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अजनबी संग चु@@ई


अजनबी संग चु@@ई —>

राजधानी एक्सप्रेस की गड़गड़ाहट और रात का गहराता सन्नाटा एक अजीब सी मादकता घोल रहा था। समीर अपनी सीट पर बैठा सामने वाली बर्थ पर बैठी महिला को देख रहा था जिसका नाम कविता था। वह लगभग अड़तीस साल की थी और उसकी देह से एक परिपक्व स्त्री की खुशबू आ रही थी। कविता ने गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी जो उसके अंगों से इस कदर चिपकी थी जैसे उसकी त्वचा का ही हिस्सा हो। उसकी साड़ी के पतले पल्ले से झांकते उसके भारी और रसीले तरबूज समीर की धड़कनों को अनियंत्रित कर रहे थे।

कविता के शरीर की बनावट किसी कुशल मूर्तिकार की कलाकृति जैसी थी जो हर मोड़ पर कामुकता बिखेर रही थी। जब वह अपना बैग ऊपर रखने के लिए उठी तो उसका भारी और गोल पिछवाड़ा साड़ी के कपड़े को चीर देने पर आमादा लग रहा था। उसकी कमर का घेरा और वहां पर पड़ने वाली सिलवटें किसी भी पुरुष के मन में खुदाई की तीव्र इच्छा जगाने के लिए काफी थीं। उसके ब्लाउज की तंग फिटिंग के कारण उसके तरबूज ऊपर की ओर उभरे हुए थे और उनके ऊपर उभरे हुए छोटे-छोटे मटर साफ देखे जा सकते थे जो शायद ठंड या किसी और उत्तेजना की वजह से सख्त हो गए थे।

समीर ने बात शुरू करने के लिए पानी की बोतल की पेशकश की जिसे कविता ने एक हल्की मुस्कान के साथ स्वीकार कर लिया। उस मुस्कान ने समीर के दिल में एक हलचल मचा दी और दोनों के बीच बातों का सिलसिला चल पड़ा। कविता के बोलने का अंदाज बहुत ही गहरा और संवेदी था जैसे वह हर शब्द को चख कर बोल रही हो। रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे और डिब्बे की लाइटें मद्धम हो गई थीं जिससे एक रहस्यमयी और अंतरंग माहौल बन गया था। समीर ने महसूस किया कि कविता की निगाहें भी उसके चौड़े कंधों और मजबूत बाहों पर टिक रही थीं जिससे खिंचाव और बढ़ गया।

बातों-बातों में कब दोनों के बीच की दूरी कम हुई यह पता ही नहीं चला और अब वे एक ही बर्थ पर करीब बैठे थे। ट्रेन के एक अचानक लगे झटके ने कविता को समीर की बाहों में ढकेल दिया और उस स्पर्श ने आग में घी का काम किया। समीर ने महसूस किया कि कविता का शरीर गर्म था और उसके तरबूज उसके सीने से बुरी तरह रगड़ खा रहे थे। कविता ने खुद को अलग करने की कोशिश नहीं की बल्कि उसने अपनी आँखें मूंद लीं और एक लंबी सांस ली जो समीर की गर्दन पर महसूस हुई।

समीर का हाथ धीरे से कविता की कमर पर गया जहाँ साड़ी और ब्लाउज के बीच की नग्न त्वचा रेशम की तरह मुलायम थी। उसने अपनी उंगलियों को वहाँ धीरे-धीरे फिराना शुरू किया जिससे कविता के शरीर में एक कंपन पैदा हुआ। उसने कराहते हुए समीर का हाथ पकड़ना चाहा लेकिन उसकी पकड़ ढीली पड़ गई और वह समीर की ओर और ज्यादा झुक गई। समीर ने अपनी हिम्मत जुटाई और अपना हाथ ऊपर ले जाते हुए उसके भारी तरबूज को अपनी हथेली में भर लिया जो बहुत ही कोमल और वजनदार थे।

कविता के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकली और उसने समीर के गले में अपनी बाहें डाल दीं। समीर ने उसके होंठों को अपने काबू में लिया और उन पर शहद सा स्वाद महसूस करने लगा जिसे वह बड़े चाव से चखने लगा। उसके हाथ अब कविता की साड़ी के नीचे सरकने लगे थे जहाँ उसे घने और रेशमी बाल महसूस हुए जो उसकी गहरी खाई के द्वार पर पहरा दे रहे थे। कविता की साँसें अब तेज हो चुकी थीं और वह अपनी कमर को समीर की ओर धकेल रही थी जैसे उसे किसी गहरी चीज की प्यास हो।

