मीनाक्षी की केबिन वाली चुदाई—>
उस दिन ऑफिस की बड़ी-बड़ी कांच की खिड़कियों के पार शहर की रोशनियां टिमटिमा रही थीं, लेकिन ऑफिस के अंदर सन्नाटा पसरा हुआ था क्योंकि रात के साढ़े दस बज चुके थे। मैं और मेरी सीनियर बॉस मीनाक्षी जी, हम दोनों ही उस फ्लोर पर अकेले थे क्योंकि एक बड़ा प्रोजेक्ट सुबह तक पूरा करना था। मीनाक्षी जी की उम्र लगभग अड़तीस साल थी, लेकिन उनके शरीर की बनावट और उनकी त्वचा की चमक देखकर कोई भी उन्हें पच्चीस से ज्यादा का नहीं कह सकता था। उन्होंने उस रात एक गहरे नीले रंग की सिल्क की साड़ी पहनी हुई थी, जिसमें से उनकी कमर का वह गोरा हिस्सा और उनकी नाभि साफ झलक रही थी। उनके शरीर के वह दो भारी और सुडौल तरबूज साड़ी के ब्लाउज को फाड़कर बाहर आने को बेताब लग रहे थे, और जब भी वह सांस लेतीं, उन तरबूजों की हलचल मेरे दिल की धड़कनें बढ़ा देती थी।
मीनाक्षी जी का व्यक्तित्व बहुत ही सख्त था, लेकिन आज रात उनके व्यवहार में एक अजीब सी नरमी और गर्माहट थी जो मुझे बेचैन कर रही थी। उनके चलने पर उनके भारी पिछवाड़े की वह मदमस्त थिरकन और उनके पैरों की पायल की आवाज सन्नाटे को चीर रही थी। मैंने देखा कि काम के बहाने वह बार-बार मेरी टेबल की ओर आ रही थीं, और जब वह झुककर लैपटॉप की स्क्रीन देखतीं, तो उनके तरबूज मेरे कंधे को छू जाते थे। उस स्पर्श से मेरे शरीर में एक बिजली सी दौड़ जाती और मेरा खीरा अपनी पेंट के अंदर अंगड़ाइयां लेने लगता। मुझे महसूस हो रहा था कि वह भी इस खिंचाव को समझ रही थीं क्योंकि उनके मटर साड़ी के पतले कपड़े के ऊपर से ही उभरे हुए दिखाई देने लगे थे, जो उनकी उत्तेजना का साफ संकेत दे रहे थे।
हमारे बीच एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव पहले से ही था, हम अक्सर घंटों ऑफिस के काम और अपनी निजी जिंदगी के बारे में बातें किया करते थे। आज उस एकांत ने उस जुड़ाव को एक शारीरिक आकर्षण में बदल दिया था। मीनाक्षी जी ने अपनी कुर्सी मेरे पास खिसकाई और बहुत ही धीमी आवाज में कहा, ‘समीर, क्या तुम्हें नहीं लगता कि यहाँ बहुत गर्मी हो रही है?’ उनकी आवाज में एक थरथराहट थी और उनकी आँखों में एक प्यास थी जिसे मैं साफ पढ़ सकता था। मैंने उनकी आँखों में झांका और पाया कि उनकी पलकें झुक रही थीं और उनकी सांसें तेज चलने लगी थीं। मेरे मन में एक द्वंद्व चल रहा था कि क्या यह सही है, क्या प्रोफेशनल मर्यादा का उल्लंघन होगा, लेकिन मेरी रगों में दौड़ता खून और उनके शरीर की खुशबू ने सारे तर्कों को पीछे छोड़ दिया।
मैंने धीरे से अपना हाथ उनकी मखमली कमर पर रखा, जहाँ उनकी साड़ी थोड़ी सी खिसक गई थी। मेरा हाथ उनके गरम जिस्म को छूते ही कांप उठा, लेकिन मीनाक्षी जी ने विरोध करने के बजाय अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी आह भरी। उन्होंने अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया और धीरे से बुदबुदाईं, ‘समीर, मैं बहुत समय से खुद को रोक रही थी, लेकिन आज यह तड़प बर्दाश्त नहीं हो रही।’ उनका यह कहना था कि मेरी हिम्मत और बढ़ गई और मैंने उन्हें अपनी बाहों में भर लिया। हमारी सांसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं और कमरा उनकी परफ्यूम और हमारी उत्तेजना की महक से भर गया था। मैंने उनके तरबूजों को सहलाना शुरू किया, जो बहुत ही कोमल और वजनदार थे।
वह धीरे-धीरे अपनी साड़ी के पल्लू को गिराने लगीं और अब उनके मटर मेरे सामने थे, जो ठंड और उत्तेजना से पूरी तरह सख्त हो चुके थे। मैंने अपनी जीभ से उनके एक मटर को छुआ, तो वह पूरी तरह कांप उठीं और उनके मुँह से एक मदहोश कर देने वाली कराह निकली। उन्होंने अपने हाथ मेरे बालों में फंसा लिए और मुझे अपने शरीर के और करीब खींच लिया। अब झिझक का कोई नामोनिशान नहीं था, बस एक बेतहाशा इच्छा थी जो हम दोनों को अपनी चपेट में ले चुकी थी। मैंने धीरे-धीरे उनके ब्लाउज के हुक खोले और उनके विशाल तरबूज पूरी तरह आजाद होकर मेरे सामने आ गए। उनकी गोराई और उन पर फैली नीली नसें देखकर मेरा खीरा अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था और पेंट को चीर देने पर आमादा था।
