बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और खिड़की के शीशों पर गिरती बूंदों की गूंज कमरे के भीतर के सन्नाटे को और भी गहरा बना रही थी। समीर और नेहा करीब दस साल बाद एक-दूसरे के सामने बैठे थे, कॉलेज के वो दिन जब दोनों एक-दूसरे के लिए धड़कते थे लेकिन कभी कह नहीं पाए थे। नेहा अब एक परिपक्व महिला बन चुकी थी, जिसकी देह की बनावट अब पहले से कहीं ज्यादा निखर और उभर आई थी। उसकी साड़ी के पल्लू से झांकती उसकी गोरी कमर और उस पर पड़ती लाइट की रोशनी समीर के भीतर एक अजीब सी हलचल पैदा कर रही थी। समीर ने गौर किया कि नेहा के शरीर का आकार अब पूरी तरह से बदल चुका था, वह एक खिलते हुए फूल की तरह मांसल और आकर्षक हो गई थी।
नेहा ने जब समीर की तरफ देखा, तो उसकी आँखों में वही पुरानी चमक थी, लेकिन उसमें अब एक दबी हुई प्यास भी नजर आ रही थी। उसने अपनी साड़ी को थोड़ा ठीक किया, जिससे उसके विशाल और गोल तरबूज ब्लाउज के भीतर और भी तंग महसूस होने लगे थे। समीर की नजरें चाहकर भी उन तरबूजों की गहराई से नहीं हट पा रही थीं, जो हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। कमरे में बढ़ती गर्मी और बाहर की ठंडी हवा ने एक अजीब सा विरोधाभास पैदा कर दिया था। दोनों के बीच की बातचीत अब पुरानी यादों से हटकर वर्तमान की संवेदनाओं पर टिकने लगी थी, जहाँ शब्दों से ज्यादा उनकी धड़कनें बातें कर रही थीं।
समीर ने हिम्मत जुटाकर नेहा का हाथ पकड़ा, तो नेहा के शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। उसने अपना हाथ हटाया नहीं, बल्कि समीर की उंगलियों को अपनी उंगलियों में फंसा लिया। समीर ने महसूस किया कि नेहा की हथेलियाँ पसीने से भीगी हुई थीं, जो उसकी उत्तेजना और घबराहट को बयां कर रही थीं। नेहा ने धीमी आवाज में कहा, “समीर, ये सब गलत है, हमें रुकना चाहिए,” लेकिन उसकी आँखों की गहराई कुछ और ही कह रही थी। समीर ने उसके चेहरे को अपने करीब लाया और उसके माथे को सहलाते हुए कहा, “नेहा, इस पल का इंतज़ार मैंने सालों तक किया है, आज हमें कोई नहीं रोक सकता।”
धीरे-धीरे समीर के हाथ नेहा के कंधों से फिसलते हुए उसके भारी तरबूजों तक पहुँच गए। जैसे ही समीर ने उन्हें अपनी हथेलियों में भरा, नेहा के मुंह से एक दबी हुई कराह निकल गई। वे तरबूज इतने नरम और गर्म थे कि समीर को लगा जैसे वह स्वर्ग को छू रहा हो। उसने साड़ी के ब्लाउज के ऊपर से ही उन तरबूजों को मसलना शुरू किया, जिससे नेहा की सांसें तेज चलने लगीं। समीर ने महसूस किया कि नेहा के तरबूजों के बीच के दाने यानी मटर अब सख्त होकर ब्लाउज को चीरने की कोशिश कर रहे थे। नेहा ने अपनी आँखें बंद कर ली थीं और वह समीर के स्पर्श का पूरा आनंद ले रही थी।
समीर ने अब नेहा के ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने शुरू किए, और जैसे ही आखिरी हुक खुला, नेहा के दोनों विशाल तरबूज आज़ाद होकर समीर के सामने अपनी पूरी खूबसूरती के साथ उभर आए। समीर ने उन पर अपनी जीभ फेरी और उन मटर जैसे निप्पलों को अपने होठों में भरकर चूसने लगा। नेहा का शरीर थरथराने लगा और उसने समीर के बालों को अपनी उंगलियों में कसकर जकड़ लिया। वह बार-बार कह रही थी, “ओह समीर, और करो, मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।” समीर ने बारी-बारी से दोनों तरबूजों का रस पिया और उन्हें अपने हाथों से दबाया, जिससे नेहा का पूरा बदन पसीने से तर-बतर हो गया।
अब समीर के हाथ नेहा की साड़ी के नीचे उसकी रेशमी जांघों को सहलाते हुए ऊपर की ओर बढ़ने लगे। जैसे ही उसका हाथ नेहा की रेशमी और मखमली खाई तक पहुँचा, उसने महसूस किया कि वह खाई पूरी तरह से गीली और लिसलिसी हो चुकी थी। समीर ने अपनी उंगलियों से उस खाई के किनारों को सहलाया और फिर धीरे से एक उंगली खाई के भीतर डाल दी। नेहा ने कमर को ऊपर की ओर झटका और एक लंबी आह भरी। समीर ने अब अपनी दो उंगलियां खाई में डालीं और गहराई तक खुदाई शुरू कर दी। नेहा की खाई से निकलने वाला चिकना पदार्थ अब समीर के हाथों को और भी फिसलन भरा बना रहा था।