समीर ने अपनी पैंट की जिप खोली और अपना कड़ा और लंबा खीरा बाहर निकाला जो अब फटने को तैयार था। कविता ने जैसे ही उस गर्म खीरे को अपनी हथेलियों में महसूस किया उसकी आँखें फैल गईं और उसने उसे जोर से जकड़ लिया। उसने झुककर उस खीरे को अपने मुँह में लेना शुरू किया और अपनी जीभ से उसके ऊपरी हिस्से को सहलाने लगी। समीर की हालत खराब हो रही थी क्योंकि कविता का खीरा चूसना इतना प्रभावी था कि उसे लग रहा था उसका रस अभी निकल जाएगा।

अब सब्र का बांध टूट चुका था और समीर ने कविता को बर्थ पर लिटा दिया और उसकी साड़ी और पेटीकोट को ऊपर की ओर सरका दिया। उसकी गोरी और मांसल जांघों के बीच छिपी हुई खाई अब पूरी तरह से गीली और आमंत्रित कर रही थी। समीर ने अपनी उंगली से खोदना शुरू किया तो कविता ने अपनी टांगें फैला दीं और अपने तरबूजों को हाथों से दबाने लगी। उसकी मटर जैसी निप्पल अब पूरी तरह से खड़ी हो गई थीं जिन्हें समीर ने अपने मुँह में भरकर चूसना शुरू किया।

समीर ने अब खुद को व्यवस्थित किया और अपने खीरे को कविता की खाई के मुहाने पर टिका दिया जो रस से लबालब भरी हुई थी। उसने धीरे से दबाव डाला और उसका खीरा मांस की उन तंग दीवारों को चीरता हुआ अंदर समाने लगा। कविता ने एक दर्द और सुख भरी चीख मारी और समीर की पीठ में अपने नाखून गड़ा दिए। जैसे ही पूरा खीरा अंदर गया समीर को ऐसा लगा जैसे वह जन्नत के किसी गर्म सोते में उतर गया हो और कविता की खाई उसे कसकर पकड़ रही थी।

खुदाई की यह प्रक्रिया अब पूरी लय में शुरू हो चुकी थी और समीर बहुत ही धीमी गति से बाहर-अंदर हो रहा था। हर धक्के के साथ कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके बीच पसीने की बूंदें चमक रही थीं। समीर ने कविता को घुमाकर उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू किया जो एक नया और रोमांचक अनुभव था। कविता के पिछवाड़े की गोलाई समीर की जांघों से टकरा रही थी और थप्प-थप्प की आवाज पूरे केबिन में गूंज रही थी जो बहुत ही उत्तेजक लग रही थी।

कविता अब पूरी तरह से नियंत्रण खो चुकी थी और वह बेतहाशा समीर के खीरे को अपनी खाई में और गहरा लेने की कोशिश कर रही थी। समीर ने उसे फिर से सामने से खोदना शुरू किया और अपनी रफ्तार बढ़ा दी जिससे घर्षण और बढ़ गया। दोनों के शरीर पसीने से तर-बतर थे और उनकी साँसें एक सुर में चल रही थीं। कविता की कराहें अब तेज चीखों में बदलने लगी थीं क्योंकि वह अपने चरमोत्कर्ष के करीब पहुँच रही थी।

अचानक कविता का पूरा शरीर अकड़ गया और उसकी खाई ने समीर के खीरे को पागलों की तरह जकड़ लिया। उसका रस छूटने लगा और वह समीर के नीचे पूरी तरह से ढीली पड़ गई जबकि समीर ने भी अपने अंतिम धक्के मारे और अपना सारा गर्म रस उसकी खाई की गहराइयों में छोड़ दिया। यह एक ऐसा अहसास था जैसे दो आत्माएं एक-दूसरे में विलीन हो गई हों। कई मिनटों तक दोनों एक-दूसरे से लिपटे रहे और शांत होने का इंतजार करते रहे।

जब उनकी साँसें सामान्य हुईं तो कविता ने समीर की आँखों में देखा जिसमें अब एक अजीब सा सुकून और लगाव था। उसने धीरे से समीर का माथा चूमा और उसके सीने पर अपना सिर रख दिया जैसे वह वहीं सो जाना चाहती हो। ट्रेन अब भी अपनी गति से चली जा रही थी लेकिन उन दोनों की दुनिया उस छोटे से केबिन में सिमट गई थी जहाँ अभी-अभी एक अजनबी रिश्ता रूहानी गहराई तक पहुँच गया था।

सुबह जब स्टेशन करीब आया तो दोनों ने एक-दूसरे को चुपचाप देखा और बिना कुछ कहे अपनी-अपनी राहें चुन लीं। लेकिन उनके शरीर पर एक-दूसरे की खुशबू और जेहन में वह खुदाई की रात हमेशा के लिए दर्ज हो गई थी। वह सफर सिर्फ दो शहरों के बीच का नहीं था बल्कि दो अजनबियों के बीच की कामुक यात्रा थी जिसने उन्हें जीवन भर के लिए एक अनकहा जुड़ाव दे दिया था।

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