Join WhatsApp Click Here
Join Telegram Click Here

split(बॉस संग ऑफिस चु@@ई


बॉस संग ऑफिस चु@@ई—>रात के करीब नौ बज चुके थे और शहर की ऊंची इमारतों की खिड़कियों से झांकती रोशनी अब मध्यम पड़ने लगी थी। बड़े से कॉरपोरेट ऑफिस के सन्नाटे में सिर्फ एयर कंडीशनर की हल्की सरसराहट और कीबोर्ड पर चलती उंगलियों की आवाज गूंज रही थी। नेहा, जो कि कंपनी की सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर थी, अपनी मेज पर झुकी हुई कुछ फाइलों को अंतिम रूप दे रही थी। उसकी उम्र करीब चौंतीस साल थी, लेकिन उसकी फिटनेस और नक्काशीदार शरीर को देखकर कोई भी उसे पच्चीस का समझ सकता था। आज उसने एक गहरे काले रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी थी, जिसके साथ लाल रंग का बिना आस्तीन वाला ब्लाउज उसके गोरे कंधों और पीठ को पूरी तरह से नुमाया कर रहा था। उसके शरीर की बनावट किसी अप्सरा जैसी थी, जिसमें उसके उभरते हुए तरबूज साड़ी के पल्लू को चुनौती देते हुए अपनी गोलाई का अहसास करा रहे थे।

रोहन, जो पिछले दो महीनों से नेहा के अंडर इंटर्नशिप कर रहा था, बगल वाली डेस्क पर बैठा उसे कनखियों से देख रहा था। रोहन की उम्र बाइस साल थी, गठीला बदन और तेज दिमाग, लेकिन नेहा की मौजूदगी में उसका ध्यान अक्सर भटक जाता था। नेहा जब भी फाइल देने के लिए झुकती, तो उसके ब्लाउज के गहरे गले से झांकते हुए वो रसीले तरबूज और उनके बीच की गहरी खाई रोहन की धड़कनों को अनियंत्रित कर देती थी। नेहा की चाल में एक ऐसी मादकता थी कि जब वो चलती, तो उसके पीछे का भारी और सुडौल पिछवाड़ा एक लय में हिलता था, जिसे देखकर रोहन के मन में अजीब सी हलचल होने लगती थी। आज ऑफिस में वे दोनों ही अकेले थे क्योंकि एक बड़े क्लाइंट की प्रेजेंटेशन सुबह ही देनी थी और काम का बोझ बहुत ज्यादा था।

काम के दौरान नेहा को प्यास महसूस हुई और वो पानी लेने के लिए उठी, लेकिन उसकी साड़ी का पल्लू मेज के कोने में फंस गया। जैसे ही उसने पल्लू छुड़ाने की कोशिश की, साड़ी का एक हिस्सा कंधे से सरक गया, जिससे उसका दाहिना तरबूज और उस पर मखमली कपड़े के पीछे छिपा हुआ मटर जैसा हिस्सा साफ उभर आया। रोहन की नजरें वहीं टिक गईं, उसके गले में जैसे सूखा पड़ गया हो। नेहा ने रोहन की नजरों को महसूस किया, लेकिन उसने नजरें चुराने के बजाय रोहन की आंखों में गहराई से देखा। उस पल ऑफिस की ठंडी हवा में एक गर्म लहर दौड़ गई। नेहा ने मुस्कुराते हुए अपना पल्लू वापस ठीक नहीं किया, बल्कि धीरे से रोहन की मेज की ओर बढ़ी। उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान थी जो किसी गहरे राज की ओर इशारा कर रही थी।

नेहा रोहन के बिल्कुल करीब आकर खड़ी हो गई, इतनी करीब कि रोहन उसके महंगे इत्र की खुशबू और उसके शरीर की तपिश को महसूस कर सकता था। नेहा ने अपना हाथ रोहन के कंधे पर रखा और धीरे से झुककर उसके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, रोहन, क्या तुम्हें नहीं लगता कि हम कुछ ज्यादा ही काम कर रहे हैं? हमें थोड़ा आराम और कुछ मीठा चाहिए। रोहन की सांसें तेज हो गईं और उसका नीचे का हिस्सा, जिसे हम खीरा कह सकते हैं, धीरे-धीरे अपनी जगह बनाने लगा। पैंट के अंदर उस मजबूत खीरे की हरकत को नेहा ने महसूस कर लिया था। उसने अपनी मखमली उंगलियां रोहन की गर्दन पर फेरना शुरू किया, जिससे रोहन के पूरे बदन में एक बिजली सी दौड़ गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह सपना है या हकीकत।

