जिम ट्रेनर की चु@@ई—>
दो साल के लंबे अंतराल के बाद जब समीर ने वंदना के घर के दरवाजे की घंटी बजाई, तो उसके दिल की धड़कनें किसी ड्रम की तरह बज रही थीं। वंदना उसकी पुरानी जिम ट्रेनर थी, जिसने उसे न केवल कसरत सिखाई थी बल्कि उसके सपनों में भी अपनी जगह बना ली थी। दरवाजा खुला और सामने वंदना खड़ी थी, जिसकी काया पहले से कहीं ज्यादा निखर चुकी थी। उसकी उम्र अब बत्तीस के पार थी, लेकिन उसके बदन की कसावट और उभार किसी बीस साल की लड़की को मात दे रहे थे। समीर उसे देखता ही रह गया, उसकी साँसें अटक गईं।
वंदना ने उसे अंदर बुलाया और जैसे ही समीर ने कमरे में कदम रखा, उसे वंदना के जिस्म की भीनी-भीनी खुशबू महसूस हुई। वंदना ने एक बहुत ही कसी हुई गुलाबी स्पोर्ट्स ब्रा पहनी थी, जिसमें उसके बड़े-बड़े और भारी तरबूज साफ झलक रहे थे। उन तरबूजों का आकार इतना रसीला था कि समीर की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। उसकी काली लेगिंग्स उसके चौड़े और उभरे हुए पिछवाड़े पर इस कदर चिपकी थी कि उसके बदन का हर घुमाव एक कविता की तरह लग रहा था। समीर का मन हुआ कि अभी इसी वक्त उन तरबूजों को अपने हाथों में भर ले।
वंदना ने समीर के चेहरे के भाव पढ़ लिए और मंद मुस्कान के साथ बोली, ‘समीर, तुम तो काफी बदल गए हो, शरीर भी काफी बना लिया है।’ समीर ने झिझकते हुए कहा, ‘सब आपकी ही मेहनत है वंदना मैम, बस थोड़ा अभ्यास छोड़ दिया था।’ वंदना ने उसकी बांहों को छुआ और समीर को एक बिजली का करंट सा महसूस हुआ। उसकी उंगलियाँ समीर की मांसपेशियों पर धीरे से रेंग रही थीं, जिससे समीर के अंदर दबी हुई इच्छाएं अंगड़ाइयां लेने लगीं। कमरे की शांति और उनकी नज़दीकी ने एक गहरा भावनात्मक और शारीरिक खिंचाव पैदा कर दिया था।
दोनों के बीच एक अनकही प्यास थी जो बरसों से दबी हुई थी। वंदना ने समीर को अपने करीब खींच लिया और उसकी आँखों में झांकते हुए कहा, ‘आज हम कोई भारी कसरत नहीं करेंगे, बस थोड़ा शरीर को ढीला छोड़ेंगे।’ समीर ने देखा कि वंदना के तरबूजों के ऊपर के छोटे-छोटे मटर अब ब्रा के कपड़ों को चीरकर बाहर आने की कोशिश कर रहे थे। समीर का हाथ धीरे से वंदना की कमर पर गया, जहाँ की त्वचा मखमली एहसास दे रही थी। वंदना ने समीर के गले में अपनी बाहें डाल दीं और उसके होंठों के करीब आकर फुसफुसाई।
समीर ने अब और इंतजार करना मुनासिब नहीं समझा और उसने वंदना के होंठों का रस पीना शुरू कर दिया। दोनों की जीभ एक-दूसरे से उलझने लगी और कमरे में सिसकियों की गूँज सुनाई देने लगी। समीर के हाथों ने नीचे जाकर वंदना के उभरे हुए पिछवाड़े को कसकर भींच लिया। वंदना के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकली और उसने समीर के बालों में अपनी उंगलियाँ फंसा दीं। समीर का खीरा अब पूरी तरह से जाग चुका था और उसकी पैंट के अंदर अपना रास्ता खोजने के लिए छटपटा रहा था।
वंदना ने समीर को बिस्तर की तरफ धकेला और खुद उसके सामने खड़ी होकर अपनी स्पोर्ट्स ब्रा उतार दी। उसके भारी और गोरे तरबूज आज़ाद होकर नीचे की तरफ झूलने लगे। समीर उन तरबूजों की सुंदरता देखकर दंग रह गया। उसने आगे बढ़कर एक तरबूज को अपने मुँह में भर लिया और उसके ऊपर लगे मटर को अपनी जीभ से सहलाने लगा। वंदना का बदन कमान की तरह मुड़ गया और वह समीर का सिर अपने तरबूजों में दबाने लगी। रस की एक लहर समीर के पूरे शरीर में दौड़ गई।
