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पुरानी दोस्त की चु@@ई

समीर और नेहा कॉलेज के दिनों से ही एक-दूसरे के बेहद करीब थे, लेकिन वक्त की लहरों ने उन्हें अलग कर दिया था। आठ साल बाद जब एक निजी पार्टी में उनकी मुलाकात हुई, तो समीर की धड़कनें तेज हो गईं। नेहा अब पहले से कहीं ज्यादा परिपक्व और आकर्षक लग रही थी। उसने गहरे बैंगनी रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी, जिसका गला काफी गहरा था। उस गहरे गले से उसके उभरे हुए रसीले तरबूज आधी से ज्यादा बाहर झांक रहे थे, जो समीर की आंखों को अपनी ओर खींच रहे थे। समीर ने जब उसे देखा, तो उसे अपने शरीर में एक अजीब सी सिहरन महसूस हुई, जो बरसों से शांत पड़ी थी।

नेहा का शरीर अब पूरी तरह से ढल चुका था। उसकी कमर की गोलाई और उसके भारी तरबूज किसी भी पुरुष को पागल करने के लिए काफी थे। जब वह चलती थी, तो उसके तरबूज आपस में रगड़ खाते हुए एक अद्भुत दृश्य पैदा करते थे। समीर की निगाहें बार-बार नेहा के उन उभारों पर टिक जाती थीं, जहां से उसके रेशमी कपड़े के नीचे दबे मटर साफ दिखाई दे रहे थे। समीर के मन में पुरानी यादें और वर्तमान की कामुकता का एक ऐसा संगम हुआ कि उसके पायजामे के अंदर उसका खीरा धीरे-धीरे सिर उठाने लगा। वह चाहकर भी अपनी उत्तेजना को नेहा से छिपा नहीं पा रहा था।

जैसे-जैसे रात परवान चढ़ी, दोनों पार्टी के शोर-शराबे से दूर बालकनी में आ गए। वहां सन्नाटा था और सिर्फ उनकी सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। समीर ने धीरे से नेहा का हाथ थामा, तो नेहा की उंगलियां कांपने लगीं। नेहा ने समीर की आंखों में देखा और उसे महसूस हुआ कि समीर की आंखों में उसके लिए कितनी गहरी प्यास है। समीर ने धीरे से उसके चेहरे को छुआ और फिर उसके गले की ओर बढ़ा। नेहा की सांसें अब तेज हो चुकी थीं। उसके तरबूज ऊपर-नीचे हो रहे थे, जैसे वे भी समीर के स्पर्श के लिए बेताब हों। उन दोनों के बीच एक भावनात्मक खिंचाव था, जो अब शारीरिक मिलन की ओर बढ़ रहा था।

नेहा ने दबी आवाज में कहा, ‘समीर, यह गलत है, पर मेरा मन तुम्हारे पास आने से रुक नहीं रहा।’ समीर ने उसके कान के पास झुककर फुसफुसाते हुए कहा, ‘नेहा, यह सिर्फ आज की बात नहीं है, मैं बरसों से इसी पल का इंतजार कर रहा था।’ इतना कहते ही समीर ने नेहा को अपनी बाहों में भर लिया। नेहा के नर्म और गरम तरबूज समीर की छाती से सट गए। समीर को नेहा के शरीर की खुशबू ने मदहोश कर दिया था। उसने धीरे से नेहा की साड़ी का पल्लू नीचे गिरा दिया, जिससे उसके मटर और भी साफ दिखने लगे। समीर ने अपनी उंगलियों से उन मटरों को सहलाया, जिससे नेहा के मुंह से एक दबी हुई कराह निकल गई।

समीर अब और इंतजार नहीं कर सकता था। वह नेहा को उठाकर बेडरूम की ओर ले गया। कमरे में हल्की रोशनी थी। उसने नेहा को बिस्तर पर लिटाया और खुद उसके ऊपर झुक गया। समीर के हाथों ने नेहा के तरबूजों को अपनी मुट्ठी में भर लिया और उन्हें हल्के से दबाने लगा। नेहा की आंखें बंद हो गई थीं और वह बस उस आनंद में डूबी हुई थी। समीर ने धीरे-धीरे नेहा के सारे कपड़े उतार दिए। अब नेहा उसके सामने पूरी तरह से निर्वस्त्र थी। उसके घने बालों के बीच छिपी हुई खाई समीर को अपनी ओर बुला रही थी। समीर ने अपनी उंगलियों से उस खाई को टटोलना शुरू किया, जो पहले से ही गीली और गरम हो चुकी थी।

