Join WhatsApp Click Here
Join Telegram Click Here

कविता की रसीली चु@@ई


कविता की रसीली चु@@ई—>

समीर अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद शहर वापस आया था और कुछ दिनों के लिए अपने बड़े भाई के घर रुकने वाला था। उसकी भाभी कविता, उम्र में उससे करीब आठ साल बड़ी थी, लेकिन उसकी खूबसूरती और व्यक्तित्व में एक ऐसी कशिश थी कि समीर बचपन से ही उसका दीवाना था। कविता एक आधुनिक महिला थी जो घर और बाहर के कामों को बखूबी संभालती थी। वह अक्सर घर में पतली और पारभासी साड़ियां पहनती थी, जिससे उसका सुडौल बदन रह-रह कर समीर की नज़रों को अपनी ओर खींच लेता था। भाई अक्सर काम के सिलसिले में शहर से बाहर रहते थे, इसलिए समीर और कविता को एक-दूसरे के साथ काफी समय बिताने का मौका मिलता था। उस दोपहर भी घर में सन्नाटा था और बाहर की गर्म हवाएं खिड़कियों से टकरा रही थीं, लेकिन घर के भीतर एक अलग ही तरह की गर्मी पनप रही थी।

कविता उस दिन हल्के नीले रंग की शिफॉन की साड़ी पहने हुए रसोई में कुछ काम कर रही थी। समीर की नज़रें बार-बार उसके शरीर के उन हिस्सों पर जा टिकतीं जो साड़ी के महीन कपड़े से साफ झलक रहे थे। कविता के शरीर का ऊपरी हिस्सा बहुत ही आकर्षक था, उसके दोनों तरबूज किसी रसीले फल की तरह ब्लाउज के भीतर दबे हुए थे और उनके ऊपर के मटर साफ़ तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे। जब वह झुकती, तो साड़ी का पल्लू खिसक जाता और उसके तरबूजों के बीच की गहरी घाटी समीर को मदहोश कर देती। उसका पिछवाड़ा भी साड़ी के नीचे से इतना गदराया हुआ और गोल था कि समीर को अपनी नज़रों पर काबू रखना मुश्किल हो रहा था। उसके चलने के अंदाज़ में एक ऐसी लय थी कि समीर का दिल हर कदम के साथ तेज़ी से धड़कने लगता था।

जैसे-जैसे दिन ढलता गया, उन दोनों के बीच की नज़दीकियां बढ़ने लगीं। समीर ने महसूस किया कि कविता भी उसे कुछ अलग नज़रों से देख रही है। जब वह चाय लेकर समीर के पास आई, तो जानबूझकर उसका हाथ समीर के हाथ से टकरा गया। वह एक छोटा सा स्पर्श था, लेकिन इसने समीर के पूरे शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ा दी। कविता की आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जिसमें निमंत्रण भी था और थोड़ी झिझक भी। समीर ने उसकी आँखों में झाँका और उसे लगा जैसे वह अपनी अधूरी इच्छाओं की दास्तां सुना रही हो। दोनों के बीच कोई शब्द नहीं बोले गए, लेकिन हवा में एक भारीपन था जो उनकी बढ़ती हुई उत्तेजना का प्रमाण दे रहा था। समीर ने धीरे से कविता का हाथ पकड़ लिया और उसे अपनी ओर खींचा, जिससे वह हड़बड़ा कर उसके पास सोफे पर गिर पड़ी।

समीर ने अब और इंतज़ार नहीं किया और कविता के रेशमी बालों को पीछे करते हुए उसके चेहरे को अपनी ओर मोड़ लिया। कविता की साँसें तेज़ हो चुकी थीं और उसकी आँखों में समर्पण का भाव था। समीर ने धीरे से उसके माथे पर अपने होंठ रखे और फिर धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ते हुए उसकी गर्दन तक आ गया। कविता के मुँह से एक धीमी कराह निकली और उसने समीर के कंधों को कसकर पकड़ लिया। समीर की उँगलियाँ अब कविता के तरबूजों के ऊपर रेंग रही थीं, वह उन्हें हल्के से दबा रहा था। कविता के मटर अब और भी सख्त हो गए थे, जो समीर की हथेलियों को गुदगुदा रहे थे। समीर ने धीरे से साड़ी का पल्लू पूरी तरह से हटा दिया, जिससे उसके विशाल और दूधिया तरबूज पूरी तरह से उजागर हो गए।

