जज्बातों की खुदाई
रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे और राजधानी एक्सप्रेस अपनी पूरी रफ्तार से पटरी पर दौड़ रही थी, जिसकी लयबद्ध आवाज सन्नाटे को एक अजीब सी गहराई दे रही थी। समीर अपनी बर्थ पर बैठा हुआ खिड़की से बाहर अंधेरे को निहार रहा था, जहाँ दूर-दूर तक केवल धूल और छोटे-छोटे टीलों की परछाइयां … Read more