साली की रसीली चु@@ई—>दोपहर की तपिश अपने चरम पर थी और समीर सोफे पर बैठा पुराने अखबार के पन्ने पलट रहा था, लेकिन उसका ध्यान खबरों में कम और रसोई से आ रही पायल की झनकार में ज्यादा था। समीर की पत्नी अपने मायके के काम से शहर से बाहर गई हुई थी और घर में वह अपनी साली, कविता के साथ अकेला था। कविता, जिसकी उम्र महज़ तेईस साल थी, वह अपनी जवानी के उस पड़ाव पर थी जहाँ उसका शरीर किसी पके हुए फल की तरह मिठास से भरा हुआ और मांसल नजर आता था। उसकी कमर की ढलान और उसके चलते समय होने वाली लचक समीर की धड़कनों को अक्सर बेकाबू कर देती थी, जिसे वह अब तक दबाता आया था। आज जब घर में कोई तीसरा नहीं था, तो हवाओं में भी एक अजीब सी मादकता और खामोशी घुली हुई थी जो दोनों के बीच एक अनकहे खिंचाव को जन्म दे रही थी।
कविता रसोई से बाहर आई, उसके चेहरे पर पसीने की नन्हीं बूंदें चमक रही थीं जो उसकी गोरी त्वचा पर ओस की तरह लग रही थीं। उसने एक बहुत ही चुस्त और गहरे गले वाला कुर्ता पहना हुआ था, जिसमें से उसके शरीर के दो भारी और गोल-मटोल तरबूज साफ तौर पर अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे। जब वह झुकी तो समीर की नजरें उन तरबूजों की गहराई में खो गईं, जहाँ कुर्ते की पतली परत के नीचे उसके नन्हे मटर अपनी कठोरता का परिचय दे रहे थे। कविता की बनावट ऐसी थी कि उसे देखने वाला कोई भी मर्द अपनी सुध-बुध खो बैठता था; उसके चौड़े कूल्हे और उभरा हुआ पिछवाड़ा हर कदम पर एक थिरकन पैदा करता था, जो समीर के मन में एक गहरी हलचल मचा रहा था। समीर ने महसूस किया कि उसका अपना खीरा धीरे-धीरे अपनी नींद से जाग रहा है और उसकी पैंट में तनाव पैदा कर रहा है।
समीर ने उसे पुकारा, ‘कविता, थोड़ा पानी मिलेगा? बहुत प्यास लगी है।’ कविता पानी का गिलास लेकर पास आई और सोफे के किनारे बैठ गई, उसके बैठने से कुर्ते का गला और थोड़ा ढीला हुआ जिससे उसके तरबूजों का ऊपरी हिस्सा और भी साफ दिखने लगा। समीर की सांसें तेज होने लगीं और उसने महसूस किया कि कविता भी उसे अपनी तिरछी नजरों से देख रही है, जिसमें एक अजीब सी शरारत और आमंत्रण था। ‘जीजा जी, आप इतना परेशान क्यों लग रहे हैं? क्या गर्मी ज्यादा सता रही है?’ उसने अपनी आवाज को थोड़ा धीमा और कामुक बनाते हुए पूछा। उसकी आवाज की थरथराहट ने समीर के शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ा दी और उसे लगा जैसे उसके मन का बांध अब टूटने ही वाला है। समीर ने हाथ बढ़ाकर गिलास पकड़ा, लेकिन जानबूझकर उसकी उंगलियों को कविता की हथेलियों से रगड़ दिया, जिससे कविता के चेहरे पर एक गुलाबी हया छा गई।
वह स्पर्श सिर्फ एक स्पर्श नहीं था, बल्कि एक मौन स्वीकृति थी जो उन दोनों के बीच के रिश्तों की मर्यादा को धीरे-धीरे धुंधला कर रही थी। समीर ने महसूस किया कि कविता ने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा, बल्कि उसकी उंगलियों के दबाव का जवाब अपनी उंगलियों से दिया। ‘जीजा जी, आपको पता है ना कि दीदी को आने में अभी दो दिन और लगेंगे?’ कविता ने अपनी पलकें झुकाते हुए फुसफुसाकर कहा, और उस एक वाक्य ने समीर के मन की सारी झिझक को जैसे कपूर की तरह उड़ा दिया। कमरे का तापमान अचानक बढ़ गया था और समीर की आँखों में एक ऐसी आग थी जो कविता के पूरे वजूद को पिघला देने के लिए काफी थी। उसने कविता की कमर पर अपना हाथ रखा, जहाँ उसके मांसल शरीर की कोमलता ने उसे पूरी तरह से मोहित कर लिया और उसे अपने और करीब खींच लिया।
