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ऑफिस की रसीली चु@@ई

ऑफिस की रसीली चु@@ई—>रात के करीब बारह बज रहे थे और पूरे कॉर्पोरेट ऑफिस में सन्नाटा पसरा हुआ था, सिवाय उस एक केबिन के जहाँ अनन्या और समीर प्रोजेक्ट की डेडलाइन को पूरा करने में जुटे थे। अनन्या, जो इस फर्म की सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर थी, अपनी उम्र के तीसवें पड़ाव पर थी और उसकी खूबसूरती ऑफिस में चर्चा का विषय रहती थी। आज उसने एक गहरे नीले रंग की सिल्क की साड़ी पहनी थी, जो उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव को बड़ी खूबसूरती से उभार रही थी। उसकी गहरी नाभि और कमर का वह हिस्सा जो साड़ी के नीचे से हल्का सा झलक रहा था, समीर के ध्यान को बार-बार भटका रहा था। समीर, जो अभी सत्ताईस का था और अनन्या का जूनियर, पिछले दो सालों से उसे मन ही मन चाहता था, लेकिन कभी अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था। ऑफिस की मद्धम रोशनी में अनन्या के चेहरे पर थकावट के साथ-साथ एक अजीब सी कशिश थी, जो समीर को मदहोश कर रही थी।

अनन्या का शरीर किसी तराशी हुई मूरत जैसा था, उसके भारी तरबूज साड़ी के ब्लाउज को चीर कर बाहर आने को बेताब लग रहे थे और जब भी वह फाइलें उठाने के लिए झुकती, समीर की सांसें थम जाती थीं। उसकी मखमली त्वचा और चंदन की हल्की खुशबू पूरे केबिन में फैली हुई थी, जिससे माहौल में एक प्राकृतिक उत्तेजना घुल गई थी। समीर ने गौर किया कि अनन्या के चेहरे पर पसीने की नन्ही बूंदें चमक रही थीं और वह बार-बार अपनी उंगलियों से अपने उलझे हुए बालों को कान के पीछे कर रही थी। समीर की नजरें उसके सुडौल पिछवाड़े पर जाकर टिक गईं, जो साड़ी के महीन कपड़े के अंदर से अपनी गोलाई का अहसास करा रहे थे। वह जितना खुद को काम पर केंद्रित करने की कोशिश करता, उसका शरीर उतना ही विद्रोह करने लगता और उसके पतलून के अंदर उसका खीरा धीरे-धीरे अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगा था।

काम के बीच अनन्या अचानक रुकी और समीर की ओर मुड़कर अपनी गहरी आँखों से उसे देखने लगी, जिससे समीर का दिल जोर से धड़कने लगा। अनन्या ने एक लंबी आह भरी और कहा, ‘समीर, मुझे लगता है हमें थोड़ा ब्रेक लेना चाहिए, यह प्रोजेक्ट हमें थका रहा है।’ समीर ने बस सिर हिलाया क्योंकि उसके पास शब्द नहीं थे, उसका सारा ध्यान अनन्या के गुलाबी होठों पर था जो बात करते समय बहुत ही मादक लग रहे थे। दोनों के बीच एक अनकहा जज्बाती जुड़ाव था, जहाँ शब्दों की जरूरत नहीं थी, बस एक-दूसरे की सांसों की आहट ही काफी थी। अनन्या अपनी कुर्सी से उठी और समीर की मेज के पास आकर खड़ी हो गई, जिससे उसकी रेशमी साड़ी समीर के कंधे से छू गई। उस छुअन ने समीर के भीतर जैसे बिजली की एक लहर दौड़ाई और उसका खीरा अब पूरी तरह से कड़ा होकर अपनी सीमाओं को लांघने के लिए तैयार खड़ा था।

