रात के ग्यारह बज चुके थे और कामायनी एक्सप्रेस अपनी पूरी रफ़्तार से पटरियों पर दौड़ रही थी। ट्रेन के एसी कंपार्टमेंट में शांति पसरी हुई थी, बस पहियों की धमक सुनाई दे रही थी। रोहित अपनी लोअर बर्थ पर बैठा हुआ था, तभी सामने वाली बर्थ पर मीनल आकर बैठी। मीनल की उम्र लगभग बत्तीस साल रही होगी, और उसकी देह किसी ढली हुई मूरत जैसी थी। उसने एक गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी हुई थी, जिसमें से उसका गोरा बदन रह-रहकर झलक रहा था। साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसका हुआ था, जिससे उसके भारी तरबूज साड़ी के भीतर अपनी जगह बनाने के लिए छटपटा रहे थे। रोहित उसे देखते ही अपनी सुध-बुध खो बैठा, क्योंकि मीनल की आँखों में एक अजीब सी मादकता और गहराई थी जो किसी को भी अपने मोहपाश में बांध ले।
मीनल का शरीर एक परिपक्व स्त्री की कहानी कह रहा था, उसके कूल्हे थोड़े चौड़े थे और उसकी कमर पतली थी। जब वह अपनी जगह पर बैठ रही थी, तो उसके शरीर के हिलने से उसके तरबूज ऊपर-नीचे हो रहे थे, जो रोहित की धड़कनें बढ़ा रहे थे। साड़ी के ब्लाउज से झांकती उसकी गोरी पीठ और उस पर पड़ने वाली डिम लाइट उसे और भी कामुक बना रही थी। रोहित ने गौर किया कि मीनल के चेहरे पर थकान के साथ-साथ एक अजीब सी बेचैनी थी, शायद उसे भी इस अकेले सफर में किसी के साथ की जरूरत महसूस हो रही थी। उसकी गर्दन पर पसीने की कुछ बूंदें चमक रही थीं, जो धीरे-धीरे फिसलकर उसके तरबूज की गहरी खाई के बीच में छिप रही थीं। रोहित का मन हुआ कि वह उन बूंदों को अपने होंठों से समेट ले, लेकिन वह अपनी भावनाओं को काबू में रखने की कोशिश कर रहा था।
रोहित ने बात शुरू करने के इरादे से मीनल से उसका गंतव्य पूछा, और बातों-बातों में दोनों के बीच एक अनजाना जुड़ाव होने लगा। मीनल ने बताया कि वह अपने पति के पास जा रही है, लेकिन उसकी बातों में वह उत्साह नहीं था जो एक पत्नी में होना चाहिए। बातचीत के दौरान उनके पैर आपस में टकरा गए, और एक बिजली सा करंट दोनों के शरीर में दौड़ गया। मीनल ने अपना पैर हटाया नहीं, बल्कि उसकी आँखों में एक मूक सहमति दिखाई दी। ट्रेन के झटकों के साथ जब भी उनका शरीर एक-दूसरे के करीब आता, रोहित को मीनल के शरीर की महक और उसकी गर्म सांसें महसूस होतीं। उस केबिन का तापमान बढ़ने लगा था, और दोनों के बीच की झिझक अब धीरे-धीरे कम हो रही थी। मीनल की सांसें तेज हो रही थीं और उसकी छाती के तरबूज तेजी से ऊपर-नीचे हो रहे थे, जैसे वह किसी बड़े विस्फोट का इंतजार कर रहे हों।
अचानक ट्रेन ने एक जोरदार मोड़ लिया और मीनल सीधे रोहित की बाहों में आ गिरी। उस स्पर्श ने आग में घी का काम किया; रोहित ने उसे थामने के बहाने उसकी कमर को मजबूती से पकड़ लिया। मीनल ने भी विरोध नहीं किया, बल्कि उसने अपना सिर रोहित के कंधे पर रख दिया। रोहित ने धीरे से अपना हाथ ऊपर उठाया और उसके गालों को सहलाने लगा। मीनल ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी आह भरी, जिससे उसकी साड़ी का पल्लू पूरी तरह नीचे गिर गया। अब उसके पुष्ट और उभरे हुए तरबूज रोहित की नजरों के ठीक सामने थे, जिनके ऊपर लगे छोटे-छोटे मटर ब्लाउज के कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब थे। रोहित ने अपने होंठों को मीनल के होंठों के करीब लाया और धीरे-धीरे उनके बीच का रस पीना शुरू किया।
मीनल ने रोहित के बालों में अपनी उंगलियां फंसा लीं और उसे अपनी ओर और जोर से खींचने लगी। रोहित ने अब अपना हाथ मीनल की साड़ी के भीतर डाल दिया और उसके रेशमी पेट को सहलाने लगा। मीनल की त्वचा मखमली थी, और जैसे ही रोहित का हाथ नीचे की ओर गया, उसने महसूस किया कि मीनल की रेशमी खाई पहले से ही गीली हो चुकी थी। रोहित ने अपने होंठों से उसके गले को चूसा और फिर धीरे-धीरे नीचे उतरते हुए उसके तरबूजों तक पहुँच गया। उसने ब्लाउज के ऊपर से ही एक तरबूज को अपने हाथ में लिया और उसे हल्के से दबाया, जिससे मीनल के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली कराह निकली। मीनल ने अपने हाथ से रोहित के पैंट की जिप खोली और उसके भीतर छिपे हुए कड़क और लम्बे खीरे को बाहर निकाला।
