बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और बिजली की कड़कड़ाहट दिल को दहला रही थी, लेकिन घर के भीतर एक अलग ही गर्मी पनप रही थी। समीर ने जब कमरे में कदम रखा, तो उसने देखा कि नेहा भाभी अपनी रेशमी साड़ी के पल्लू को ठीक करने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन उनकी वह कोशिश नाकाम लग रही थी क्योंकि उनकी साड़ी बारिश की बूंदों से पूरी तरह भीग चुकी थी और उनके शरीर के हर वक्र को साफ बयां कर रही थी। नेहा के चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी थी, उनकी सांसें तेज चल रही थीं और उनकी आंखों में एक ऐसी प्यास थी जिसे समीर ने पहले कभी नहीं देखा था, वह बस उन्हें एकटक देखता रह गया जैसे उसकी दुनिया वहीं ठहर गई हो।
नेहा भाभी का शरीर किसी तराशे हुए शिल्प की तरह था, उनके सीने पर लदे दो बड़े और रसीले तरबूज साड़ी के भीतर से अपनी जगह बनाने के लिए छटपटा रहे थे और उनके चलने पर वे किसी मदमस्त चाल की तरह ऊपर-नीचे हिल रहे थे। उनके पीछे का हिस्सा यानी उनका पिछवाड़ा इतना भरा हुआ और सुडौल था कि समीर की नजरें वहां से हट ही नहीं रही थीं, उनकी पतली कमर और भारी पिछवाड़े का मेल किसी भी पुरुष को पागल करने के लिए काफी था। समीर ने महसूस किया कि उसके शरीर के निचले हिस्से में हलचल शुरू हो गई है और उसका खीरा धीरे-धीरे अपनी लंबाई और कड़ाई दिखाने लगा है, जो नेहा की उपस्थिति मात्र से ही उत्तेजित हो उठा था।
समीर और नेहा के बीच का रिश्ता हमेशा से ही बहुत गहरा और भावनात्मक रहा था, नेहा उसे अपने देवर से बढ़कर अपना सबसे करीबी दोस्त मानती थीं और समीर के मन में भी उनके लिए बहुत सम्मान था, लेकिन उस रात की खामोशी और बारिश ने उनके बीच के उस सम्मान की दीवार को धीरे-धीरे पिघलाना शुरू कर दिया था। नेहा ने समीर की ओर देखा और उसकी आंखों में छिपी हवस और प्यार के मिश्रण को पढ़ लिया, उनके बीच एक अनकहा जुड़ाव था जो शब्दों का मोहताज नहीं था, बस एक-दूसरे की मौजूदगी ही काफी थी। नेहा ने अपनी भीगी हुई साड़ी को थोड़ा और कसा, जिससे उनके तरबूजों की गहराई और साफ नजर आने लगी, और समीर का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
आकर्षण इतना प्रबल था कि समीर खुद को रोक नहीं पाया और धीरे से नेहा के करीब जाकर खड़ा हो गया, उनकी सांसों की गर्मी एक-दूसरे के चेहरों पर महसूस की जा सकती थी। नेहा के मन में एक पल के लिए झिझक हुई, उनके भीतर का नैतिक संघर्ष उन्हें रोक रहा था, लेकिन समीर की आंखों की गहराई और उसके जिस्म की खुशबू ने उनकी सारी झिझक को मिट्टी में मिला दिया। समीर ने अपना हाथ धीरे से नेहा के कंधे पर रखा, जो साड़ी के गीले होने की वजह से पूरी तरह नग्न सा महसूस हो रहा था, उस पहले स्पर्श ने दोनों के शरीरों में एक बिजली की लहर दौड़ाई दी और नेहा की आंखों ने अनुमति दे दी।
समीर ने नेहा को धीरे से अपनी बाहों में भर लिया और उनके भीगे होंठों को अपने होंठों से ढक लिया, यह चुंबन इतना गहरा और लंबा था कि दोनों की सांसें फूलने लगीं। समीर के हाथ नेहा की पीठ पर फिसलते हुए उनके भारी पिछवाड़े तक जा पहुंचे, जिसे उसने हल्के से दबाया तो नेहा के मुंह से एक दबी हुई कराह निकल गई। नेहा ने भी समीर के शर्ट के बटन खोलने शुरू किए और उसके मजबूत सीने को अपने हाथों से सहलाया, अब उनके बीच कोई पर्दा नहीं रहा था, केवल एक-दूसरे की बढ़ती हुई इच्छाएं और जिस्म की पुकार थी जो कमरे की हवा में साफ महसूस की जा सकती थी।
जैसे-जैसे उत्तेजना बढ़ती गई, समीर ने नेहा की साड़ी को पूरी तरह उतार दिया और उनके सामने उनके दोनों रसीले और भारी तरबूज अब पूरी तरह आज़ाद थे, जिनके बीच में गुलाबी मटर ठंड की वजह से और समीर के स्पर्श की चाहत में पूरी तरह सख्त हो चुके थे। समीर ने अपना सिर झुकाया और एक तरबूज को अपने मुंह में भर लिया, उसके मटर को अपनी जीभ से सहलाते हुए उसने नेहा को मदहोश कर दिया। नेहा ने समीर के सिर को अपने सीने से और जोर से सटा लिया, उनकी उंगलियां समीर के बालों में फंस गई थीं और वे बस अपना आपा खोती जा रही थीं, उनके शरीर से निकलने वाला पसीना अब बारिश की बूंदों के साथ मिल रहा था।
