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Sali Neha Ki Chu@@i

Sali Neha Ki Chu@@i—>उस दिन आसमान से बारिश की बूंदें नहीं बल्कि आग की फुहारें गिर रही थीं और समीर अपने कमरे में बैठा लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। उसकी पत्नी गीता एक हफ्ते के लिए अपने मायके गई हुई थी लेकिन उसकी छोटी बहन नेहा कॉलेज की छुट्टियों की वजह से समीर के पास ही रुकी हुई थी। नेहा एक चंचल और बेहद खूबसूरत लड़की थी जिसके शरीर का हर अंग किसी तराशे हुए पत्थर की तरह मजबूत और आकर्षक था। जब वह घर में छोटे कपड़ों में घूमती तो समीर की नजरें अक्सर उसके उभरे हुए अंगों पर जाकर टिक जाती थीं। नेहा का रंग गोरा था और उसकी आँखों में एक अजीब सी शरारत और गहराई थी जो समीर को अंदर तक झकझोर देती थी।

समीर ने खिड़की से बाहर देखा तो बारिश और तेज हो चुकी थी और तभी नेहा कमरे के अंदर आई जिसने एक बहुत ही पतली सफेद साड़ी पहनी हुई थी। बारिश में भीगने की वजह से साड़ी उसके बदन से चिपक गई थी और उसके दो बड़े-बड़े रसीले तरबूज साड़ी के पतले कपड़े से साफ झलक रहे थे। समीर ने जैसे ही उसे देखा उसकी धड़कनें तेज हो गईं और उसका ध्यान काम से पूरी तरह हट गया। नेहा के तरबूजों के बीच की गहरी घाटी और उन पर उभरे हुए छोटे-छोटे मटर समीर को पागल करने के लिए काफी थे। उसने महसूस किया कि उसका निचला हिस्सा यानी उसका मजबूत और लंबा खीरा धीरे-धीरे अपनी जगह बनाने लगा है और उसमें एक जबरदस्त तनाव पैदा हो गया है।

नेहा ने समीर की आँखों में देखा और एक शरारती मुस्कान के साथ उसके करीब आकर बैठ गई। समीर के अंदर एक तूफान उठ रहा था लेकिन वह उसे दबाने की कोशिश कर रहा था क्योंकि रिश्ता साले और जीजा का था। नेहा ने बहुत ही धीमे स्वर में कहा कि जीजाजी आज बहुत अकेलापन महसूस हो रहा है और यह मौसम तो और भी ज्यादा बेचैन कर रहा है। समीर ने उसकी कमर पर हाथ रखा और महसूस किया कि वह कितनी कोमल और रेशमी है। जैसे ही समीर का स्पर्श नेहा के जिस्म को लगा वह थरथरा उठी और उसकी साँसें तेज हो गईं। समीर की उंगलियाँ धीरे-धीरे नेहा की पीठ पर रेंगने लगीं और नेहा ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी आह भरी जो कमरे की खामोशी को चीरती हुई समीर के कानों तक पहुँची।

समीर ने अब और संयम नहीं रखा और उसने नेहा को अपनी बाँहों में खींच लिया और उसके रसीले तरबूजों को अपने हाथों में भर लिया। नेहा ने समीर के गले में अपनी बाहें डाल दीं और वे दोनों एक दूसरे के प्यार में डूबने लगे। समीर ने नेहा के तरबूजों को सहलाते हुए उनके ऊपर बने छोटे मटरों को अपने होंठों से हल्के से दबाया तो नेहा के मुँह से एक सिसकारी निकली। उसने समीर के बालों को पकड़ लिया और उसे अपने और करीब खींचने लगी। समीर की जीभ अब नेहा के पूरे बदन पर रेंग रही थी और वह उसके शरीर के हर हिस्से को अपने प्यार से सराबोर कर देना चाहता था। नेहा का जिस्म गर्मी से तपने लगा था और उसकी आँखों में सिर्फ और सिर्फ समीर के लिए प्यास दिखाई दे रही थी।

समीर ने धीरे-धीरे नेहा की साड़ी के पल्लू को खिसकाया और उसके दोनों तरबूजों को पूरी तरह आजाद कर दिया जो अब समीर के सामने गर्व से तनकर खड़े थे। समीर ने बारी-बारी से दोनों तरबूजों को अपने मुँह में लिया और उन्हें चूसने लगा जैसे कोई प्यासा राही रेगिस्तान में पानी पी रहा हो। नेहा की सिसकारियां और कराह अब और भी ऊंची होने लगी थीं और वह समीर के सिर को अपने सीने से जोर से दबा रही थी। समीर का खीरा अब पूरी तरह से लोहे की तरह सख्त हो चुका था और वह नेहा की गीली खाई में उतरने के लिए बेकरार था। उसने नेहा की पेटीकोट के अंदर हाथ डाला और उसकी रेशमी खाई को छुआ जो पहले से ही रस से गीली हो चुकी थी।

