शाम के ढलते सूरज की रोशनी कमरे की खिड़की से छनकर आ रही थी और पूरा कमरा एक सुनहरी आभा में नहाया हुआ था। समीर अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था और उसका ध्यान बार-बार बगल वाले कमरे की तरफ जा रहा था जहाँ उसकी सौतेली माँ कविता तैयार हो रही थी। कविता अभी मात्र बत्तीस साल की थी और समीर के पिता के व्यवसाय के सिलसिले में बाहर जाने के बाद घर में सिर्फ वे दोनों ही अकेले थे। समीर के मन में कविता के लिए एक अजीब सी कशिश थी जो धीरे-धीरे एक गहरी चाहत में बदलती जा रही थी। कविता का शरीर किसी तराशे हुए संगमरमर की मूरत जैसा था और उसकी आँखों में एक ऐसी नमी थी जो किसी को भी अपनी ओर खींचने के लिए काफी थी। समीर अक्सर उसे छुप-छुप कर देखता रहता था और आज की शाम कुछ खास होने वाली थी क्योंकि घर में सन्नाटा अपनी चरम सीमा पर था।
कविता जब कमरे से बाहर निकली तो उसने एक गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी हुई थी जिसका गला काफी गहरा था और उसके उभरे हुए तरबूज उस तंग कपड़े के पीछे से साफ अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे। समीर ने जैसे ही उसे देखा उसकी साँसें अटक सी गईं और उसके शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। कविता के तरबूज इतने रसीले और बड़े लग रहे थे कि समीर का मन हुआ कि वह अभी जाकर उन्हें अपने हाथों में भर ले और उनके ऊपर लगे उन छोटे-छोटे मटर को अपनी उंगलियों से सहलाए। कविता ने समीर की आँखों में छुपी उस हवस और प्यार को देख लिया था लेकिन उसने अनजान बनते हुए मुस्कुराकर पूछा कि क्या उसने खाना खा लिया है। समीर के पास कोई शब्द नहीं थे बस वह उसकी पतली कमर और उसके पीछे के भारी पिछवाड़े को देख रहा था जो हर कदम के साथ लहर मार रहे थे।
समीर और कविता के बीच का भावनात्मक जुड़ाव पिछले कुछ महीनों में बहुत गहरा हो गया था क्योंकि दोनों ही घर में अकेले रहते थे और एक-दूसरे के सुख-दुख साझा करते थे। कविता को भी समीर के जवान और सुडौल शरीर की तरफ एक खिंचाव महसूस होता था लेकिन वह अपनी मर्यादा के कारण चुप रहती थी। समीर को उसकी खुशबू बहुत पसंद थी जो चमेली के फूलों जैसी मीठी और मादक थी। आज जब वे डाइनिंग टेबल पर बैठे थे तो उनके पैर गलती से एक-दूसरे से टकरा गए और एक बिजली सी कौंध गई। समीर ने अपना पैर हटाया नहीं और कविता ने भी कोई विरोध नहीं किया बल्कि उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई थी। उस पल में उन दोनों के बीच की झिझक जैसे कहीं दूर ओझल हो गई थी और उनकी आँखों ने वह सब कह दिया जो जुबान नहीं कह पा रही थी।
रात का अंधेरा गहराता जा रहा था और बाहर हल्की बारिश शुरू हो गई थी जिसकी आवाज कमरे के सन्नाटे को और भी रूमानी बना रही थी। समीर कविता के कमरे के दरवाजे पर खड़ा था और देख रहा था कि वह आईने के सामने खड़ी अपने बालों को संवार रही थी। उसकी साड़ी का पल्लू कंधे से सरक गया था जिससे उसके गोरे और मांसल कंधे पूरी तरह से उजागर हो गए थे। समीर की हिम्मत बढ़ी और वह धीरे से उसके पीछे जाकर खड़ा हो गया और अपनी कांपती हुई उंगलियों से उसके कंधे को छुआ। कविता की पूरी देह कांप उठी और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं जैसे वह इसी स्पर्श का इंतजार कर रही हो। समीर ने अपनी बाहें उसकी कमर के चारों ओर डाल दीं और अपना चेहरा उसकी गर्दन में छुपा लिया जहाँ से उसके जिस्म की गरमाहट उसे मदहोश कर रही थी।
समीर ने धीरे से कविता को अपनी तरफ मोड़ा और उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उनकी साँसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं और माहौल में एक भारी उत्तेजना भर गई थी। समीर ने धीरे से कविता के होंठों पर अपने होंठ रख दिए और उन फूलों की पंखुड़ियों का रसपान करने लगा। कविता ने भी अपनी बाहें समीर की गर्दन के चारों ओर लपेट लीं और उसके इस प्यार भरे हमले का जवाब देने लगी। समीर के हाथों ने अब अपना रास्ता बदल लिया था और वे धीरे-धीरे कविता के रेशमी ब्लाउज के ऊपर से उसके तरबूज को दबाने लगे थे। कविता के मुँह से एक मदभरी आह निकली जब समीर ने उसके मटर को अपनी उंगलियों के बीच दबाया। वह पूरी तरह से समीर की बाहों में पिघल रही थी और उसकी देह का हर कोना अब समीर के लिए प्यासा हो चुका था।