आकर्षण की पराकाष्ठा तब पहुंची जब अनन्या ने समीर के हाथ पर अपना हाथ रखा, उसका हाथ बहुत कोमल और हल्का सा गर्म था। समीर ने उसकी आँखों में देखा और उसे वहाँ कामुकता और आमंत्रण की एक गहरी झलक दिखाई दी, जिसे वह अब तक सिर्फ अपनी कल्पनाओं में देखता था। ‘समीर, क्या तुम भी वही महसूस कर रहे हो जो मैं कर रही हूँ?’ अनन्या की आवाज में एक अजीब सी थरथराहट थी जो सीधे समीर की नसों में उतर गई। समीर ने अपनी झिझक को दरकिनार किया और धीरे से अनन्या की कमर पर अपना हाथ रखा, जहाँ साड़ी नहीं थी। उसकी नग्न और रेशमी त्वचा का स्पर्श पाकर समीर के शरीर में कंपकंपी छूट गई और अनन्या ने एक दबी हुई कराह के साथ अपनी आँखें बंद कर लीं। उस पल में ऑफिस की दुनिया और प्रोजेक्ट की फाइलें सब पीछे छूट गईं, बस दो जिस्म और उनकी बेकाबू होती इच्छाएँ बची थीं।

समीर ने धीरे से अनन्या को अपनी ओर खींचा और उसके तरबूजों को अपने सीने से सटा लिया, जिनकी गोलाई समीर को अपने शरीर पर साफ़ महसूस हो रही थी। अनन्या ने समीर के गले में अपनी बाहें डाल दीं और उसकी गर्दन के पास अपनी गरम सांसें छोड़ने लगी, जिससे समीर का संयम पूरी तरह टूट गया। उसने अनन्या के ब्लाउज के ऊपर से ही उसके तरबूजों को सहलाना शुरू किया और महसूस किया कि उसके मटर अब कड़े हो चुके थे, जो साड़ी के कपड़े को भेदने की कोशिश कर रहे थे। अनन्या की सिसकियाँ केबिन की शांति को भंग कर रही थीं, वह समीर के बालों में अपनी उंगलियां फँसाकर उसे और करीब खींच रही थी। समीर ने अब कोई देरी नहीं की और अनन्या के चेहरे को अपने हाथों में लेकर उसके होठों को चूसना शुरू कर दिया, वह उसे इतनी गहराई से चूम रहा था जैसे उसके भीतर का सारा रस पी जाना चाहता हो।

समीर के हाथ अब अनन्या की साड़ी की तहों को खोलने लगे थे और कुछ ही पलों में वह रेशमी कपड़ा फर्श पर ढेर हो गया, जिससे अनन्या का गोरा और कामुक शरीर समीर के सामने पूरी तरह निर्वस्त्र हो गया। अनन्या ने भी समीर की शर्ट के बटन तेजी से खोले और उसके गठीले बदन को देखने लगी, फिर उसकी नजर समीर के कड़े हो चुके खीरे पर पड़ी जो उसकी पैंट से बाहर आने को मचल रहा था। अनन्या ने धीरे से नीचे झुककर समीर के खीरे को अपने कोमल हाथों में पकड़ा और उसे सहलाने लगी, जिससे समीर के मुँह से एक लंबी आह निकली। अनन्या ने अब समीर के खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे बड़ी महारत के साथ चूसने लगी, वह हर इंच को अपनी जीभ से सहला रही थी जैसे वह कोई कीमती फल हो। समीर मदहोशी के उस आलम में था जहाँ उसे अपनी सुध-बुध नहीं थी, वह बस अनन्या के सिर को पकड़कर उसे और गहराई तक लेने के लिए प्रेरित कर रहा था।

कुछ देर बाद समीर ने अनन्या को मेज पर लेटा दिया और उसकी टांगों के बीच अपनी जगह बनाई, जहाँ उसकी रेशमी और गीली खाई उसका इंतजार कर रही थी। समीर ने अपनी जीभ से अनन्या की खाई को चाटना शुरू किया, जिससे अनन्या का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया और वह बेतहाशा सिसकने लगी। समीर की जीभ उसकी खाई के हर कोने को खंगाल रही थी और जब उसने खाई के अंदर अपनी उंगली से खोदना शुरू किया, तो अनन्या की सिसकियाँ चीखों में बदलने लगीं। अनन्या का पूरा बदन पसीने से तरबतर था और वह समीर से विनती करने लगी, ‘समीर, अब और बर्दाश्त नहीं होता, मुझे अपनी खुदाई से भर दो।’ समीर ने भी अब देर करना मुनासिब नहीं समझा और अपने फनफनाते हुए खीरे को अनन्या की रसीली खाई के मुहाने पर टिका दिया, जहाँ से ढेर सारा कुदरती रस निकलकर बाहर बह रहा था।

