप रहा था, और समीर उसके रेशमी बालों को सहला रहा था। उन दोनों को पता था कि यह मुलाकात केवल एक जिस्मानी जरूरत नहीं थी, बल्कि दो अकेले रूहों का मिलन था। समीर ने महसूस किया कि विनीता के चेहरे पर अब एक अलग ही संतोष और सुकून था। उन्होंने घंटों तक उसी अवस्था में लेटे रहकर एक-दूसरे के सान्निध्य का आनंद लिया, यह जानते हुए कि उनके बीच का यह रिश्ता अब एक नई और गहरी मोड़ ले चुका है।