अजनबी रीता की चुदाई—>
बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और दिल्ली से मुंबई जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस अपनी पूरी रफ्तार से पटरी पर दौड़ रही थी। समीर अपनी खिड़की वाली सीट पर बैठा बाहर के अंधेरे में गिरती बूंदों को देख रहा था, तभी उसके सामने वाली सीट पर एक बेहद खूबसूरत महिला आकर बैठी। उसका नाम रीता था, जो अपनी सुनहरी साड़ी में किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। रीता के शरीर की बनावट ऐसी थी कि किसी भी मर्द का ईमान डोल जाए, उसके ब्लाउज से झांकते हुए उसके विशाल तरबूज हर धड़कन के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। समीर ने महसूस किया कि रीता की नजरें भी बार-बार उसकी ओर उठ रही थीं, जिससे माहौल में एक अजीब सी गर्माहट पैदा होने लगी थी।
रीता का रंग एकदम साफ था और उसके चेहरे पर एक प्राकृतिक चमक थी जो कोच की मद्धम रोशनी में और भी निखर रही थी। समीर की नजरें उसके तरबूजों के बीच बनी गहरी घाटी पर टिकी थीं, जहां पसीने की एक छोटी सी बूंद धीरे-धीरे नीचे की ओर फिसल रही थी। जैसे-जैसे रात गहराती गई, उन दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ और समीर को पता चला कि रीता भी अपनी निजी जिंदगी में काफी अकेली महसूस कर रही है। उसकी आवाज में एक ऐसी कशिश थी जो समीर के भीतर सोई हुई इच्छाओं को जगा रही थी। उन दोनों की आँखों में एक-दूसरे के प्रति आकर्षण साफ झलक रहा था, जो अब धीरे-धीरे एक गहरे खिंचाव में बदलने लगा था।
रात के ग्यारह बज चुके थे और कोच की लाइटें बंद कर दी गई थीं, सिर्फ नीली नाइट लैंप जल रही थी जो माहौल को और भी रूमानी बना रही थी। समीर ने अपना पैर हल्का सा आगे बढ़ाया और रीता के पैरों से छुआ दिया, लेकिन रीता ने अपना पैर पीछे नहीं खींचा बल्कि उसकी आँखों में देखते हुए एक शरारती मुस्कान दी। इस छोटे से स्पर्श ने समीर के शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ा दी और उसका खीरा धीरे-धीरे अपनी जगह बनाने लगा। रीता ने समीर की बेचैनी को भांप लिया था और उसने अपनी साड़ी के पल्लू को थोड़ा और सरका दिया, जिससे उसके विशाल तरबूज और भी स्पष्ट दिखने लगे थे और उनके ऊपर मौजूद मटर की आकृति भी साफ नजर आने लगी थी।
समीर अब खुद को रोक नहीं पा रहा था, वह उठकर रीता की सीट पर उसके बगल में जाकर बैठ गया और धीरे से अपना हाथ उसकी कमर पर रखा। रीता ने एक गहरी सांस ली और अपना सिर समीर के कंधे पर रख दिया, उसकी सांसों की गर्मी समीर की गर्दन पर महसूस हो रही थी। समीर ने अपनी उंगलियों से उसके तरबूजों को सहलाना शुरू किया, जो बेहद नरम और रसीले महसूस हो रहे थे। रीता के मुंह से एक धीमी कराह निकली और उसने समीर के हाथ को और मजबूती से अपने अंगों पर दबा लिया। वह बार-बार समीर के कान में फुसफुसा रही थी कि वह आज रात बस उसकी होकर रहना चाहती है और इस सफर को यादगार बनाना चाहती है।
समीर ने अपनी जुबां से रीता के गले और कंधों को चखना शुरू किया और फिर धीरे-धीरे नीचे उतरते हुए उसके तरबूजों के पास पहुंच गया। उसने ब्लाउज के ऊपर से ही उन विशाल फलों को अपने मुंह में भरा और मटर को अपनी जीभ से सहलाने लगा। रीता प्यास के मारे तड़प रही थी, उसकी उंगलियां समीर के बालों में फंस गई थीं और वह अपने कूल्हों को समीर की गोद में रगड़ रही थी। समीर का खीरा अब पूरी तरह से तैयार था और वह रीता की खाई में उतरने के लिए बेकरार हो रहा था। रीता ने समीर के हाथ को पकड़कर अपनी साड़ी के नीचे अपनी रेशमी खाई तक पहुंचाया, जो पहले से ही गीली और चिकनी हो चुकी थी।