समीर ने वंदना की लेगिंग्स भी धीरे-धीरे नीचे उतार दी, जिससे उसकी रेशमी खाई और उसके ऊपर के काले घने बाल नज़र आने लगे। वंदना की खाई पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वहां से एक नशीली गंध आ रही थी। समीर ने अपनी उंगली से खाई को सहलाना शुरू किया, तो वंदना अपनी कमर ऊपर उठाने लगी। समीर ने अपना चेहरा वंदना की टांगों के बीच ले जाकर उसकी खाई चाटना शुरू कर दिया। वंदना का शरीर झटके लेने लगा और वह समीर का नाम लेकर चिल्लाने लगी।
अब समीर ने अपनी पैंट उतारी और उसका फन फैलाए हुए साढ़े सात इंच का खीरा वंदना की आँखों के सामने था। वंदना ने लपककर उस खीरे को अपने हाथ में पकड़ लिया और उसे सहलाने लगी। उसने खीरा मुँह में लेना शुरू किया और उसके अगले हिस्से को अपनी जीभ से साफ करने लगी। समीर की आँखें बंद हो गईं और उसे स्वर्ग जैसा सुख महसूस होने लगा। वंदना ने खीरे को इतनी गहराई से चूसना शुरू किया कि समीर का रस निकलने ही वाला था, लेकिन उसने खुद को काबू में रखा।
वंदना बिस्तर पर लेट गई और उसने अपनी टांगें समीर के कंधों पर रख दीं। समीर ने अपने खीरे को वंदना की खाई के द्वार पर रखा, जो पहले से ही रस से लथपथ थी। जैसे ही समीर ने पहला धक्का मारा, खीरा गहराई तक खाई के अंदर समा गया। वंदना की एक तीखी चीख निकली और उसने समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए। वह दोनों अब खुदाई की उस गहराई में उतर चुके थे जहाँ सिर्फ आनंद का सागर था। समीर ने सामने से खोदना शुरू किया, हर धक्का वंदना के गर्भाशय तक महसूस हो रहा था।
कमरे में सिर्फ शरीर के टकराने की आवाज़ और वंदना की सिसकियाँ गूँज रही थीं। समीर की रफ्तार धीरे-धीरे बढ़ने लगी और वंदना के तरबूज पागलों की तरह ऊपर-नीचे उछल रहे थे। समीर ने वंदना को उल्टा लेटा दिया और उसके पिछवाड़े को ऊपर उठाकर पिछवाड़े से खोदना शुरू कर दिया। इस स्थिति में समीर का खीरा और भी गहराई तक वंदना की खाई को चीर रहा था। वंदना अपने दोनों हाथों से तकिए को कसकर पकड़े हुए थी और उसके मुँह से बेतहाशा आहें निकल रही थीं।
खुदाई अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी। समीर ने वंदना को फिर से सीधा किया और उसे अपनी गोद में बिठा लिया। वंदना समीर के खीरे पर खुद को ऊपर-नीचे पटकने लगी। समीर ने उसके मटरों को अपने दांतों से हल्का सा काटा जिससे वंदना का पागलपन और बढ़ गया। अचानक वंदना का बदन कांपने लगा और उसकी खाई से गर्म रस छूटने लगा। उसी क्षण समीर ने भी अपने खीरे का सारा गर्म रस वंदना की खाई की गहराई में उड़ेल दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए पसीने से तर-बतर बिस्तर पर गिर पड़े।
कुछ देर तक कमरे में सिर्फ उनकी भारी सांसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। समीर ने वंदना को अपनी बाहों में समेट लिया और उसके माथे को चूमा। वंदना का चेहरा संतुष्टि और थकान से चमक रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि यह खुदाई सिर्फ शारीरिक नहीं थी, बल्कि उनकी रूहों का मिलन था। समीर को भी अपनी बरसों पुरानी प्यास बुझती हुई महसूस हो रही थी। वह दोनों उसी हालत में सो गए, यह जानते हुए कि अब उनकी यह कसरत हर रोज होने वाली है।