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अजनबी हसीन चु@@ई


अजनबी हसीन चु@@ई—>

शहर के उस आलीशान होटल की लॉबी में जब मेरी नज़र पहली बार नयना पर पड़ी, तो मुझे अंदाज़ा भी नहीं था कि यह अजनबी मुलाकात मेरे जीवन की सबसे यादगार रात में बदल जाएगी। मैं एक बिजनेस सेमिनार के लिए वहां गया था और नयना भी उसी ग्रुप का हिस्सा थी, उसकी सादगी और उसकी आंखों की चमक ने पहली ही नज़र में मुझे बेचैन कर दिया था। होटल की पीली रोशनी में उसका गोरा रंग और भी निखर रहा था, जैसे कोई संगमरमर की मूरत अचानक ज़िंदा हो उठी हो और उसके आस-पास की हवा में एक अजीब सा नशा घुला हुआ था। हम दोनों एक ही फ्लोर पर रुके थे और लिफ्ट के इंतज़ार में हुई छोटी सी बातचीत ने ही हमारे बीच एक अनकहा सा खिंचाव पैदा कर दिया था, जो शब्दों से कहीं ज्यादा गहरा महसूस हो रहा था। हम दोनों ही अपने काम के सिलसिले में अकेले थे, और उस अजनबी शहर के उस शांत होटल में हमारा एक-दूसरे से टकराना किसी इत्तेफाक से ज्यादा एक गहरी साजिश लग रहा था जिसे कुदरत ने सिर्फ हमारे लिए रचा था।

नयना की कद-काठी किसी अप्सरा से कम नहीं थी, उसने एक नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी जो उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव को बड़ी खूबसूरती से उभार रही थी। उसके भरे हुए शरीर के उभार, जिन्हें देखकर किसी का भी मन डोल जाए, उस साड़ी के भीतर से अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे, खासकर उसके रसीले बड़े तरबूज जो ब्लाउज की तंग सीमाओं को तोड़ने के लिए बेताब दिख रहे थे। जब वो चलती थी, तो उसके शरीर का हर अंग एक लय में हिलता था और उसकी पतली कमर का घेरा किसी जादू की तरह आंखों को बांध लेता था, जिससे उसकी पूरी बनावट में एक गजब की कामुकता झलकती थी। उसके चेहरे पर एक मासूमियत थी, लेकिन उसकी गहरी भूरी आंखों में एक अनजानी सी प्यास छिपी थी, जिसने मेरे दिल की धड़कनें बढ़ा दी थीं और मुझे उसकी ओर खिंचाव महसूस होने लगा था। उसकी देह की बनावट इतनी संतुलित और आकर्षक थी कि उस पर से नज़र हटाना नामुमकिन था, और उसकी महक मेरे अंदर के सोये हुए जज्बातों को धीरे-धीरे जगा रही थी।

सेमीनार खत्म होने के बाद हम दोनों होटल के बार में मिले, जहाँ हल्की संगीत की धुनें और मद्धम रोशनी ने माहौल को और भी रोमांटिक बना दिया था। बातों-बातों में पता ही नहीं चला कि कब हम अपने निजी जीवन की बातें साझा करने लगे, और नयना की हंसी में वो खनक थी जो सीधे कलेजे को चीरती हुई जा रही थी। हमने एक-एक ड्रिंक ली और फिर उसने मुस्कुराते हुए कहा कि उसे नींद नहीं आ रही है, और क्या हम उसके कमरे में बैठकर थोड़ी और बातें कर सकते हैं। उसके इस निमंत्रण ने मेरे अंदर एक अजीब सी हलचल पैदा कर दी, मेरा मन और शरीर दोनों ही उस पल का इंतज़ार कर रहे थे जहाँ हम अकेले हो सकें। हम दोनों जब उसके कमरे की ओर बढ़े, तो गलियारे की शांति में सिर्फ हमारी धड़कनों की आवाज़ सुनाई दे रही थी, और जैसे ही कमरे का दरवाज़ा खुला, एक अलग ही दुनिया हमारा स्वागत करने के लिए तैयार खड़ी थी।