समीर ने अब नेहा को बिस्तर पर लिटा दिया और उनके पैरों के बीच की गहराई यानी उनकी खाई की ओर बढ़ा, वहां फैले हुए रेशमी बालों को उसने अपनी उंगलियों से सहलाया। नेहा की खाई पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वहां से निकलने वाला प्राकृतिक रस समीर को और भी पागल कर रहा था, उसने अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया। नेहा का पूरा शरीर कांपने लगा, उनकी कमर बिस्तर से ऊपर उठने लगी और वे समीर का नाम लेकर कराहने लगीं, उनकी खाई में समीर की जीभ का जादू चल रहा था और वे उस परम आनंद के करीब पहुंच रही थीं जो उन्होंने पहले कभी महसूस नहीं किया था।
अब समीर ने अपने कपड़े पूरी तरह उतार दिए और उसका विशाल और सख्त खीरा पूरी तरह से बाहर आ गया, जिसे देखकर नेहा की आंखें फटी की फटी रह गईं। नेहा ने अपने हाथ बढ़ाकर उस खीरे को थाम लिया और उसे धीरे-धीरे सहलाने लगीं, फिर उन्होंने उसे अपने मुंह में ले लिया और उसे चूसना शुरू किया। खीरे के मुंह में जाते ही समीर की आंखों के सामने अंधेरा छा गया, वह आनंद के उस शिखर पर था जहां उसे केवल नेहा का स्पर्श और उनके मुंह की गर्मी महसूस हो रही थी, नेहा ने बड़ी कुशलता से पूरे खीरे को अपने भीतर समेट लिया था और वह उसे पूरी तरह तृप्त कर रही थीं।
आखिरकार वह समय आ गया जब समीर से और इंतज़ार नहीं हुआ, उसने नेहा को सामने से लेटने के लिए कहा और उनकी जांघों को फैलाकर अपनी जगह बनाई। उसने अपने खीरे की नोक को नेहा की गीली खाई पर रखा और एक ही झटके में उसे आधा भीतर धकेल दिया, नेहा के मुंह से एक तीखी चीख निकली लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि उस पूर्णता की थी जिसका उन्हें बरसों से इंतज़ार था। समीर ने धीरे-धीरे अपनी रफ्तार बढ़ाई और सामने से खोदना शुरू किया, हर धक्के के साथ नेहा के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके मटर समीर के सीने से रगड़ खा रहे थे, जिससे दोनों की उत्तेजना चरम पर पहुंच गई थी।
समीर ने नेहा की पोजीशन बदली और उन्हें पिछवाड़े से खोदने के लिए तैयार किया, नेहा अब घुटनों के बल थीं और उनका भारी पिछवाड़ा ऊपर की ओर उठा हुआ था। समीर ने पीछे से अपने खीरे को उनकी खाई में दोबारा दाखिल किया और पूरी ताकत से धक्के मारने शुरू किए, कमरा उनके शरीरों के टकराने की आवाजों और उनकी आहों से गूंज उठा था। नेहा के बाल बिखरे हुए थे और वे बार-बार समीर को और तेज करने के लिए कह रही थीं, उनकी आंखों में चढ़ा नशा अब अपनी आखिरी मंजिल की तलाश में था, समीर ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी और वह हर धक्के के साथ नेहा की गहराई को नाप रहा था।
खुदाई की यह प्रक्रिया काफी लंबी चली, दोनों के शरीर पसीने से लथपथ थे और उनकी सांसें उखड़ने लगी थीं, लेकिन उनका जोश कम होने का नाम नहीं ले रहा था। समीर ने नेहा को फिर से सीधा लिटाया और उनके पैरों को अपने कंधों पर रख लिया ताकि वह उनकी खाई में और गहराई तक जा सके, अब वह पूरी तरह से लय में था। नेहा के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी, वे बस रस छूटने के उस पल का इंतज़ार कर रही थीं और समीर ने महसूस किया कि उसका खीरा भी अब फटने को तैयार है, उसने आखिरी के कुछ धक्के इतनी तेजी से मारे कि नेहा का पूरा शरीर अकड़ गया।
जैसे ही समीर का रस निकलना शुरू हुआ, नेहा की खाई ने भी अपना सारा रस छोड़ दिया, दोनों एक-दूसरे में सिमटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े। रस की वह धार नेहा के भीतर तक समा गई और उन्हें एक ऐसी शांति का अनुभव हुआ जो उन्होंने आज तक कभी नहीं किया था, समीर उनके ऊपर ही लेटा हुआ अपनी सांसें काबू करने की कोशिश कर रहा था। कमरे में अब केवल बारिश की आवाज थी और उन दोनों की धड़कनें, जो धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं, लेकिन उनके बीच का वह रिश्ता अब और भी गहरा और अटूट हो चुका था, जिसे शब्दों में बयान करना असंभव था।
खुदाई के बाद की वह शांति बहुत सुखद थी, समीर ने नेहा के माथे को चूमा और उन्हें अपनी बाहों में कसकर पकड़ लिया, नेहा ने अपना सिर समीर के सीने पर रख दिया। उनके शरीरों पर चिपका हुआ पसीना और वह गंध उन्हें उस पागलपन की याद दिला रही थी जो अभी-अभी उनके बीच घटा था, नेहा की हालत ऐसी थी जैसे वह किसी सुनहरी नींद में जाने वाली हों। वे दोनों जानते थे कि यह रात उनके जीवन की सबसे यादगार रात बन चुकी है, जहां उन्होंने न केवल जिस्मों को मिलाया बल्कि अपनी आत्माओं को भी एक-दूसरे में विलीन कर दिया था, और अब वे एक नई सुबह की ओर बढ़ रहे थे।