दोस्तों, आपका नया दोस्त कामेश आज अपनी पहली और बिल्कुल सच्ची घटना लेकर आपके सामने हाजिर है।
पहले मैं अपना परिचय दे दूं। मेरा नाम कामेश है। मैं पुणे के पास एक छोटे से शहर में रहता हूं। अभी मेरी उम्र २२ साल है और ये कहानी उस वक्त की है जब मैं २० साल का था। मैं कामुक कहानियां रोज पढ़ता हूं और १८ साल की उम्र से ही इन कहानियों का नशा मेरे ऊपर चढ़ गया था।
जब मैं जवान हुआ तो मेरी इच्छाएं जोर मारने लगी थीं। जवानी सर पर चढ़ रही थी, तो खाई का इंतजाम खोज रहा था। मेरा सारा आकर्षण लड़कियों के बजाय आंटियों पर था… खासकर पड़ोस में रहने वाली रूपाली मैडम पर। दिन-रात बस उन्हें ही खोदने का मन करता था।
वे सुबह-सुबह आंगन में झाड़ू लगाने आती थीं। जैसे ही झुकती थीं, उफ्फ… क्या गजब का पिछवाड़ा दिखता था। मैं जानबूझकर आंगन में बैठ जाता और उनके गोल-मटोल तरबूजों को, जो गाउन के पतले कपड़े से साफ उभर आते थे, और उनके गहरे गुलाबी रंग के रसीले होंठों को ताड़ता रहता। रोज उन्हें देखकर घर आकर खुद को सहलाता था, मन में बस उनकी खाई की कल्पना करके।
हमारे मोहल्ले के कई मर्द तो खुलेआम रूपाली मैडम पर नजरें गड़ाए रहते थे। सबको बस एक ही ख्वाहिश थी कि कब मौका मिले और इनकी खाई को भर दें।
रूपाली मैडम का थोड़ा परिचय दे दूं। आंटी की उम्र करीब ४८ साल है। आपको लगेगा कि इतनी उम्र में क्या होगा? भाई, यकीन मानो वे ४८ में भी ऐसी लगती हैं जैसे कोई जवान फूल अभी-अभी खिला हो। हाइट ५ फीट १० इंच, फिगर ३६-३२-३८ का पूरा भरा-पूरा, मुलायम बदन। वे ज्यादातर घर में ढीला-ढाला गाउन पहनती हैं, जो उनके तरबूजों की आकृति को और भी उभार देता है। स्कूल जातीं तो साड़ी पहन लेती हैं – वो साड़ी में उनकी कमर की लचक, पिछवाड़े की गोलाई और तरबूजों की उभार देखकर कोई भी पुरुष ठिठक जाए।
वे स्कूल में टीचर हैं। पति नौकरी के चलते हफ्ते भर बाहर रहते हैं, वीकेंड पर ही घर लौटते हैं। उनकी दो बेटियां पढ़ाई के लिए बाहर रहती हैं। मतलब रूपाली मैडम घर में ज्यादातर अकेली ही रहती हैं – अकेली और शायद अधूरी।
मैं तो जवानी की शुरुआत से ही उन पर फिदा था। हर वक्त मन करता था कि बस एक बार उन्हें छू लूं, उनकी खाई में अपना खीरा उतार दूं। पर हिम्मत नहीं जुटा पाता था। बस रोज उन्हें सोच-सोचकर खुद को सहलाता था।
फिर जब मैं २० साल का हुआ तो मुझे और मेरे दोस्तों को पता चला कि रूपाली मैडम का किसी अजनबी मर्द के साथ चक्कर चल रहा है। बस, फिर क्या था… उनको खोदने की इच्छा दोगुनी से भी ज्यादा हो गई।
एक रात मैं मूवी देखने गया था। मूवी खत्म हुई, रात के बारह बज रहे थे। घर लौटते वक्त देखा कि रूपाली मैडम के घर से एक हट्टा-कट्टा, सुडौल अजनबी मर्द बाहर निकल रहा था। मैडम उसे गेट तक छोड़ने आई थीं – चेहरा लाल, बाल बिखरे हुए, होंठ सूजे हुए, आंखों में वो थकान और सुख का मिश्रण जो सिर्फ गहरी खुदाई के बाद आता है। मुझे तुरंत समझ आ गया कि इस अजनबी ने अभी-अभी मैडम की खाई को पूरी तरह भर दिया है।
यह देखकर मेरे अंदर आग लग गई। जलन थी, इच्छा थी, और एक अजीब सा जुनून। मैंने ठान लिया कि जैसे भी हो, रूपाली मैडम की खुदाई मुझे करनी ही है।
तब मैंने एक प्लान बनाया। मुझे पता चल चुका था कि वह अजनबी रूपाली मैडम को हर रात खोदने आता है – सिर्फ शनिवार-रविवार को छोड़कर, क्योंकि उन दिनों मैडम के पति घर पर रहते हैं। बाद में पता चला कि पतिदेव को सब मालूम है, पर वह अजनबी को सामने खोदते नहीं देखना चाहता।
खैर, मेरा प्लान तैयार था… अब बस अमल करना था।
शाम को मैं गली में क्रिकेट खेल रहा था। मेरी बैटिंग थी। मैंने जानबूझकर एक जोरदार शॉट मारा तो गेंद सीधी रूपाली मैडम के घर की छत पर चली गई। मुझे गेंद लेने का बहाना मिल गया।
मैं दौड़ा-दौड़ा उनके घर गया और दरवाजा खटखटाने लगा। मैडम ने दरवाजा खोला – “क्या हुआ कामेश?” उनकी आवाज में थोड़ी झुंझलाहट थी, लेकिन आंखों में वो पुरानी मुस्कान।
‘मैडम, गेंद आपके घर की छत पर चली गई है… ले आऊं?’