मैंने उन्हें अपनी गोद में उठा लिया और पास ही रखे सोफे पर लिटा दिया। उनके शरीर का हर कोना अब मेरे स्पर्श के लिए तरस रहा था। मैंने धीरे से उनकी साड़ी और पेटीकोट को नीचे की ओर सरकाया, जिससे उनकी गहरी और रसीली खाई मेरे सामने आ गई। उस खाई के चारों ओर काले और घने बाल थे, जो उसकी खूबसूरती को और बढ़ा रहे थे। मैंने अपनी उंगलियों से उस खाई को सहलाना शुरू किया, तो पाया कि वह पहले से ही गीली हो चुकी थी और वहाँ से एक मीठा सा रस निकल रहा था। मीनाक्षी जी ने अपना पिछवाड़ा ऊपर उठाया और मेरे हाथों को अपनी खाई की गहराइयों में जाने का रास्ता दिया। वह बार-बार मेरा नाम लेकर पुकार रही थीं और उनकी आवाज़ में एक असीम सुख की तड़प थी।
अब समय आ गया था कि मैं अपने खीरे को उसकी मंजिल तक पहुँचाऊँ। मैंने अपनी पेंट उतारी और मेरा लंबा और मोटा खीरा उछलकर बाहर आ गया। उसे देखते ही मीनाक्षी जी की आँखें फटी की फटी रह गई और उन्होंने धीरे से उसे अपने हाथ में पकड़ लिया। ‘ओह समीर, यह तो बहुत विशाल है,’ उन्होंने कहा और फिर उसे अपने मुँह में ले लिया। उनके मुँह की गर्माहट और उनके खीरा चूसने के अंदाज ने मुझे पागल कर दिया। वह बड़ी ही कुशलता से खीरे के ऊपरी हिस्से को चूस रही थीं और उनकी जीभ का जादू मुझे स्वर्ग का अहसास करा रहा था। मुझे लगा कि मेरा रस अभी निकल जाएगा, इसलिए मैंने उन्हें रोका और उन्हें सामने से खोदने की पोजीशन में लिटाया।
मैंने अपने खीरे की नोक को उनकी रसीली खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से धक्का दिया। मीनाक्षी जी ने एक दर्द भरी लेकिन सुखद कराह भरी और अपने पैर मेरी कमर के चारों ओर लपेट लिए। वह खाई बहुत ही तंग थी, लेकिन उनके रस ने उसे चिकना बना दिया था। जैसे ही पूरा खीरा उनकी खाई की गहराइयों को छूने लगा, मीनाक्षी जी ने अपनी कमर को ऊपर की ओर झटका दिया और मुझे कसकर जकड़ लिया। हमने धीरे-धीरे खुदाई शुरू की। हर धक्के के साथ उनके तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके मटर बार-बार मेरी छाती से टकरा रहे थे। कमरे में थप-थप की आवाज़ गूँजने लगी और पसीने की बूंदें हमारे शरीरों पर चमकने लगीं।
‘और तेज समीर, मुझे पूरी तरह से खोदो,’ वह चिल्ला रही थीं। उनकी आँखों में अब एक जंगलीपन था। मैंने उनकी पोजीशन बदली और उन्हें पिछवाड़े से खोदने के लिए घोड़ी बना दिया। उनके भारी पिछवाड़े के बीच से उनकी खाई का वह गुलाबी हिस्सा और भी उत्तेजक लग रहा था। मैंने अपने खीरे को पीछे से उनकी खाई में उतारा और पूरी ताकत से धक्के मारने लगा। वह अपने दोनों हाथों से सोफे को कसकर पकड़े हुए थीं और हर धक्के पर उनकी सिसकारियां तेज होती जा रही थीं। खुदाई की वह प्रक्रिया इतनी गहन थी कि हमें समय और स्थान का कोई होश नहीं रहा। हम बस एक-दूसरे के शरीर में खो जाना चाहते थे।
काफी देर तक मूसलाधार खुदाई करने के बाद, मुझे महसूस हुआ कि अब मेरा अंत करीब है। मीनाक्षी जी भी अपनी चरम सीमा पर थीं, उनकी खाई अब मेरे खीरे को अंदर से कसकर जकड़ रही थी और उनकी सांसें बहुत तेज और उखड़ी हुई थीं। उन्होंने चिल्लाते हुए कहा, ‘समीर, मेरा रस निकलने वाला है, मुझे और जोर से खोदो!’ मैंने अपनी पूरी ताकत झोंक दी और कुछ ही क्षणों में हम दोनों का रस एक साथ छूट गया। उनके शरीर में एक जोरदार कंपन हुआ और वह सोफे पर निढाल होकर गिर पड़ीं। मेरा खीरा भी अपना सारा रस उनकी खाई की गहराइयों में छोड़कर धीरे-धीरे शांत होने लगा। वह पल बहुत ही सुकून भरा और भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ था।
खुदाई के बाद हम दोनों काफी देर तक एक-दूसरे की बाहों में लिपटे रहे। मीनाक्षी जी का चेहरा पसीने से भीगा हुआ था और उनके बाल बिखरे हुए थे, लेकिन उनके चेहरे पर एक असीम शांति और संतुष्टि थी। उन्होंने मेरे माथे को चूमा और कहा, ‘आज तुमने मुझे फिर से जीवित कर दिया समीर।’ उनकी वह हालत, उनके बिखरे हुए कपड़े और कमरे में फैली उस खुदाई की महक सब कुछ बयां कर रही थी। हमने धीरे-धीरे अपने कपड़े पहने और ऑफिस की सफाई की ताकि किसी को कुछ पता न चले। लेकिन हमारे बीच अब एक ऐसा रिश्ता बन चुका था जो शब्दों से परे था। वह रात हमारे लिए सिर्फ एक शारीरिक मिलन नहीं, बल्कि दो रूहों का एक-दूसरे में समा जाने का जरिया बन गई थी।