समीर ने अपनी उंगलियों से नेहा की खाई में उंगली करना शुरू किया तो नेहा का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया। वह समीर के कानों में फुसफुसाते हुए कहने लगी कि जीजाजी आज मुझे पूरी तरह से खोद दो मुझे अपनी बना लो। समीर ने नेहा के कपड़े पूरी तरह से उतार दिए और वह अब कुदरत के बनाए सबसे खूबसूरत सांचे की तरह उसके सामने लेटी थी। समीर ने अपना मजबूत और लंबा खीरा बाहर निकाला और नेहा की जांघों के बीच रगड़ना शुरू किया। नेहा ने जब उस विशाल खीरे को देखा तो उसकी आँखें फटी रह गईं लेकिन उसकी चाहत और भी बढ़ गई। समीर ने नेहा की खाई के द्वार पर अपना खीरा रखा और धीरे से दबाव बनाया जिससे नेहा के मुँह से एक दर्द भरी लेकिन सुखद आह निकली।

समीर ने धीरे-धीरे गहराई तक जाना शुरू किया और नेहा की खाई का हर कोना समीर के खीरे की गर्मी महसूस करने लगा। समीर अब बहुत ही लयबद्ध तरीके से सामने से खुदाई कर रहा था और कमरे में सिर्फ उनके जिस्मों के टकराने की आवाजें गूँज रही थीं। हर धक्के के साथ नेहा का शरीर ऊपर की ओर उछलता और वह समीर को और जोर से जकड़ लेती। समीर ने नेहा की टांगों को अपने कंधों पर रख लिया और अब वह और भी गहराई से खुदाई करने लगा। नेहा का रस अब चारों तरफ फैल चुका था और समीर का खीरा उस रस में डूबकर और भी चिकना और मारक हो गया था। नेहा चिल्ला रही थी कि हाँ जीजाजी और जोर से खोदो मुझे फाड़ डालो आज।

कुछ देर सामने से खुदाई करने के बाद समीर ने नेहा को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने की पोजीशन में खड़ा कर दिया। नेहा के पीछे का हिस्सा किसी बड़े पहाड़ की तरह समीर के सामने था और उसने बिना देर किए अपना खीरा पीछे से नेहा की खाई में उतार दिया। यह स्थिति नेहा के लिए और भी ज्यादा उत्तेजक थी क्योंकि अब समीर उसके तरबूजों को पीछे से पकड़कर मसल भी रहा था। समीर की रफ्तार अब बढ़ चुकी थी और वह किसी जंगली जानवर की तरह नेहा को खोद रहा था। नेहा के बाल इधर-उधर बिखरे हुए थे और उसका पूरा शरीर पसीने से नहा गया था। समीर के हर प्रहार के साथ नेहा के मुँह से बेतहाशा आवाजें निकल रही थीं जो इस बात का सबूत थीं कि उसे कितना मजा आ रहा है।

करीब आधे घंटे की इस भीषण और गहन खुदाई के बाद समीर को महसूस हुआ कि अब उसका रस निकलने वाला है। नेहा भी अपने चरम पर थी और उसका शरीर कांपने लगा था। समीर ने अंतिम कुछ धक्के बहुत ही ताकत के साथ लगाए और अपना सारा गरम रस नेहा की गहरी खाई के अंदर ही छोड़ दिया। नेहा का भी उसी समय रस छूटा और वह निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ी। दोनों की साँसें बहुत तेज चल रही थीं और कमरे में एक अजीब सी गंध और शांति छा गई थी। समीर नेहा के बगल में लेट गया और उसे अपनी बाँहों में भर लिया। नेहा ने समीर के सीने पर अपना सिर रखा और मुस्कुराते हुए कहा कि आपने तो आज मेरी दुनिया ही बदल दी।

खुदाई खत्म होने के बाद दोनों के बीच एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव महसूस हो रहा था। नेहा के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी और समीर को भी एक असीम संतुष्टि का अहसास हो रहा था। उन्होंने काफी देर तक एक दूसरे को पकड़कर रखा और उस पल की गहराई को महसूस किया। बारिश अब भी बाहर हो रही थी लेकिन अंदर की आग अब शांत हो चुकी थी और उसकी जगह एक मीठी सी थकान और सुकून ने ले ली थी। समीर ने नेहा के माथे को प्यार से चूमा और वादा किया कि यह उनका एक प्यारा सा राज रहेगा जो उनकी जिंदगी में हमेशा रंग भरता रहेगा। नेहा ने भी समीर के हाथ को कसकर पकड़ लिया और दोनों नींद की आगोश में समा गए।

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