कमरे के भीतर की हवा थोड़ी ठंडी थी लेकिन हमारे बीच की गर्माहट उसे मात दे रही थी, नयना ने अपना पर्स मेज पर रखा और मेरी ओर मुड़कर देखा। उसकी आँखों में अब झिझक कम और एक गहरी इच्छा साफ़ नज़र आ रही थी, उसने धीरे से अपनी साड़ी का पल्लू अपने कंधे से सरकाया, जिससे उसके गोरे और चिकने कंधे मेरी आँखों के सामने आ गए। मैंने आगे बढ़कर उसके हाथों को अपने हाथों में लिया, उसकी हथेलियाँ थोड़ी ठंडी थीं लेकिन जैसे ही मेरे शरीर का स्पर्श उन्हें मिला, उनमें एक कंपकंपी सी दौड़ गई। मैंने उसकी नज़दीकी को महसूस किया, उसकी साँसों की तेज़ आवाज़ मेरे कानों में गूँजने लगी और उसके शरीर से उठने वाली उस भीनी महक ने मुझे पूरी तरह से अपनी गिरफ्त में ले लिया। हमारा पहला स्पर्श इतना बिजली जैसा था कि ऐसा लगा जैसे सदियों की प्यास एक पल में बुझने वाली है, और मैंने बिना कुछ कहे उसे अपनी बाहों में खींच लिया।

नयना ने अपना सिर मेरे सीने पर रख दिया और उसकी गर्म साँसें मेरी गर्दन को सहलाने लगीं, जिससे मेरे बदन में एक सिहरन सी पैदा हो गई। मैंने उसके रेशमी बालों में अपनी उंगलियाँ फँसाईं और उसके चेहरे को ऊपर उठाकर उसकी आँखों में देखा, जहाँ अब समर्पण की पूरी कहानी लिखी थी। मैंने धीरे से उसके होंठों को अपने होंठों से छुआ, वो स्पर्श इतना कोमल और गहरा था कि हमें समय का अहसास ही नहीं रहा, उसकी कोमलता मेरे अंदर एक आग सुलगा रही थी। उसके हाथ मेरी पीठ पर रेंगने लगे और उसने मुझे और भी ज़ोर से अपनी ओर खींच लिया, जिससे उसके उभरे हुए तरबूज मेरे सीने पर दबने लगे और उस दबाव ने मेरे उत्तेजना को एक नई ऊँचाई पर पहुँचा दिया। हम दोनों के बीच की झिझक अब पूरी तरह से खत्म हो चुकी थी, और कमरे की खामोशी अब हमारी सिसकियों और तेज़ होती साँसों से भरने लगी थी।

मैंने धीरे से उसके ब्लाउज के हुक खोलना शुरू किया, हर हुक के खुलने के साथ मेरा दिल और भी तेज़ धड़क रहा था, जैसे-जैसे कपड़ा उसके बदन से अलग हो रहा था, उसकी सुंदरता के नए आयाम मेरे सामने खुल रहे थे। ब्लाउज हटते ही उसके विशाल और सुडौल तरबूज पूरी तरह से आज़ाद हो गए, जिनके ऊपर लगे गुलाबी मटर की तरह निप्पल ठंड और उत्तेजना से पूरी तरह से तन चुके थे। मैंने अपनी उंगलियों से उन मटर जैसे निप्पलों को धीरे से सहलाया, जिससे नयना के मुँह से एक मद्धम सी कराह निकल गई और उसने अपनी आँखें मूँद लीं। उसके शरीर की बनावट और उसकी त्वचा की चिकनाई इतनी अद्भुत थी कि मेरा हाथ खुद-ब-खुद उसके बदन के हर कोने को तलाशने लगा, और वह मेरे हर स्पर्श पर अपनी कमर को ऊपर उठाकर अपना प्रतिसाद दे रही थी।

अब बारी उसकी साड़ी के पूरी तरह हटने की थी, मैंने धीरे से उसकी कमर पर बंधी गाँठ को खोला और वह रेशमी कपड़ा सरककर फर्श पर एक ढेर की तरह गिर गया। नयना अब मेरे सामने सिर्फ अपने अंतर्वस्त्रों में खड़ी थी, उसकी सुडौल जांघें और उसकी पतली कमर का घेरा किसी सपने जैसा लग रहा था। मैंने नीचे झुककर उसकी नाभि को चूमा और फिर अपनी ज़ुबान को धीरे-धीरे नीचे की ओर ले गया, जहाँ उसकी रेशमी खाई का दरवाज़ा मेरा इंतज़ार कर रहा था। उसकी खाई के ऊपर उगे काले मुलायम बाल उसकी खूबसूरती में एक जंगलीपन जोड़ रहे थे, और वहाँ से निकलने वाली एक प्राकृतिक महक ने मुझे पागल सा कर दिया। मैंने अपनी उंगलियों से उसकी खाई के गीलेपन को महसूस किया, जो इस बात का सबूत था कि वह भी मेरे जितना ही उत्तेजित और तैयार थी।

