पुस्तकालय की वह मदहोश दोपहर
पुरानी हवेली के उस विशाल और शांत पुस्तकालय में हवा जैसे ठहर सी गई थी, जहाँ धूल के कण सूरज की मद्धम रोशनी में नाच रहे थे। समीर और कविता पिछले दो घंटों से पुरानी पांडुलिपियों को सहेजने में व्यस्त थे, लेकिन उनके बीच की खामोशी शब्दों से कहीं ज्यादा शोर मचा रही थी। कविता … Read more