झिझक और मन का संघर्ष अब धीरे-धीरे खत्म हो रहा था। रोहन ने हिम्मत जुटाकर नेहा की पतली कमर पर हाथ रखा। साड़ी का कपड़ा इतना महीन था कि उसे नेहा की मखमली त्वचा की कोमलता का अहसास हो रहा था। नेहा ने आह भरी और अपनी आंखें बंद कर लीं। रोहन ने उसे अपनी ओर खींचा और नेहा उसके पैरों के बीच आकर बैठ गई। अब रोहन का चेहरा नेहा के उन भारी और सख्त तरबूजों के बिल्कुल सामने था। उसने अपनी नाक उन तरबूजों के बीच की खाई में रगड़ी, जहां पसीने की एक हल्की और उत्तेजक गंध थी। नेहा ने रोहन के बालों में अपनी उंगलियां फंसा दीं और उसे अपने और करीब खींच लिया। उन दोनों के बीच की प्रोफेशनल दीवार अब पूरी तरह ढह चुकी थी और सिर्फ शारीरिक इच्छाएं बची थीं।

पहला स्पर्श इतना गहरा था कि दोनों के शरीर कांपने लगे। रोहन ने नेहा के ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने शुरू किए। जैसे ही आखिरी हुक खुला, नेहा के दोनों भारी तरबूज आजाद होकर बाहर आ गए। वे इतने सफेद और सुडौल थे कि रोहन उन्हें बस देखता ही रह गया। उन तरबूजों के शिखर पर गुलाबी मटर जैसे हिस्से अब ठंड और उत्तेजना से पूरी तरह सख्त हो चुके थे। रोहन ने अपना मुंह आगे बढ़ाया और एक तरबूज को पूरा अपने मुंह में भर लिया। नेहा के मुंह से एक कराह निकली, ओह रोहन, तुम बहुत अच्छा कर रहे हो। रोहन बारी-बारी से दोनों तरबूजों को सहलाने और उनके मटर जैसे हिस्सों को अपनी जीभ से सहलाने लगा, जिससे नेहा की बेचैनी और बढ़ गई।

धीरे-धीरे उत्तेजना अपनी चरम सीमा की ओर बढ़ रही थी। रोहन ने नेहा को मेज पर लिटा दिया और उसकी साड़ी को पूरी तरह से हटा दिया। अब नेहा के शरीर पर सिर्फ एक छोटी सी जांघिया बची थी। रोहन ने अपनी पैंट उतारी और उसका विशाल और फौलादी खीरा अब पूरी तरह से अपनी ताकत दिखा रहा था। नेहा ने जब उस खीरे को देखा, तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और उस गर्म खीरे को अपनी मुट्ठी में भर लिया। वह उसे धीरे-धीरे सहलाने लगी, जिससे रोहन का रस निकलने को बेताब होने लगा। नेहा ने फिर धीरे से उस खीरे को अपने मुंह में लिया और उसे किसी आइसक्रीम की तरह चूसने लगी। रोहन ने अपनी आंखें मूंद लीं और इस अद्भुत सुख का आनंद लेने लगा।

कुछ देर बाद रोहन ने नेहा को अपनी बाहों में उठाया और उसकी जांघिया भी उतार दी। अब नेहा की रेशमी और नम खाई रोहन के सामने थी। उस खाई के आसपास के बाल बहुत ही करीने से तराशे हुए थे। रोहन ने अपनी उंगलियों से उस खाई को टटोलना शुरू किया, जो पहले से ही रस से भीगी हुई थी। जैसे ही उसने उंगली से खोदना शुरू किया, नेहा ने अपनी कमर ऊपर उठा दी और जोर-जोर से सांसें लेने लगी। रोहन ने अपनी जीभ नीचे झुकाई और नेहा की उस गहरी खाई को चाटना शुरू कर दिया। नेहा का शरीर धनुष की तरह तन गया और वह रोहन का सिर अपनी खाई की ओर और जोर से दबाने लगी। रस की धारा अब धीरे-धीरे बहने लगी थी, जो इस बात का संकेत थी कि खुदाई का समय आ गया है।