जब मीनल ने पहली बार उस कड़क खीरे को अपने हाथ में लिया, तो उसकी आँखें फैल गईं। वह खीरा काफी बड़ा और तनाव में था, जिस पर नसों का उभार साफ देखा जा सकता था। मीनल ने बिना देर किए उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे बड़े चाव से चूसने लगी। रोहित का पूरा बदन कांप उठा और उसने मीनल के सिर को पकड़कर उसे गहराई तक चूसने में मदद की। केबिन में बस चूसने की आवाजें और मीनल की सिसकियां गूँज रही थीं। रोहित अब और बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था, उसने मीनल को लिटाया और उसकी साड़ी और पेटीकोट को पूरी तरह उतार दिया। मीनल अब पूरी तरह नग्न थी, उसकी गोरी त्वचा चाँदनी में चमक रही थी और उसकी खाई के आसपास के काले बाल उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा रहे थे।
रोहित ने मीनल की टांगों को फैलाया और अपनी जीभ से उसकी गहरी खाई को चाटना शुरू किया। मीनल बिस्तर पर तड़पने लगी और उसने रोहित के सिर को अपनी खाई में जोर से भींच लिया। रोहित की जीभ खाई के भीतर गहराई तक जा रही थी, जिससे मीनल का रस निकलने के करीब पहुँच गया था। मीनल ने कराहते हुए कहा, “रोहित, अब और नहीं, प्लीज मुझे खोदो, मुझे अपने इस खीरे की बहुत जरूरत है!” रोहित ने खुद को संभाला और मीनल के ऊपर आ गया। उसने अपने कड़क खीरे को मीनल की गीली खाई के मुहाने पर रखा और एक ही झटके में उसे आधा भीतर उतार दिया। मीनल की एक दर्द और आनंद से भरी चीख निकली, और उसने रोहित की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए।
रोहित ने धीरे-धीरे अपनी कमर हिलाना शुरू किया, और हर धक्के के साथ वह खीरा मीनल की खाई की गहराई को नाप रहा था। केबिन में दोनों के शरीर के टकराने की ‘चप-चप’ की आवाज गूँजने लगी। मीनल अपनी टांगों को रोहित की कमर के चारों ओर लपेट चुकी थी ताकि खुदाई और भी गहराई तक हो सके। रोहित अब पूरी रफ़्तार से खुदाई कर रहा था, और मीनल हर धक्के पर जोर-जोर से कराह रही थी। उसने मीनल के दोनों तरबूजों को अपने हाथों में पकड़ लिया और उनके मटरों को अपने दांतों से हल्के से काटा। मीनल का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया था और वह अब अपने रस के छूटने के चरम पर थी।
कुछ देर तक सामने से खोदने के बाद, रोहित ने मीनल को बिस्तर पर घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब मीनल का पिछवाड़ा रोहित के सामने था, जो किसी पके हुए फल की तरह गोल और आकर्षक लग रहा था। रोहित ने पीछे से अपने खीरे को फिर से उसकी खाई में डाला और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। इस पोजीशन में खुदाई बहुत गहरी हो रही थी, और मीनल का सिर तकिये में धंसा हुआ था। वह बस सिसकारियां भर रही थी और कह रही थी, “हाँ रोहित, ऐसे ही, और तेज, मुझे पूरी तरह खत्म कर दो!” रोहित की रफ़्तार अब अपनी चरम सीमा पर थी, उसका पसीना मीनल की पीठ पर गिर रहा था।
अंत में, दोनों का शरीर एक साथ कांपने लगा। रोहित ने अपने खीरे को मीनल की खाई में पूरी गहराई तक धंसा दिया और उसका गर्म रस मीनल की गहराई में छलक गया। मीनल ने भी अपने रस को छोड़ते हुए एक लंबी आह भरी और निढाल होकर बिस्तर पर गिर गई। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए थे, उनकी सांसें अब भी तेज थीं लेकिन मन को एक अजीब सी शांति मिल चुकी थी। ट्रेन अब भी अपनी रफ़्तार से चल रही थी, लेकिन उस छोटे से केबिन के भीतर एक अधूरी कहानी पूरी हो चुकी थी। मीनल ने रोहित के माथे को चूमा और धीरे से मुस्कुराते हुए उसकी बाहों में सो गई।