मैडम भड़क गईं – “ये क्या तमाशा लगा रखा है? अब बड़े हो गए हो, थोड़ा पढ़ाई करो… ये खेलना-वेलना बंद करो!”
मैं मन ही मन बोला कि अरे मैडम, बड़ा हो गया हूं तो एक बार मौका दे दे ना… तेरी सारी अधूरी इच्छाएं पूरी कर दूंगा, तेरी खाई को ऐसे खोदूंगा कि तू मेरी याद में कराहती रहेगी।
पर मुंह से सिर्फ इतना बोला – “सॉरी मैडम… अब नहीं खेलेंगे। बस गेंद लेने दीजिए ना… प्लीज!”
मैडम बोलीं – “जल्दी जाओ और लेकर आओ!”
मैं ऊपर गया, गेंद नीचे फेंकी और नीचे उतरते वक्त जानबूझकर दरवाजे की कुंडी अंदर से नहीं लगाई। बस दरवाजे के पीछे एक पत्थर टिका दिया ताकि हवा से भी न हिले और आवाज भी न करे। फिर मैं चुपचाप घर आ गया।
जाल बिछ चुका था… अब बस दुआ यह थी कि मैडम रात तक छत पर न जाएं और दरवाजा लॉक न करें।
घर पर १० बजने का इंतजार कर रहा था क्योंकि वह अजनबी ठीक १० बजे मैडम को खोदने आता था।
घड़ी में ९:५० हो चुके थे। मैंने घरवालों से कहा – “दोस्त के साथ बाहर जा रहा हूं, रात को लेट आऊंगा।”
बस पीछे के रास्ते से अपनी छत पर चढ़ गया। दो मकान अलग थे, लेकिन छतें जुड़ी हुई थीं। मैं चुपचाप उनकी छत पर पहुंच गया और दरवाजे के पास छिपकर इंतजार करने लगा।
रात के १० बजते ही मैंने देखा – वह अजनबी आया। मैडम ने उसे अंदर लिया। मैं धीरे से छत से नीचे उतरा और खुले दरवाजे से अंदर घुस गया। घर अंधेरा था, सिर्फ बेडरूम से हल्की लाल रोशनी आ रही थी – शायद नाइट लैंप जल रहा था।
मैं चुपके से बेडरूम के दरवाजे के पास पहुंचा। दरवाजा थोड़ा सा खुला था। अंदर का नजारा देखकर मेरी सांस रुक गई।
रूपाली मैडम बिस्तर पर लेटी थीं, गाउन पूरी तरह ऊपर सरका हुआ, तरबूज बाहर निकले हुए, मटर सख्त और उठे हुए। वह अजनबी उनके ऊपर था, अपना खीरा उनकी खाई में धीरे-धीरे अंदर-बाहर कर रहा था। मैडम की कराहें कमरे में गूंज रही थीं – “हाय… और गहराई से… खोदो मुझे… और जोर से…” उनकी उंगलियां अजनबी की पीठ पर नाखून गाड़ रही थीं, शरीर लहरा रहा था।
मैंने अपना फोन निकाला और वीडियो बनानी शुरू कर दी। मेरी सांसें तेज हो गईं, दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, लेकिन मैं चुप रहा। देखते-देखते खुदाई तेज हो गई। मैडम का पिछवाड़ा हिल रहा था, तरबूज उछल रहे थे, पसीना उनकी गर्दन से नीचे बह रहा था। अजनबी जोर-जोर से खोद रहा था, मैडम की आहें अब चीख में बदल रही थीं – “हां… बस ऐसे ही… मेरी खाई भर दो…”
अचानक मैडम का शरीर कांप उठा, खाई सिकुड़ने लगी। रस छूट गया – गर्म, भरपूर, जैसे कोई मीठा फव्वारा फूट पड़ा हो। अजनबी भी रुक नहीं सका – उसका रस निकल आया, मैडम की खाई में भरते हुए। दोनों थककर एक-दूसरे पर गिर पड़े, सांसें भारी, पसीना बहता हुआ।
मैं चुपचाप बाहर निकल आया, दिल अभी भी धड़क रहा था। अब मेरे पास वीडियो थी… और इच्छा अब और भी
तीव्र हो चुकी थी।
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