समीर ने अपनी उंगली से खाई को खोदना शुरू किया, जिससे रीता का पूरा शरीर कांपने लगा और उसके मुंह से दबी हुई चीखें निकलने लगीं। उसने समीर के चेहरे को पकड़कर उसकी जुबां को चूसना शुरू किया और फिर धीरे से नीचे झुककर समीर की पेंट की जिप खोल दी। जैसे ही समीर का खीरा बाहर निकला, रीता की आँखें फटी की फटी रह गईं, वह इतना लंबा और सख्त था कि रीता ने तुरंत उसे अपने मुंह में ले लिया। वह बड़े चाव से खीरा चूसने लगी, उसकी जीभ खीरे के हर कोने को सहला रही थी जिससे समीर को स्वर्ग जैसा आनंद मिल रहा था। समीर ने उसे रोका और उसे सीट पर लेटा दिया ताकि वह इस खुदाई को अगले स्तर पर ले जा सके।
समीर ने रीता की टांगों को फैलाया और उसकी गहरी खाई के दर्शन किए, जहां छोटे-छोटे बाल उसे और भी आकर्षक बना रहे थे। उसने सबसे पहले अपनी जीभ से खाई चाटना शुरू किया, रीता अपने कूल्हे हवा में उठा रही थी और समीर को और गहराई तक जाने के लिए कह रही थी। उसकी खाई से निकलने वाला अमृत समीर को और भी पागल बना रहा था। फिर समीर ने अपने खीरे को रीता की खाई के मुहाने पर रखा और एक जोरदार धक्के के साथ अंदर डाल दिया। रीता ने समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए और दर्द और आनंद के मिश्रण से उसकी आँखें बंद हो गईं। सामने से खोदना इतना सुखद था कि दोनों की सांसें एक सुर में चलने लगी थीं।
समीर अब अपनी रफ्तार बढ़ा चुका था, वह पूरी ताकत से खुदाई कर रहा था और हर धक्के के साथ रीता का शरीर ऊपर की ओर उछल रहा था। कोच की वो संकरी सीट अब उनके मिलन का बिस्तर बन चुकी थी, जहां हर धक्के की गूंज समीर के कानों में संगीत की तरह बज रही थी। रीता बार-बार कह रही थी, “हाँ समीर, और तेज खोदो, मुझे पूरा भर दो!” समीर ने फिर रीता को घुमाया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, यह स्थिति रीता को और भी ज्यादा उत्तेजित कर रही थी। उसके तरबूज नीचे लटक रहे थे और समीर उन्हें अपने हाथों में भींचते हुए अपनी खुदाई जारी रखे हुए था।
दोनों का शरीर पसीने से तर-बतर हो चुका था, लेकिन उनकी भूख शांत होने का नाम नहीं ले रही थी। समीर ने एक बार फिर रीता को सीधा लेटाया और अपनी उंगली से खोदना और खीरे से खुदाई करना एक साथ शुरू किया। रीता के शरीर में एक अजीब सी थरथराहट होने लगी थी, उसके अंगों की पकड़ समीर के खीरे पर और भी मजबूत हो गई थी। कुछ ही पलों बाद रीता का रस निकलने लगा और वह समीर के नीचे ढीली पड़ गई, उसका शरीर आनंद की चरम सीमा को छू चुका था। समीर ने भी अपनी रफ्तार और तेज की और कुछ और जोरदार धक्कों के बाद अपने खीरे का पूरा रस रीता की गहरी खाई में उड़ेल दिया।
खुदाई खत्म होने के बाद दोनों एक-दूसरे की बाहों में लिपटे हुए भारी सांसें ले रहे थे, समीर का सिर रीता के तरबूजों के बीच आराम कर रहा था। ट्रेन अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही थी, लेकिन उन दोनों के लिए वक्त जैसे वहीं ठहर गया था। रीता ने समीर के माथे को चूमा और कहा कि यह उसकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत सफर था। समीर को भी अपनी इस अजनबी साथी से एक अनजाना सा लगाव महसूस हो रहा था, जो केवल शारीरिक नहीं बल्कि भावनात्मक भी था। सुबह जब स्टेशन आया, तो दोनों ने एक-दूसरे को विदा किया, लेकिन उनके दिलों में उस रात की खुदाई की यादें हमेशा के लिए अमर हो गई थीं।