समीर ने एक जोरदार धक्के के साथ अपने खीरे को अनन्या की तंग खाई के अंदर उतार दिया, जिससे अनन्या के मुँह से एक दर्द और सुख के मेल वाली चीख निकली। खुदाई की प्रक्रिया अब पूरे जोर-शोर से शुरू हो चुकी थी, समीर हर धक्के के साथ अनन्या के भीतर गहराई तक जा रहा था और अनन्या अपने पैरों को समीर की कमर पर कस रही थी। मेज पर रखी फाइलें और पेन स्टैंड इधर-उधर गिर रहे थे, लेकिन उन्हें कोई परवाह नहीं थी, केबिन का वातावरण उनकी उत्तेजना की गर्मी से दहक रहा था। समीर ने अब अनन्या को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, इस पोजीशन में अनन्या के भारी तरबूज नीचे की ओर झूल रहे थे जिन्हें समीर अपने हाथों से मसल रहा था। हर धक्के पर अनन्या का पिछवाड़ा समीर के जांघों से टकराता और एक थप-थप की आवाज पैदा करता जो पूरे केबिन में गूँज रही थी।

खुदाई की गति अब बहुत तेज हो चुकी थी, दोनों के जिस्म पसीने से लथपथ होकर एक-दूसरे से चिपक रहे थे और कमरे में सिर्फ उनके टकराने और भारी सांसों की आवाजें आ रही थीं। अनन्या अब अपने चरम के करीब थी, उसकी खाई समीर के खीरे को अंदर ही अंदर कसकर जकड़ रही थी और उसकी आँखों में एक अजीब सा उन्माद था। ‘समीर, मैं पहुँचने वाली हूँ… और तेज खोदो…’ वह चिल्लाई और समीर ने अपनी पूरी ताकत झोंकते हुए खुदाई को अंतिम मुकाम तक पहुँचाया। अचानक अनन्या का पूरा शरीर कांपने लगा और उसकी खाई से रसों की बौछार होने लगी, वह समीर के नीचे ढेर हो गई। उसी क्षण समीर के खीरे ने भी अपना सारा गरम रस अनन्या की गहराई में छोड़ दिया, जिससे उसे एक असीम शांति का अनुभव हुआ। दोनों एक-दूसरे की बाहों में लिपटे हुए फर्श पर ही बैठ गए, उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं लेकिन दिल अभी भी जोर से धड़क रहे थे।

उस जादुई रात के बाद की फीलिंग बहुत ही सुकूनदेह थी, अनन्या ने अपना सिर समीर के चौड़े कंधे पर रख दिया और समीर उसे अपनी बाहों में समेटे हुए उसके माथे को चूमता रहा। उनकी हालत ऐसी थी जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा युद्ध जीत लिया हो, थके हुए लेकिन पूरी तरह संतुष्ट और शांत। समीर को अहसास हुआ कि यह सिर्फ एक शारीरिक जरूरत नहीं थी, बल्कि अनन्या के प्रति उसके मन में बसी हुई गहरी श्रद्धा और प्रेम का इजहार था। अनन्या की आँखों में भी अब समीर के लिए एक नया सम्मान और अपनापन था, जो शायद कल सुबह ऑफिस की रोशनी में और भी गहरा हो जाने वाला था। उन्होंने धीरे-धीरे अपने कपड़े पहने और केबिन को व्यवस्थित किया, लेकिन उनकी मुस्कुराहटें गवाह थीं कि अब उनके बीच सब कुछ बदल चुका था। वह ऑफिस अब उनके लिए सिर्फ काम की जगह नहीं, बल्कि उनकी अधूरी इच्छाओं के पूर्ण होने का पवित्र मंदिर बन गया था जहाँ उन्होंने एक-दूसरे को रूह तक महसूस किया था।

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