कविता के जिस्म से मोगरे की हल्की खुशबू आ रही थी जो समीर के दिमाग पर नशा बनकर छाने लगी। समीर ने धीरे से अपना चेहरा कविता की गर्दन के पास ले जाकर उसकी खुशबू को गहराई से महसूस किया, जिससे कविता के शरीर में एक कंपकंपी दौड़ गई। ‘कविता, तुम बहुत सुंदर हो, इतनी कि मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ,’ समीर ने उसके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा। कविता ने एक गहरी आह भरी और अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह इस पल का कब से इंतजार कर रही थी। समीर के हाथ अब उसकी पीठ पर रेंग रहे थे और धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ते हुए उसके उभरे हुए पिछवाड़े को सहलाने लगे। कविता ने हल्का सा विरोध करने की कोशिश की, पर उसकी खुद की सांसें उसकी चाहत का सबूत दे रही थीं और वह समीर की बाहों में ढीली पड़ती चली गई।
समीर ने अब और इंतजार करना मुनासिब नहीं समझा और उसने कविता के गुलाबों को चखना शुरू कर दिया, उसके होठों का रस पीते हुए उसने उसे पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया। कविता ने भी अपनी बाहें समीर की गर्दन के चारों ओर लपेट दीं और इस मिलन का भरपूर साथ देने लगी। दोनों के बीच की झिझक अब पूरी तरह खत्म हो चुकी थी और वासना की एक तेज लहर उन दोनों को बहा ले जा रही थी। समीर के हाथ अब कविता के कुर्ते के नीचे पहुंच गए थे, जहाँ उसने पहली बार उसके रेशमी और भारी तरबूजों को अपने हाथों में भरा। उनका वजन और गर्माहट महसूस करते ही समीर के मुंह से एक दबी हुई कराह निकल गई और उसने उन तरबूजों के बीच मौजूद मटर को अपनी उंगलियों से सहलाना और हल्के से दबाना शुरू किया।
कविता की सिसकियां अब कमरे की खामोशी को चीर रही थीं, वह समीर के बालों में अपनी उंगलियां फंसाकर उसे और भी अपने करीब खींच रही थी। समीर ने धीरे-धीरे उसके कपड़े उतारने शुरू किए, और जब कविता पूरी तरह से कुदरती लिबास में उसके सामने आई, तो समीर उसकी सुंदरता देखकर दंग रह गया। उसका गोरा बदन, उसके सुडौल अंग और उसकी गहरी खाई, जिसके चारों ओर रेशमी बाल एक घने जंगल की तरह फैले हुए थे, सब कुछ किसी ख्वाब जैसा लग रहा था। समीर का अपना खीरा अब पूरी तरह से अकड़ चुका था और अपनी मुक्ति के लिए तड़प रहा था। उसने कविता को बिस्तर पर लिटाया और उसके पूरे बदन की पूजा करने लगा, कभी उसके तरबूजों को चखता तो कभी उसकी नाभि के पास जाकर गहरी सांसें भरता।
समीर अब कविता की गहरी खाई के पास पहुंचा, जहाँ से एक सोंधी सी महक आ रही थी जो उसे पागल करने के लिए काफी थी। उसने अपनी उंगली से खाई को टटोलना शुरू किया और पाया कि वह पहले से ही गीली और रसीली हो चुकी थी। कविता ने कमर ऊपर उठाई और समीर की उंगली की हलचल का जवाब अपनी आहों से देने लगी। ‘जीजा जी, प्लीज… अब और सहन नहीं होता,’ कविता ने सिसकते हुए कहा। समीर ने अब अपने खीरे को बाहर निकाला और उसकी लंबाई और मोटाई देखकर कविता की आँखें फटी की फटी रह गई। उसने कभी नहीं सोचा था कि समीर के पास इतना बड़ा और शक्तिशाली औजार होगा। समीर ने उसके चेहरे पर प्यार से हाथ फेरा और उसके माथे को चूमते हुए उसे शांत रहने का इशारा किया।
समीर ने अपने खीरे का सिरा कविता की रसीली खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से दबाव बनाया। जैसे ही खीरा अंदर जाने लगा, कविता के मुंह से एक दर्द और सुख की मिली-जुली चीख निकली। वह खाई बहुत तंग थी, और समीर को अंदर जाने में थोड़ी मशक्कत करनी पड़ रही थी, लेकिन कविता के रस ने उस रास्ते को सुगम बना दिया था। समीर ने एक जोरदार धक्का दिया और उसका आधा खीरा कविता की गहराई में समा गया। कविता ने समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए और अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। ‘ओह जीजा जी… बहुत बड़ा है… जान निकल रही है मेरी,’ कविता ने सिसकते हुए कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में एक अजीब सा सुकून भी था जो उस दर्द के ऊपर हावी हो रहा था।