समीर ने अपना खीरा बाहर निकाला, जो अब पूरी तरह से सख्त और लंबा हो चुका था। नेहा ने जब उस विशाल खीरे को देखा, तो उसकी आंखें फटी रह गईं। उसने धीरे से अपने हाथ से उस खीरे को पकड़ा और उसे सहलाने लगी। समीर को ऐसा लगा जैसे उसके पूरे शरीर में बिजली दौड़ गई हो। नेहा ने उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे धीरे-धीरे चूसने लगी। समीर की कराहें अब कमरे में गूंजने लगी थीं। वह नेहा के सिर को पकड़कर उसे और भी गहराई से खीरा चूसने के लिए प्रेरित करने लगा। उस रसीले खीरे पर नेहा की जुबान का जादू समीर को पागल कर रहा था।

थोड़ी देर बाद समीर ने नेहा को घुमाया और उसे पिछवाड़े की ओर से तैयार किया। नेहा ने अपने पिछवाड़े को ऊपर उठाया, जिससे उसकी खाई पूरी तरह से समीर के सामने आ गई। समीर ने अपने खीरे के सिर को उस नम खाई पर रखा और धीरे से धक्का दिया। नेहा ने एक जोर की सिसकी भरी। जैसे ही आधा खीरा उस संकरी खाई के अंदर गया, नेहा के हाथ चादर को कसकर पकड़ने लगे। समीर ने धीरे-धीरे अपनी रफ्तार बढ़ानी शुरू की। वह हर धक्के के साथ नेहा की खाई की गहराई को नाप रहा था। कमरे में उनके शरीरों के टकराने की आवाजें और नेहा की सिसकियां एक मदहोश कर देने वाला संगीत पैदा कर रही थीं।

समीर अब पूरी तरह से लय में था। वह सामने से खोदना शुरू कर चुका था। नेहा की टांगें समीर के कंधों पर थीं और समीर पूरी ताकत से अपनी खुदाई जारी रखे हुए था। हर बार जब वह अपना खीरा पूरी गहराई तक अंदर डालता, नेहा की आंखें उलट जाती थीं। उसके तरबूज बुरी तरह से हिल रहे थे। समीर ने झुककर उन मटरों को अपने दांतों से हल्का सा काटा, जिससे नेहा का शरीर धनुष की तरह तन गया। ‘ओह समीर… और तेज… मुझे खोदो… मुझे खत्म कर दो…’ नेहा के इन शब्दों ने समीर के अंदर एक नया जोश भर दिया। वह अब बिना रुके लगातार खुदाई कर रहा था, जिससे नेहा की खाई से रस बहने लगा था।

जैसे-जैसे वे चरम की ओर बढ़ रहे थे, समीर की सांसें उखड़ रही थीं। नेहा की खाई अब बहुत ज्यादा गरम और तंग महसूस हो रही थी। समीर ने अपनी रफ्तार को चरम सीमा पर पहुँचा दिया। नेहा भी अब अपने रस छोड़ने के करीब थी। अचानक नेहा का पूरा शरीर कांपने लगा और उसके अंदर से गर्म रस की फुहारें फूट पड़ीं। ठीक उसी समय समीर का खीरा भी फट पड़ा और उसने अपना सारा गर्म रस नेहा की खाई के भीतर उंडेल दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े। पसीने से लथपथ उनके शरीर एक-दूसरे की गर्मी महसूस कर रहे थे। वह थकान और वह संतुष्टि उनके चेहरों पर साफ झलक रही थी।

कुछ देर बाद, जब उनकी सांसें सामान्य हुईं, समीर ने नेहा के माथे को चूमा। नेहा ने मुस्कुराते हुए समीर की छाती पर अपना सिर रख दिया। वह पल उनके लिए सिर्फ शारीरिक खुदाई नहीं था, बल्कि उनकी रूहों का मिलन था। समीर ने नेहा के बिखरे बालों को संवारा और उसे और करीब खींच लिया। बाहर की दुनिया से बेखबर, वे दोनों उस कमरे की शांति और अपनी मोहब्बत के एहसास में खो गए थे। नेहा को महसूस हुआ कि आज उसकी बरसों की प्यास बुझ गई है, और समीर को अपनी उस अधूरी कहानी का एक खूबसूरत अंजाम मिल गया था, जिसे वह कभी भुला नहीं पाया था।

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