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ऑफिस के दोस्त से चु@@ई

शहर की चकाचौंध वाली रात थी। दिल्ली की ऊँची इमारतों के बीच, १५वीं मंजिल के उस फ्लैट में, जहां से नीचे की सड़कों पर गाड़ियों की लाइटें नदियों की तरह बह रही थीं, रिया और विक्रम अकेले थे। रिया, अपनी काली टाइट ड्रेस में, बाल खुले छोड़कर बालकनी में खड़ी थी। हवा में ठंडक थी, … Read more

समंदर की वो रात – लहरों के बीच

रिया उस छोटे से तटीय गांव के आखिरी घर में अकेली थी। रात के १ बजे समंदर की लहरें इतनी तेज थीं कि उनकी आवाज दीवारों से टकराकर घर के अंदर तक गूंज रही थी। हवा में नमक और बारिश की महक घुली हुई थी। रिया की हल्की नीली साड़ी समंदर की छींटों से भीगकर … Read more

गाँव की वो रात और चु@@ई

कुसुम उस छोटे से गाँव के आखिरी खेत के पास बने मिट्टी के मकान में अकेली थी। रात के १२ बज चुके थे। बाहर खेतों में सरसों के फूल हल्की हवा में लहरा रहे थे, और दूर कहीं कोई कुत्ता भौंक रहा था। चाँद की रोशनी खिड़की से झांक रही थी, और कुसुम की पीली … Read more

बारिश की रात और पुरानी हवेली

बारिश की तेज़ बूंदें खिड़कियों पर थपथपा रही थीं और पुरानी हवेली की लकड़ी की छत से पानी टपकने की आवाज़ आ रही थी। नेहा अकेली थी, उसकी साड़ी भीगकर शरीर से चिपक गई थी, ब्लाउज पारदर्शी हो चुका था और उसकी स्त@#@ की पूरी आकृति साफ़ नज़र आ रही थी। वह कमरे में घूम … Read more

जंगल की वो रात

माया उस घने जंगल के किनारे बने छोटे से झोपड़े में अकेली बैठी थी। रात इतनी गहरी और घनी थी कि बाहर सिर्फ पत्तियों की फुसफुसाहट, हवा की सिसकारी और दूर-दूर उल्लू की उदास, लंबी पुकार सुनाई दे रही थी। शहर की चकाचौंध से भागकर वह यहां आई थी – जहां न कोई सवाल करता … Read more

जंगल की वो रात

**जंगल की वो रात – और भी गहरी, और भी जंगली** माया उस घने जंगल के किनारे बने छोटे से झोपड़े में अकेली बैठी थी। रात इतनी गहरी और घनी थी कि बाहर सिर्फ पत्तियों की फुसफुसाहट, हवा की सिसकारी और दूर-दूर उल्लू की उदास, लंबी पुकार सुनाई दे रही थी। शहर की चकाचौंध से … Read more

जंगल की वो रात

माया उस घने जंगल के किनारे बने छोटे से झोपड़े में अकेली थी। रात गहरी हो चुकी थी, और बाहर बारिश नहीं, बल्कि सिर्फ पत्तियों की सरसराहट और दूर कहीं उल्लू की आवाज थी। माया यहां इसलिए आई थी क्योंकि शहर की भीड़ से भागना चाहती थी। उसकी सफेद सूती ड्रेस हल्की सी गीली थी … Read more

ऑफिस का पहला दिन और चार मुस्टंडे

प्रिया आज अपने नए ऑफिस के पहले दिन बहुत उत्साहित थी लेकिन साथ ही उसके मन में एक अजीब सी घबराहट भी थी क्योंकि वह एक अनजान जगह पर आई थी जहां चार मजबूत कद-काठी वाले मुस्टंडे पुरुष पहले से ही काम कर रहे थे जिनकी घनी काली मूंछें उनकी मर्दानगी को और ज्यादा उभार … Read more

**पड़ोसी की रसीली चु@#@ई**

**पड़ोसी की रसीली चु@#@ई** बाहर मूसलाधार बारिश की बूंदें खिड़की के कांच पर दस्तक दे रही थीं और कमरे के भीतर एक अजीब सी खामोशी और गर्मी छाई हुई थी, जहाँ नेहा अपनी पतली मलमल की साड़ी में सोफे पर बैठी किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी। उसकी साड़ी का पल्लू बार-बार कंधे से … Read more