सुमन की रसीली चुदाई—>
दोपहर की चिलचिलाती धूप में समीर अपनी मौसी सुमन के घर पहुँचा था। पूरा मोहल्ला सन्नाटे में डूबा हुआ था और घर के अंदर कूलर की हल्की गूँज सुनाई दे रही थी। मौसा जी एक हफ्ते के लिए शहर से बाहर गए थे, इसलिए सुमन घर पर अकेली थीं। समीर जैसे ही ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठा, सुमन उसके लिए ठंडा पानी लेकर आईं। उन्होंने एक बहुत ही पतली और पारभासी साड़ी पहनी थी, जिसके नीचे से उनके बदन की गोराई साफ़ झलक रही थी। समीर की उम्र चौबीस साल थी और वह पहली बार अपनी मौसी को इस तरह एक जवान औरत की नजर से देख रहा था। सुमन के चेहरे पर बिखरी लटें और उनकी आँखों में छिपी एक अनजानी सी प्यास समीर के दिल की धड़कनें बढ़ा रही थी। समीर ने पानी का गिलास थामते हुए महसूस किया कि उसकी उँगलियाँ सुमन की गरम हथेलियों से टकरा गई हैं, जिससे उसके पूरे शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई।
सुमन का शरीर किसी अनुभवी मूर्तिकार की उत्कृष्ट रचना जैसा था। उनके दो विशाल और रसीले तरबूज उनकी चोली के भीतर से बाहर निकलने को छटपटा रहे थे, जैसे वो किसी कैद से आजाद होना चाहते हों। जब भी वो साँस लेती थीं, वे तरबूज ऊपर-नीचे होते हुए समीर के संयम की परीक्षा लेते थे। उनका पिछवाड़ा इतना भरा हुआ और सुडौल था कि साड़ी के कपड़े में भी उसकी गोलाई साफ़ पहचानी जा सकती थी। सुमन के चलने पर उनके पिछवाड़े का जो उतार-चढ़ाव दिखता था, उसने समीर के भीतर एक ज्वालामुखी सा दहका दिया था। उनकी कमर पर जमी हल्की सी चर्बी और उनकी नाभि की गहराई किसी को भी अपना दीवाना बनाने के लिए काफी थी। समीर बस टकटकी लगाए उनके शरीर के एक-एक हिस्से को अपनी आँखों में भर लेना चाहता था, क्योंकि आज से पहले उसने कभी अपनी मौसी के इतने करीब से उनके अंगों का अवलोकन नहीं किया था।
बातों-बातों में शाम ढलने लगी और घर में धीरे-धीरे अंधेरा छाने लगा। सुमन ने अपनी तन्हाई का जिक्र करते हुए समीर को बताया कि मौसा जी के बिना उन्हें रात में डर लगता है और वो खुद को बहुत अकेला महसूस करती हैं। समीर ने गौर किया कि उनकी आवाज में एक अजीब सी थरथराहट थी, जो उनकी कामुक इच्छाओं की ओर इशारा कर रही थी। सुमन समीर के बगल में ही सोफे पर आकर बैठ गईं, जिससे उनके शरीर की सोंधी खुशबू समीर के नथुनों में समाने लगी। उन दोनों के बीच एक भावनात्मक जुड़ाव पहले से ही था, लेकिन आज उस जुड़ाव ने एक नई और गहरी जिस्मानी चाहत का रूप ले लिया था। समीर को लगा कि शायद सुमन भी वही महसूस कर रही हैं जो उसके मन में चल रहा है, क्योंकि उनकी नजरें बार-बार समीर के मजबूत कंधों और उसकी भुजाओं पर टिक रही थीं।
किचन में खाना बनाते समय सुमन पसीने से तर-बतर हो गई थीं, जिससे उनकी साड़ी उनके बदन से चिपक गई थी। समीर मदद करने के बहाने किचन में गया और जैसे ही वह उनके पीछे खड़ा हुआ, उसे सुमन के शरीर की तपिश महसूस हुई। समीर ने धीरे से अपना हाथ उनकी कमर पर रखा, जिससे सुमन के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उन्होंने समीर को मना नहीं किया, बल्कि पीछे मुड़कर अपनी भीगी आँखों से उसे देखा। समीर ने देखा कि पसीने की बूंदें उनके गले से फिसलकर उनके तरबूजों के बीच की गहरी घाटी में समा रही थीं। उस पल समीर का हाथ धीरे से सरकते हुए उनके तरबूजों की ओर बढ़ने लगा, जहाँ उसने महसूस किया कि उनके मटर पूरी तरह से सख्त हो चुके थे, जो उनकी उत्तेजना का प्रमाण दे रहे थे।
दोनों के बीच एक पल के लिए झिझक आई, जैसे कि समाज और रिश्तों की दीवारें उन्हें रोक रही हों, लेकिन मन के संघर्ष पर जिस्मानी भूख भारी पड़ने लगी। सुमन ने समीर का हाथ पकड़कर उसे अपने कमरे की ओर खींच लिया। कमरे की मद्धम रोशनी में उन्होंने एक-दूसरे को देखा और बिना कुछ कहे ही कपड़े उतारने लगे। समीर ने जब सुमन के तरबूजों को उनके ब्लाउज से आजाद किया, तो वे उछलकर बाहर आ गए। समीर ने अपनी जीभ से उनके गुलाबी मटरों को सहलाना शुरू किया, जिससे सुमन के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकल पड़ी। उनकी आँखें बंद हो गईं और वे समीर के बालों में अपनी उँगलियाँ फिराने लगीं। समीर अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था और उसकी नजरें नीचे की ओर सुमन की उस गीली और रसीली खाई पर टिकी थीं।
