रात के ग्यारह बज चुके थे और मुंबई की इस आलीशान होटल की लॉबी में एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी। विक्रम अपने हाथ में कमरे की चाबी लिए लिफ्ट की ओर बढ़ रहा था, तभी उसकी नजर पास खड़ी एक महिला पर पड़ी जो शायद अपनी चाबी खो जाने की वजह से परेशान दिख रही थी। उसका नाम मीरा था, जिसकी उम्र लगभग पैंतीस साल के आसपास रही होगी, लेकिन उसके शरीर की बनावट और चेहरे का नूर किसी इक्कीस साल की युवती को मात देने के लिए काफी था। मीरा ने एक गहरे नीले रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी हुई थी, जो उसके गोरे बदन पर बिजली की तरह चमक रही थी। विक्रम ने उसे अपनी मदद की पेशकश की, और बातों-बातों में पता चला कि दोनों का कमरा एक ही फ्लोर पर था। मीरा की आवाज में एक गजब की मिठास और उदासी का मिश्रण था, जिसने विक्रम के मन में उसके प्रति एक गहरा आकर्षण पैदा कर दिया था।
जब वे लिफ्ट में दाखिल हुए, तो विक्रम की नजरें अनायास ही मीरा के शारीरिक उभारों की ओर मुड़ गईं। मीरा का शरीर किसी सजी हुई कलाकृति की तरह था; उसके तरबूज साड़ी के पतले कपड़े के पीछे से अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे, जो सांसों की गति के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसका हुआ था, जिससे उसके भारी और सुडौल तरबूज की गोलाई साफ झलक रही थी। उसकी कमर पतली थी, लेकिन उसके कूल्हे यानी उसका पिछवाड़ा काफी चौड़ा और मांसल था, जो हर कदम के साथ एक मादक लय में हिल रहा था। उसके चेहरे पर बिखरी हुई लटें और उसकी आंखों की गहराई विक्रम को एक ऐसी दुनिया में ले जा रही थी जहाँ सिर्फ इच्छाओं का वास था। विक्रम के शरीर में एक अजीब सी गर्मी दौड़ने लगी थी, और उसका मन उस अजनबी महिला की खुशबू को अपने भीतर उतारने के लिए बेताब हो उठा।
कमरे के पास पहुँचते ही मीरा ने एक लंबी आह भरी और कहा कि वह बहुत अकेला महसूस कर रही है। विक्रम ने उसे तसल्ली देने के लिए उसके कंधे पर हाथ रखा, और वही पहला स्पर्श था जिसने दोनों के बीच की झिझक को पिघला दिया। कमरे के भीतर जाते ही वातावरण और भी कामुक हो गया। विक्रम ने धीरे से मीरा का हाथ थामा और उसे अपनी ओर खींचा। मीरा की सांसें तेज हो गई थीं और उसकी आंखों में एक ऐसी प्यास थी जो बरसों से शांत नहीं हुई थी। विक्रम ने उसके चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया और उसके होंठों का रसपान करने लगा। यह चुंबन गहरा और भावुक था, जिसमें दोनों की तड़प साफ महसूस की जा सकती थी। मीरा की बाहें विक्रम के गले में कस गई थीं और वह उसके शरीर से सट गई थी।
विक्रम के हाथ अब मीरा की पीठ पर रेंग रहे थे, जहाँ साड़ी के ब्लाउज के हुक अब उसे बाधा लग रहे थे। जैसे ही उसने एक-एक कर हुक खोले, मीरा के कंधों से साड़ी सरक कर नीचे गिर गई। अब उसके दोनों विशाल और गोरे तरबूज पूरी तरह से विक्रम की नजरों के सामने थे। उनके ऊपर मौजूद छोटे-छोटे मटर ठंडक और उत्तेजना की वजह से सख्त हो चुके थे। विक्रम ने धीरे से अपनी उंगलियों से उन मटरों को सहलाया, जिससे मीरा के मुंह से एक दबी हुई कराह निकल गई। उसने झुककर उन तरबूज को अपने मुंह में भर लिया और उन्हें चूसने लगा। मीरा ने उसकी गर्दन को जोर से पकड़ लिया और अपनी पीठ को धनुष की तरह मोड़ लिया। वह उत्तेजना के उस चरम पर पहुँचने लगी थी जहाँ शब्द खत्म हो जाते हैं और सिर्फ एहसास बाकी रह जाते हैं।
विक्रम ने अब अपना ध्यान नीचे की ओर केंद्रित किया। उसने मीरा की साड़ी और पेटीकोट को पूरी तरह से उतार दिया। उसके पैरों के बीच की गहराई, जिसे हम खाई कह सकते हैं, अब पूरी तरह से दृश्यमान थी। उस खाई के आसपास महीन और रेशमी बाल थे, जो उसकी कामुकता को और बढ़ा रहे थे। विक्रम ने अपनी उंगलियों से उस खाई को टटोलना शुरू किया, जो पहले से ही गीली और फिसलन भरी हो चुकी थी। मीरा की सिसकियां अब कमरे की दीवारों से टकराकर गूंजने लगी थीं। विक्रम ने अपना चेहरा नीचे झुकाया और अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू कर दिया। मीरा का पूरा बदन कांपने लगा और वह बिस्तर की चादरों को अपने हाथों में भींचने लगी। खाई के उस रस ने विक्रम को और भी पागल बना दिया था।