समीर की प्यास अब बढ़ती जा रही थी, उसने कविता के ब्लाउज की हुक एक-एक करके खोल दी। जैसे ही ब्लाउज खुला, कविता के तरबूज आज़ाद होकर बाहर आ गिरे। समीर ने बिना देर किए अपना मुँह एक तरबूज पर रख दिया और उसके मटर को धीरे-धीरे चूसने लगा। कविता का पूरा शरीर कांपने लगा और वह समीर के बालों में अपनी उँगलियाँ फँसाकर उसे अपने और करीब खींचने लगी। समीर का हाथ अब नीचे की ओर बढ़ा और वह कविता की जाँघों को सहलाते हुए उसकी खाई के पास पहुँचा। साड़ी और पेटीकोट के नीचे से ही समीर ने महसूस किया कि कविता की खाई पूरी तरह से गीली हो चुकी थी। वहाँ के बाल कोमल थे और उनमें से एक भिनी-भिनी प्राकृतिक खुशबू आ रही थी। समीर ने धीरे से अपनी उंगली खाई में डाली, जिससे कविता ने एक लंबी आह भरी।

अब समीर ने अपने कपड़े उतार दिए और उसका विशाल खीरा पूरी तरह से खड़ा होकर अपनी ताकत दिखा रहा था। कविता ने पहली बार समीर के खीरे को देखा तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने अपने कांपते हाथों से उस खीरे को थामा और उसे सहलाने लगी। खीरे की गर्मी और कठोरता ने कविता के भीतर की प्यास को और भड़का दिया। समीर ने अब कविता को पूरी तरह निर्वस्त्र कर दिया और उसे बिस्तर पर लिटा दिया। उसने कविता की जाँघों को फैलाया और उसकी रसीली खाई पर अपनी जुबान फिराने लगा। कविता बिस्तर पर मछली की तरह तड़पने लगी, जब समीर की जुबान उसकी खाई के हर कोने को चाट रही थी। उसका रस अब बहकर चादर को गीला कर रहा था और वह बस समीर के खीरे को अपने भीतर लेने के लिए बेताब थी।

समीर ने खुद को कविता के ऊपर व्यवस्थित किया और अपने खीरे का सिरा उसकी तंग खाई के मुहाने पर रखा। धीरे से एक धक्का दिया, और खीरा आधी गहराई तक खाई के भीतर समा गया। कविता के मुँह से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि चरम सुख की थी। समीर ने अपनी रफ्तार बढ़ाई और अब वह पूरी ताकत से सामने से खोदना शुरू कर चुका था। हर धक्के के साथ कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और पूरे कमरे में उनके शरीर के टकराने की आवाज़ गूँज रही थी। समीर ने कविता के हाथों को ऊपर की ओर पकड़ लिया और गहराई से खुदाई करने लगा। कविता अब बेकाबू हो चुकी थी, वह समीर के नाम को पुकार रही थी और अपनी कमर को ऊपर उठा-उठाकर समीर का साथ दे रही थी।

खुदाई की यह प्रक्रिया काफी लंबी चली, समीर ने अब कविता को घुमाकर पिछवाड़े से खोदने का मन बनाया। उसने कविता को घुटनों के बल खड़ा किया और पीछे से अपना खीरा फिर से उसकी खाई में उतार दिया। यह स्थिति और भी उत्तेजक थी क्योंकि यहाँ से समीर को कविता के पिछवाड़े का पूरा नज़ारा मिल रहा था। वह अपने खीरे को पूरी गहराई तक डाल रहा था और कविता के पिछवाड़े पर थप्पड़ मारते हुए तेज़ी से खुदाई कर रहा था। अंत में, समीर को महसूस हुआ कि उसका रस छूटने वाला है। उसने आखिरी कुछ तेज़ धक्के मारे और अपना पूरा रस कविता की गहरी खाई के भीतर उड़ेल दिया। कविता भी उसी समय झड़ गई और दोनों पसीने से लथपथ एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े। कमरे में अब सिर्फ उनकी भारी साँसों की आवाज़ थी, जो एक तृप्त कर देने वाली जंग की गवाह थी।

Leave a Comment