नेहा अब और बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी, उसने समीर की पैंट की बेल्ट खोली और उसके भीतर से उसके विशाल और फनफनाते हुए खीरे को बाहर निकाला। समीर का खीरा अब पूरी तरह से सीधा और कठोर हो चुका था, जो नेहा के हाथ में आते ही फड़कने लगा। नेहा ने उस खीरे को अपने कोमल हाथों से सहलाया और फिर उसे अपने मुंह के भीतर ले लिया। वह समीर के खीरे को इस तरह चूस रही थी जैसे कोई कीमती फल हो। समीर के मुंह से सुख की कराहें निकलने लगीं और उसका पूरा शरीर उस सुखद अनुभव से कांपने लगा। नेहा ने खीरे के ऊपरी हिस्से को अपनी जीभ से चाटना शुरू किया, जिससे समीर का धीरज जवाब देने लगा।
समीर ने नेहा को बिस्तर पर सीधा लिटाया और उसके पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। उसने अपने कठोर खीरे की नोक को नेहा की गीली और तंग खाई के मुहाने पर रखा। जैसे ही समीर ने एक जोरदार धक्का लगाया, उसका आधा खीरा नेहा की संकरी खाई को चीरता हुआ भीतर समा गया। नेहा के मुंह से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि चरम सुख की थी। समीर ने अब सामने से खोदना शुरू किया, और हर धक्के के साथ उसका खीरा नेहा की खाई की गहराई को नाप रहा था। कमरे में केवल उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ और नेहा की सिसकियाँ गूंज रही थीं।
समीर ने अब नेहा को पलटकर उसे डॉगी स्टाइल में रहने को कहा। नेहा ने अपने घुटनों के बल झुककर अपने भारी पिछवाड़े को समीर की ओर तान दिया। समीर ने पीछे से अपने हाथ नेहा के झूलते हुए तरबूजों पर जमाए और अपने कठोर खीरे को उसके पिछवाड़े के रास्ते से उसकी खाई में फिर से उतार दिया। पिछवाड़े से खोदना नेहा को एक अलग ही दुनिया में ले जा रहा था। समीर की रफ्तार अब और भी तेज हो गई थी, वह किसी जंगली शिकारी की तरह नेहा की खाई की खुदाई कर रहा था। नेहा के बाल बिखरे हुए थे और वह बिस्तर की चादर को अपने दांतों से दबाए हुए थी ताकि उसकी चीखें बाहर न जाएँ।
जैसे-जैसे खुदाई का समय बढ़ता गया, दोनों का उत्साह चरम सीमा पर पहुँच गया। समीर का खीरा अब पूरी तरह से गर्म और फटने को तैयार था, वहीं नेहा की खाई भी बार-बार सिकुड़ रही थी, जो इस बात का संकेत था कि उसका रस निकलने ही वाला है। समीर ने आखिरी कुछ जोरदार धक्के लगाए और नेहा का पूरा शरीर एक बार जोर से कांप कर ढीला पड़ गया। उसकी खाई से ढेर सारा रस निकला, जिसने समीर के खीरे को पूरी तरह भिगो दिया। ठीक उसी पल समीर ने भी अपना सारा गाढ़ा रस नेहा की खाई की गहराइयों में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर निढाल होकर गिर पड़े, उनकी सांसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं।
खुदाई खत्म होने के बाद कमरे में एक अजब सी शांति छा गई, लेकिन वह शांति बहुत ही संतोषजनक थी। समीर ने नेहा को अपनी बाहों में भर लिया और उसके पसीने से भीगे माथे को चूमा। नेहा की आँखों में अब कोई झिझक नहीं थी, बल्कि एक गहरा प्यार और तृप्ति थी। उसने समीर के सीने पर अपना सिर रखा और धीरे से कहा, “तुमने मुझे आज वो सब दे दिया जिसकी मुझे सालों से तलाश थी।” समीर ने उसे और कसकर पकड़ लिया, वह महसूस कर रहा था कि यह शारीरिक मिलन केवल जिस्मों का नहीं बल्कि उनकी बरसों की अधूरी इच्छाओं का संगम था।
पूरी रात वे दोनों उसी तरह एक-दूसरे में सिमटे रहे, कभी बातें करते तो कभी एक-दूसरे के जिस्म की गर्माहट महसूस करते। नेहा की देह पर समीर के उंगलियों के निशान और प्यार की वो निशानी अब उनकी यादों में हमेशा के लिए दर्ज हो चुकी थी। सुबह की पहली किरण जब खिड़की से भीतर आई, तो समीर ने देखा कि नेहा सुकून की नींद सो रही थी, उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो उसने पहले कभी नहीं देखी थी। यह केवल एक रात की खुदाई नहीं थी, बल्कि दो पुराने दोस्तों के बीच के उस मौन प्रेम का इजहार था जिसे शब्दों की अब कोई जरूरत नहीं थी।