समीर ने बड़ी कोमलता से कविता की साड़ी के पल्लू को पूरी तरह से हटा दिया और उसके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने लगा। जैसे ही ब्लाउज खुला कविता के सफेद और भारी तरबूज समीर की आँखों के सामने पूरी तरह से आजाद हो गए। समीर ने अपनी जुबान से उन तरबूज के ऊपर लगे गुलाबी मटर को सहलाना शुरू किया तो कविता ने उसके सिर को अपने सीने से जोर से सटा लिया। वह सिसकारी भरते हुए कहने लगी कि समीर तुम क्या कर रहे हो यह गलत है लेकिन उसके शरीर की हरकतें कुछ और ही कह रही थीं। समीर ने कहा कि आज कोई गलत या सही नहीं है बस हम हैं और हमारा यह प्यार है। समीर ने अपने हाथ नीचे ले जाते हुए कविता की पेटीकोट की डोरी ढीली की और उसे नीचे गिरा दिया जिससे उसकी रेशमी खाई अब समीर के सामने पूरी तरह से उजागर थी।
समीर ने कविता को धीरे से बिस्तर पर लिटाया और खुद उसके ऊपर आ गया। उसने कविता की जांघों को फैलाया और अपनी उंगली से उसकी गीली खाई को सहलाने लगा। कविता की खाई पहले से ही काफी रसीली हो चुकी थी और समीर की उंगली जैसे ही अंदर गई वह जोर से कराह उठी। समीर ने अपनी उंगली से खोदना जारी रखा जिससे कविता का पूरा शरीर बिस्तर पर धनुष की तरह मुड़ने लगा। वह समीर का नाम पुकारते हुए उससे और भी ज्यादा की मांग करने लगी। समीर ने अब अपने कपड़े उतार फेंके और उसका सात इंच का लंबा और सख्त खीरा अब पूरी तरह से तना हुआ था और अपनी बारी का इंतजार कर रहा था। कविता ने जैसे ही उस खीरे को देखा उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं लेकिन उसकी चाहत अब सातवें आसमान पर थी।
समीर ने कविता की टाँगों को अपने कंधों पर रखा और अपने खीरे का अगला हिस्सा उसकी रसीली खाई के द्वार पर टिका दिया। उसने धीरे से दबाव डाला और खीरे का सिरा उस गरम और तंग खाई के अंदर समाने लगा। कविता ने दर्द और मजे के मिले-जुले अहसास में समीर के कंधों को अपने नाखूनों से जकड़ लिया। समीर ने एक गहरा धक्का मारा और पूरा खीरा जड़ तक कविता की खाई में समा गया। दोनों के मुँह से एक लंबी आह निकली और वे कुछ पलों के लिए उसी अवस्था में जम गए। समीर ने अब धीरे-धीरे अपनी कमर हिलाना शुरू किया और सामने से खोदना (मिशनरी) जारी रखा। हर धक्के के साथ कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके टकराने की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी। समीर ने अपने हाथों से उसके तरबूज को कसकर पकड़ लिया और खुदाई की गति बढ़ा दी।
कमरे में केवल उनके जिस्मों के टकराने की आवाज और उनकी भारी साँसों का शोर था। समीर अब पूरी ताकत से खुदाई कर रहा था और उसका खीरा बार-बार कविता की खाई की गहराई को नाप रहा था। कविता मदहोशी में डूब चुकी थी और वह बस यही कह रही थी कि समीर मुझे और खोदो मुझे बर्बाद कर दो। समीर ने अब उसे घुमाया और उसे बिस्तर पर घुटनों के बल खड़ा कर दिया। पीछे से खुदाई (डॉगगी स्टाइल) करते हुए समीर को कविता के भारी पिछवाड़े के हिलने का जो नजारा मिल रहा था उसने उसकी उत्तेजना को चरम पर पहुँचा दिया। उसने अपने खीरे को कविता के पिछवाड़े की दरार में रगड़ते हुए फिर से उसकी खाई में उतार दिया। इस स्थिति में हर धक्का कविता को सीधा उसकी आत्मा तक महसूस हो रहा था और वह बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींच रही थी।
खुदाई की प्रक्रिया अब अपने अंतिम चरण में थी और दोनों का शरीर पसीने से लथपथ हो चुका था। समीर की गति अब बहुत तेज हो गई थी और वह मशीन की तरह कविता की खाई को खोद रहा था। कविता का शरीर अब कांपने लगा था और उसकी आँखों के सामने जैसे सितारे नाचने लगे थे। अचानक कविता ने एक जोर की चीख मारी और उसके शरीर से ढेर सारा रस छूटने लगा। उसकी खाई की दीवारों ने समीर के खीरे को कसकर जकड़ लिया। समीर ने भी दो-तीन आखिरी और गहरे धक्के मारे और अपना सारा गरम रस कविता की खाई की गहराई में उड़ेल दिया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े और उनकी धड़कनें अभी भी बहुत तेज थीं। वह पल एक असीम शांति और संतुष्टि का था जिसे वे दोनों कभी नहीं भूल सकते थे।
खुदाई के बाद समीर कविता के बगल में लेट गया और उसने उसे अपनी बाहों में समेट लिया। कविता का सिर समीर के सीने पर था और वह धीरे-धीरे उसकी छाती पर अपनी उंगलियाँ फेर रही थी। कमरे में अभी भी उनकी मोहब्बत की खुशबू तैर रही थी। कविता ने समीर की आँखों में देखते हुए कहा कि तुमने मुझे आज वह सुख दिया है जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। समीर ने उसके माथे को चूमा और कहा कि यह तो बस शुरुआत है। उनके बीच का रिश्ता अब और भी गहरा और अटूट हो गया था। वे दोनों काफी देर तक एक-दूसरे को निहारते रहे और फिर उसी सुकून भरी हालत में नींद की आगोश में चले गए। उस रात के बाद से उनके जीवन में एक नया रंग भर गया था जिसमें सिर्फ प्यार और एक-दूसरे के लिए अटूट चाहत थी।