अब विक्रम ने अपने कपड़े उतारे और उसका विशाल खीरा गर्व से खड़ा हो गया। वह खीरा लंबाई और मोटाई में किसी को भी डराने या मदहोश करने के लिए काफी था। मीरा की नजरें जब उस खीरे पर पड़ीं, तो उसकी आंखों में एक चमक आ गई। उसने धीरे से उस खीरे को अपने हाथ में लिया और उसे सहलाने लगी। फिर उसने अपनी मखमली जुबान से उस खीरे के ऊपरी हिस्से को चूसना शुरू किया। विक्रम की आंखें बंद हो गईं और वह स्वर्ग के सुख का अनुभव करने लगा। मीरा ने उस खीरे को अपने मुंह की गहराई तक ले जाने की कोशिश की, जिससे विक्रम के शरीर में बिजली की लहरें दौड़ने लगीं। उसे महसूस हो रहा था कि अब सब्र का बांध टूटने वाला है और असली खुदाई का समय आ गया है।
विक्रम ने मीरा को बिस्तर के बीचों-बीच लिटाया और उसके दोनों पैरों को चौड़ा कर दिया। उसने अपने खीरे की नोक को मीरा की गीली खाई के मुहाने पर रखा। मीरा ने उसे एक इशारा दिया और विक्रम ने धीरे से जोर लगाया। खीरा उस तंग और रसीली खाई के भीतर प्रवेश करने लगा। जैसे-जैसे वह भीतर जा रहा था, मीरा की आंखों से खुशी और थोड़े दर्द के आंसू छलक आए। विक्रम ने उसे पूरी गहराई तक खोदना शुरू कर दिया। हर धक्के के साथ मीरा के तरबूज हवा में उछल रहे थे और उनके टकराने की आवाज कमरे में संगीत की तरह लग रही थी। विक्रम ने सामने से खोदना (मिशनरी) जारी रखा, और मीरा के शरीर की कंपकंपी उसके पूरे वजूद को हिला रही थी।
कुछ देर बाद, विक्रम ने मीरा को घुमाया और उसे बिस्तर पर घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब वह उसे पिछवाड़े से खोदने (डॉगगी स्टाइल) के लिए तैयार था। मीरा का पिछवाड़ा पीछे से देखने में किसी पहाड़ी की तरह सुडौल और आकर्षक लग रहा था। विक्रम ने अपने खीरे को फिर से उसकी खाई में पीछे से डाला और तेजी से धक्के मारने लगा। मीरा के बाल उसके चेहरे पर बिखरे हुए थे और वह तकिए में अपना मुंह छिपाकर जोर-जोर से कराह रही थी। इस स्थिति में खुदाई और भी गहरी हो रही थी, और खीरा खाई की अंतिम दीवारों को छू रहा था। कमरे का तापमान बढ़ चुका था और दोनों के शरीर पसीने से तर-बतर हो गए थे, जिससे घर्षण की आवाज और भी उत्तेजक हो गई थी।
विक्रम ने फिर से मीरा को सीधा किया और उसकी टांगों को अपने कंधों पर रख लिया। अब वह पूरी ताकत से खुदाई कर रहा था। मीरा का पूरा शरीर पसीने से चमक रहा था और उसकी आंखें चढ़ी हुई थीं। वह बार-बार कह रही थी, “मुझे और खोदो, मुझे खत्म कर दो!” विक्रम का खीरा अब पूरी तरह से आग उगलने को तैयार था। जैसे ही उसने कुछ और जबरदस्त धक्के मारे, मीरा का शरीर पूरी तरह से अकड़ गया और उसकी खाई से गर्म रस बहने लगा। उसी पल विक्रम ने भी अपना सारा रस मीरा की गहराई में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे में सिमटे हुए बिस्तर पर ढह गए। रस निकलने के बाद जो सुकून उनके चेहरों पर था, वह किसी बड़ी जंग जीतने जैसा था।
खुदाई के बाद दोनों काफी देर तक खामोश रहे, बस उनकी तेज चलती सांसें एक-दूसरे को सुनाई दे रही थीं। मीरा ने अपना सिर विक्रम की छाती पर रख दिया और उसके बिखरे हुए बालों को सहलाने लगी। उस रात ने दो अजनबियों को जिस्मानी और रूहानी तौर पर एक कर दिया था। विक्रम को महसूस हुआ कि यह सिर्फ एक शारीरिक जरूरत नहीं थी, बल्कि दो अकेलेपन का मिलन था। मीरा की आंखों में अब कोई उदासी नहीं थी, बल्कि एक तृप्ति की चमक थी। वे पूरी रात एक-दूसरे की बाहों में लिपटे रहे, मानों दुनिया की सारी खुशियां इसी छोटे से कमरे में सिमट आई हों। सुबह जब सूरज की पहली किरण कमरे में आई, तो उनके बीच एक नया रिश्ता जन्म ले चुका था।