नयना की उत्तेजना अब चरम पर थी, उसने मेरे कपड़ों को उतारने में मेरी मदद की और जैसे ही मैं पूरी तरह से निर्वस्त्र हुआ, मेरा तना हुआ और सख्त खीरा उसकी आँखों के सामने गर्व से खड़ा था। उसने बड़े प्यार और हसरत भरी नज़रों से मेरे खीरे को देखा और फिर अपने कोमल हाथों से उसे पकड़ लिया, उस स्पर्श ने मेरे पूरे शरीर में करंट जैसा अहसास भर दिया। उसने धीरे-धीरे मेरे खीरे को सहलाना शुरू किया और फिर अपनी जीभ से उसके ऊपरी हिस्से को छुआ, जिससे मुझे अपनी सुध-बुध खोने जैसा महसूस होने लगा। उसने फिर बिना देर किए मेरे खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे चूसने लगी, खीरा मुँह में लेते ही मुझे ऐसा लगा जैसे स्वर्ग के दरवाज़े खुल गए हों, उसकी जीभ का गर्म स्पर्श और उसके मुँह की सोंधी पकड़ मुझे मदहोश कर रही थी।

काफी देर तक खीरा चूसने के बाद, नयना ने मुझे पलंग पर लेटने का इशारा किया और खुद मेरे ऊपर आ गई, उसने अपने पैरों को मेरे दोनों ओर फैलाया जिससे उसकी खाई मेरे खीरे के ठीक ऊपर आ गई। उसने धीरे से अपनी कमर को नीचे झुकाया और मेरा सख्त खीरा उसकी गर्म और मखमली खाई के भीतर सरकने लगा, वह अहसास इतना सुखद और गहरा था कि हम दोनों के मुँह से एक साथ ‘आह’ निकल गई। जैसे ही पूरा खीरा उसकी खाई की गहराई तक पहुँचा, नयना ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी साँस ली, जैसे उसने कोई बहुत बड़ी जंग जीत ली हो। वह धीरे-धीरे अपनी कमर को ऊपर-नीचे करने लगी, और हर नीचे आने वाले धक्के के साथ मेरा खीरा उसकी खाई की दीवारों को सहलाता हुआ और भी भीतर तक धँस जाता, जिससे खुदाई की एक लय बन गई।

खुदाई की इस प्रक्रिया में जैसे-जैसे हमारी गति बढ़ने लगी, कमरे का तापमान भी बढ़ने लगा, पसीने की बूंदें हमारे शरीरों पर चमक रही थीं और हर धक्के के साथ एक थप-थप की आवाज़ गूँज रही थी। मैंने उसके दोनों तरबूजों को अपने हाथों में भर लिया और उन्हें ज़ोर-ज़ोर से मसलने लगा, जबकि मेरे नीचे से लगते धक्के अब और भी गहरे और दमदार होते जा रहे थे। नयना का शरीर हर धक्के पर धनुष की तरह तन जाता था और उसके मटर जैसे निप्पल मेरी उंगलियों के बीच दबकर और भी कठोर हो रहे थे, वह अपनी गर्दन को पीछे की ओर झुकाकर पागलपन की हद तक कराह रही थी। खुदाई अब अपनी पूरी रफ़्तार पर थी, और ऐसा लग रहा था जैसे हम दोनों की आत्माएं भी उन जिस्मानी धक्कों के साथ एक-दूसरे में विलीन हो रही हों, हर पल एक नया और अनूठा आनंद दे रहा था।