समीर ने सुमन को बिस्तर पर लिटाया और उनके पैरों को फैलाकर उनकी रेशमी खाई का मुआयना करने लगा। वहाँ घने और काले बाल थे जो उस पवित्र द्वार की रक्षा कर रहे थे। समीर ने अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया, तो सुमन का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया। वह बार-बार समीर का सिर अपनी खाई की ओर दबा रही थीं, जैसे वो चाहती हों कि समीर उस गहराई का सारा रस पी जाए। सुमन की खाई से निकलता हुआ चिकना पानी समीर के चेहरे पर लग रहा था, जिसने उसे और भी ज्यादा उत्तेजित कर दिया। सुमन अब बिस्तर पर तड़प रही थीं और उनकी सिसकियाँ कमरे के सन्नाटे को चीर रही थीं। उन्होंने समीर के हाथ को पकड़कर अपने खीरे की ओर बढ़ाया, जो अब पत्थर की तरह सख्त और तना हुआ खड़ा था।
समीर ने अपना खीरा सुमन के हाथों में दिया, जिन्होंने उसे तुरंत अपने मुँह में ले लिया। सुमन जिस तरह से समीर के खीरे को चूस रही थीं, उससे समीर को जन्नत का अहसास होने लगा। वह उनके मुँह की गर्मी और उनकी जीभ की लज्जत का आनंद ले रहा था। कुछ देर बाद, सुमन ने समीर को अपने ऊपर आने का इशारा किया। समीर ने अपनी स्थिति संभाली और अपने खीरे की नोक को सुमन की रसीली खाई के मुहाने पर रखा। जैसे ही उसने पहला धक्का लगाया, सुमन ने जोर से समीर के कंधों को पकड़ लिया और उनके मुँह से एक दर्दभरी लेकिन आनंददायक कराह निकली। खाई बहुत तंग थी, लेकिन समीर की मेहनत और सुमन की नमी ने धीरे-धीरे रास्ता बना दिया और समीर का पूरा खीरा उस गहराई में समा गया।
अब कमरे में सिर्फ थप-थप की आवाजें गूँज रही थीं। समीर बहुत धीमी गति से खुदाई कर रहा था, ताकि सुमन उस अहसास के हर कतरे को महसूस कर सकें। वह बार-बार उनके होठों का रस चूसता और फिर अपनी खुदाई की रफ्तार बढ़ा देता। सुमन भी नीचे से अपने पिछवाड़े को ऊपर उठाकर समीर का साथ दे रही थीं। जैसे-जैसे खुदाई तेज होती गई, दोनों के शरीर पसीने से भीग गए। समीर ने अब सुमन को पलटा दिया और पिछवाड़े से खुदाई शुरू की। यह स्थिति और भी रोमांचक थी क्योंकि समीर को अब सुमन के भारी पिछवाड़े के हिलने का नजारा भी मिल रहा था। सुमन बार-बार कह रही थीं, ‘हाँ समीर, और तेज… और गहराई तक खोदो, मुझे पूरी तरह अपना बना लो।’
खुदाई की प्रक्रिया अब अपने चरम पर पहुँच रही थी। समीर ने दोबारा सुमन को सीधा किया और उनके पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। वह पूरी ताकत से उनके अंदर अपने खीरे को उतार रहा था। हर धक्के के साथ सुमन का शरीर उछल रहा था और उनकी आवाजें अब चीखों में बदल रही थीं। अचानक सुमन के शरीर में एक जोरदार कंपन हुआ और उनकी खाई से रसीला तरल पदार्थ बाहर बहने लगा। उनका रस निकलते ही वे शांत हो गईं, लेकिन समीर अभी भी जारी था। कुछ ही सेकंड बाद, समीर को भी महसूस हुआ कि उसका सब्र टूट रहा है। उसने अंतिम कुछ जोरदार धक्के लगाए और अपना सारा गरम रस सुमन की खाई की गहराई में उड़ेल दिया।
खुदाई खत्म होने के बाद दोनों एक-दूसरे की बाँहों में सिमटकर लेट गए। कमरे में भारी साँसों की आवाजें अभी भी गूँज रही थीं। समीर ने देखा कि सुमन के चेहरे पर एक अजीब सा सुकून और संतोष था, जो शायद उन्हें सालों से नहीं मिला था। उनके शरीर अभी भी एक-दूसरे से सटे हुए थे और पसीना आपस में मिल रहा था। सुमन ने समीर के माथे को चूमते हुए कहा कि आज उसने उसे एक नई जिंदगी दी है। उस रात के बाद उनके रिश्ते में एक गहरा राज शामिल हो गया था, जिसे वे दोनों हमेशा अपने दिलों में संजोकर रखने वाले थे। वे जानते थे कि यह सिर्फ जिस्मानी भूख नहीं थी, बल्कि दो अकेले रूहों का मिलन था जिसने उन्हें उस रात पूरी तरह तृप्त कर दिया था।