समीर कुछ देर तक रुक गया ताकि कविता का शरीर उस फैलाव को स्वीकार कर सके, और फिर उसने धीरे-धीरे अपनी रफ्तार बढ़ानी शुरू की। वह पूरी तरह से सामने से खोदना शुरू कर चुका था, हर धक्के के साथ उसका खीरा कविता की खाई की गहराइयों को छू रहा था। कमरे में अंगों के टकराने की ‘चप-चप’ की आवाज़ गूँजने लगी जो किसी संगीत की तरह मधुर लग रही थी। कविता अब पूरी तरह से इस खेल में डूब चुकी थी, वह अपनी कमर ऊपर उठाकर समीर के हर धक्के का स्वागत कर रही थी। उसके तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और समीर उन्हें अपने हाथों में भरकर जोर-जोर से दबा रहा था, जिससे कविता का आनंद और भी बढ़ता जा रहा था।
जैसे-जैसे खुदाई की रफ्तार बढ़ती गई, दोनों के शरीर पसीने से तर-बतर हो गए। समीर ने अब कविता को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। इस स्थिति में कविता का पिछवाड़ा पूरी तरह से समीर के सामने था और उसके खीरे को एक अलग ही गहराई मिल रही थी। कविता ने अपने हाथ बिस्तर पर टिकाए हुए थे और उसका सिर नीचे की ओर झुका था, उसकी आहें अब ऊंचे स्वरों में बदल चुकी थीं। समीर ने अपने हाथों से उसके भारी कूल्हों को पकड़ा और जंगली तरीके से धक्के मारने लगा। ‘हाँ… ऐसे ही… और जोर से… फाड़ दो मुझे जीजा जी,’ कविता अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थी और अपनी मर्यादा भूलकर अपनी इच्छाओं को जुबान दे रही थी।
खुदाई का यह दौर काफी देर तक चला, दोनों के जिस्म एक-दूसरे की आग में जल रहे थे। समीर को महसूस हुआ कि अब उसका रस निकलने वाला है, और ठीक उसी समय कविता का बदन भी बुरी तरह से कांपने लगा। उसकी खाई समीर के खीरे को कसने लगी थी, जो इस बात का संकेत था कि कविता का भी रस छूटने वाला है। समीर ने अपनी रफ्तार को चरम पर पहुंचा दिया और कुछ अंतिम जोरदार धक्के मारे। ‘समीर… मैं जा रही हूँ… आह…!’ कविता ने चिल्लाकर कहा और उसका पूरा शरीर अकड़ गया, उसकी खाई से रसीला तरल पदार्थ बाहर निकलने लगा। ठीक उसी पल समीर ने भी अपना सारा गरम रस कविता की गहराई में उड़ेल दिया, जिससे उसे एक असीम सुख और शांति की अनुभूति हुई।
खुदाई खत्म होने के बाद दोनों एक-दूसरे की बाहों में निढाल होकर गिर पड़े। समीर की सांसें अभी भी तेज थीं और वह कविता के बालों को प्यार से सहला रहा था। कविता का चेहरा सुकून से दमक रहा था और उसकी आँखों में समीर के लिए एक नई तरह की मोहब्बत और अपनापन झलक रहा था। उन्होंने कई मिनटों तक एक शब्द भी नहीं बोला, बस एक-दूसरे की धड़कनों को महसूस करते रहे। कमरे की हवा अब ठंडी होने लगी थी, लेकिन उन दोनों के बीच की वह गर्मी अभी भी बरकरार थी जो आज के इस मिलन से पैदा हुई थी। कविता ने समीर की छाती पर अपना सिर रखा और धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, ‘जीजा जी, आज आपने मुझे वो एहसास कराया है जो मैंने कभी सपनों में भी नहीं सोचा था।’
समीर ने उसे और करीब खींच लिया और उसके माथे पर एक प्यार भरा चुंबन दिया। वह जानता था कि यह रिश्ता अब पहले जैसा नहीं रहेगा, इसमें एक ऐसा राज शामिल हो गया है जो उम्र भर उन्हें एक-दूसरे से जोड़कर रखेगा। दोपहर ढल चुकी थी और सूरज की मद्धम रोशनी खिड़की से अंदर आकर उनके नग्न शरीरों पर पड़ रही थी, जिससे वे और भी आकर्षक लग रहे थे। इस रसीली खुदाई ने न केवल उनके जिस्मों की प्यास बुझाई थी, बल्कि उनके मन के खालीपन को भी उस रोमांच से भर दिया था जिसकी तलाश वे अनजाने में बहुत समय से कर रहे थे। अब बस यादें थीं, सुकून था और आगे आने वाले उन पलों का इंतजार था जब वे फिर से इसी तरह एक-दूसरे में खो जाएंगे।