कुछ देर बाद मैंने उसे पलंग पर लिटाया और उसके दोनों पैरों को उसके कंधों तक मोड़ दिया, जिससे उसकी खाई पूरी तरह से मेरे सामने खुल गई और खुदाई के लिए सबसे बेहतरीन रास्ता मिल गया। मैंने पूरी ताकत के साथ अपने धक्के मारना शुरू किया, मेरा खीरा उसकी खाई के हर कोने को छू रहा था और नयना के हाथों की पकड़ पलंग की चादर पर इतनी मज़बूत हो गई थी कि चादर में सिलवटें पड़ गईं। उसने चिल्लाते हुए कहा, ‘हाँ… और ज़ोर से… मुझे खोद डालो…’, उसकी इन बातों ने मेरी उत्तेजना में आग का काम किया और मैंने अपनी रफ़्तार और भी बढ़ा दी। हर धक्के पर उसके शरीर में एक कंपकंपी होती थी और उसकी खाई से निकलने वाला रस अब बाहर तक छलक रहा था, जो खुदाई को और भी चिकना और आनंददायक बना रहा था।

अब नयना ने करवट बदली और अपने घुटनों के बल आ गई, जिससे उसका सुडौल पिछवाड़ा मेरी ओर ऊपर उठ गया, यह नज़ारा इतना कामुक था कि मैंने तुरंत उसके पिछवाड़े को पीछे से पकड़ लिया। मैंने अपने खीरे को पीछे से उसकी खाई में उतारा और पिछवाड़े से खुदाई शुरू की, इस पोज़िशन में मेरा खीरा उसकी गहराई को और भी बेहतर तरीके से नाप पा रहा था। वह अपने हाथों को पलंग पर टिकाए हुए हर धक्के के साथ आगे-पीछे हो रही थी, और उसके लटकते हुए तरबूज ज़मीन की ओर झूल रहे थे जिन्हें मैंने अपनी पहुँच में लेकर सहलाना शुरू कर दिया। पिछवाड़े की खुदाई ने उसे चरम सुख के और भी करीब पहुँचा दिया था, उसकी आवाज़ अब लड़खड़ाने लगी थी और उसके बदन में उठने वाली लहरें साफ़ महसूस की जा सकती थीं।

अंत में हम दोनों ही अपनी ऊर्जा के आखिरी छोर पर पहुँच चुके थे, मैंने उसे वापस सीधा लिटाया और उसके ऊपर लेटकर अपनी खुदाई को अंतिम रफ़्तार दी। नयना ने अपनी टांगें मेरी कमर के चारों ओर लपेट लीं और मुझे अपनी ओर खींच लिया, वह मेरे कानों में पागलपन की हद तक फुसफुसा रही थी और फिर अचानक उसका शरीर पूरी तरह से अकड़ गया। उसकी खाई से गर्म रस छूटने लगा और साथ ही मेरा खीरा भी अपना सारा रस उसकी गहराई में छोड़ने के लिए बेताब हो उठा, हम दोनों एक साथ चरमोत्कर्ष पर पहुँचे और कमरे में सिर्फ हमारी गहरी साँसों और संतुष्टि की आवाज़ें रह गईं। वह रस निकलना इतना सुखद था कि ऐसा लगा जैसे सारी दुनिया थम गई हो, हम दोनों पसीने से तर-बतर होकर एक-दूसरे की बाहों में ढह गए, एक ऐसी शांति महसूस हो रही थी जो सिर्फ ऐसी गहरी खुदाई के बाद ही मिल सकती है।

काफी देर तक हम उसी अवस्था में लेटे रहे, एक-दूसरे की धड़कनों को महसूस करते हुए, जैसे हम शब्दों के बिना ही एक-दूसरे से बहुत कुछ कह रहे हों। नयना ने मेरी छाती पर अपना सिर रखा और धीरे से मुस्कुराई, उसकी आँखों में अब एक गजब की तृप्ति और सुकून था, जो उस अजनबी मुलाकात के इस हसीन मोड़ पर पहुँचने की खुशी बयां कर रहा था। उस रात हमने फिर कभी शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया, बस उन अहसासों को जीया जो हमने एक-दूसरे को दिए थे, और उस होटल के कमरे की दीवारों ने हमारे जिस्मों के मिलन की उस दास्तान को हमेशा के लिए अपने अंदर कैद कर लिया। अगली सुबह जब हम बिछड़े, तो हमारे पास कहने को कुछ खास नहीं था लेकिन हमारे बीच का वो खिंचाव और वह रात हमेशा हमारे दिलों में एक मीठी याद की तरह बसी रहनी थी, उस अजनबी हसीन खुदाई की याद।

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