रोहन ने नेहा को मेज के किनारे पर बिठाया और उसकी टांगों को अपने कंधों पर रख लिया। उसने अपने मजबूत खीरे की नोक को नेहा की गीली खाई के मुहाने पर टिकाया। नेहा ने रोहन की आंखों में देखते हुए कहा, रोहन, मुझे पूरी तरह से खोद डालो, आज कुछ मत छोड़ना। रोहन ने एक गहरा धक्का मारा और उसका आधा खीरा उस तंग और रसीली खाई के अंदर समा गया। नेहा के गले से एक लंबी चीख निकली, जो खुशी और हल्के दर्द का मिश्रण थी। रोहन ने कुछ पल रुककर उसे इस अहसास का आदी होने दिया और फिर धीरे-धीरे खुदाई की गति बढ़ाने लगा। हर धक्के के साथ नेहा के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और ऑफिस का वो केबिन चप-चप की आवाज से गूंज उठा था।

खुदाई अब पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी। रोहन सामने से खुदाई (मिशनरी) करते हुए नेहा की गहराई को नाप रहा था। नेहा के पैर रोहन की कमर के चारों ओर कस गए थे और वह अपनी उंगलियों से रोहन की पीठ को खुरच रही थी। रोहन का खीरा जब नेहा की खाई की दीवारों से टकराता, तो उसे एक असीम सुख का अनुभव होता। नेहा बार-बार चिल्ला रही थी, हाँ रोहन, और जोर से खोदो, तुम्हारा खीरा बहुत बड़ा है। रोहन ने अब पोजीशन बदली और नेहा को मेज पर हाथों के बल खड़ा कर दिया। पीछे से खुदाई (डॉगगी स्टाइल) करते हुए रोहन को नेहा के उभरे हुए पिछवाड़े का नजारा मिल रहा था। वह नेहा के पिछवाड़े पर थप्पड़ मारते हुए और जोर-जोर से अपने खीरे को उसकी खाई में उतारने लगा।

अंतिम क्षण करीब थे। रोहन की गति अब बेकाबू हो चुकी थी और नेहा भी अपने रस छूटने के करीब थी। उसका शरीर बुरी तरह कांप रहा था और उसकी खाई रोहन के खीरे को अंदर की ओर खींच रही थी। रोहन ने अपनी पूरी ताकत समेटी और आखिरी कुछ दमदार धक्के मारे। अचानक नेहा का पूरा शरीर अकड़ गया और उसकी खाई से रसों का सैलाब फूट पड़ा। ठीक उसी समय रोहन का भी धैर्य जवाब दे गया और उसके खीरे ने भी अपना सारा गर्म रस नेहा की गहराई में उड़ेल दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए मेज पर ही गिर पड़े। उनकी सांसें इतनी तेज थीं कि जैसे किसी दौड़ से आए हों। पसीने से तर-बतर उनके शरीर एक-दूसरे की गर्माहट का लुत्फ उठा रहे थे।

खुदाई के बाद की वो शांति बहुत ही सुकून भरी थी। नेहा ने धीरे से रोहन के माथे को चूमा और उसकी छाती पर अपना सिर रख दिया। उसकी हालत ऐसी थी कि वह हिल भी नहीं पा रही थी, उसका पूरा बदन शिथिल पड़ चुका था। रोहन ने उसे अपनी बाहों में कस लिया, उसे अहसास हुआ कि आज के बाद उनका रिश्ता सिर्फ बॉस और इंटर्न का नहीं रह गया है। ऑफिस की लाइटें अब भी मद्धम थीं, लेकिन उन दोनों के बीच एक नई रोशनी का जन्म हो चुका था। नेहा ने धीरे से कहा, कल की प्रेजेंटेशन शायद बहुत अच्छी होगी, क्योंकि मेरा सारा तनाव तुमने निकाल दिया है। रोहन बस मुस्कुरा दिया और नेहा के उन अब शांत हो चुके तरबूजों को धीरे से सहलाने लगा। अगले दिन की चुनौतियों से बेखबर, वे दोनों उस रात के जादू में खोए रहे।

Leave a Comment

You cannot copy content of this page

error: Content is protected !!