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पुरानी सहेली की चु@@ई

पुरानी सहेली की चु@@ई—>माया और मैं करीब सात साल बाद एक-दूसरे के सामने थे। कॉलेज के दिनों में वह मेरी सबसे अच्छी दोस्त हुआ करती थी, लेकिन उस समय हमारे बीच दोस्ती के अलावा और कुछ नहीं था। आज जब वह शहर के बाहरी इलाके में बने इस शांत और सुनसान रिसॉर्ट के कमरे में मेरे साथ बैठी थी, तो माहौल कुछ बदला-बदला सा लग रहा था। माया की उम्र अब तीस साल के करीब थी, लेकिन उसकी खूबसूरती में एक नई परिपक्वता आ गई थी। उसका शरीर अब पहले से कहीं अधिक सुडौल और आकर्षक हो गया था। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जो शायद पुरानी यादों की वजह से थी या फिर उस खामोश रात की तन्हाई की वजह से, जिसने हमें एक-दूसरे के बेहद करीब ला खड़ा किया था।

माया ने उस रात एक गहरे नीले रंग की सिल्क की साड़ी पहनी हुई थी, जिसमें उसके शरीर के उतार-चढ़ाव साफ झलक रहे थे। उसकी साड़ी का पल्लू बार-बार उसके कंधों से फिसल रहा था, जिससे उसके भरे हुए तरबूज आधे से ज्यादा दिखाई दे रहे थे। उसकी कमर की गोलाई और उसके भारी पिछवाड़े की बनावट किसी को भी मदहोश करने के लिए काफी थी। जब वह चलती थी, तो उसकी साड़ी की सरसराहट और उसके शरीर की महक पूरे कमरे में फैल जाती थी। उसकी त्वचा दूध जैसी सफेद और बेहद नरम लग रही थी। मैंने महसूस किया कि मेरे अंदर एक अजीब सी हलचल शुरू हो गई थी, जो सालों से दबी हुई थी।

हम दोनों बालकनी में बैठकर शराब के घूँट ले रहे थे। बातों-बातों में पुराने दिनों की यादें ताजा होने लगीं। माया ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ा और कहा, ‘कबीर, क्या तुम्हें याद है हम कॉलेज में कितने करीब थे? फिर भी हमने कभी अपनी सीमाओं को नहीं लांघा।’ उसकी आवाज में एक अजीब सी थरथराहट थी। मैंने उसके हाथ पर अपनी पकड़ मजबूत की और उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा, ‘शायद उस समय हम दोनों ही डरते थे, माया। लेकिन आज वह डर कहीं गायब हो गया है।’ हमारे बीच का भावनात्मक जुड़ाव अब एक शारीरिक खिंचाव में तब्दील होने लगा था। कमरे की मद्धम रोशनी और बाहर होती हल्की बूंदाबांदी ने आग में घी डालने का काम किया था।

धीरे-धीरे बातों का सिलसिला कम हुआ और स्पर्श की भाषा शुरू हो गई। मैंने अपना हाथ माया की कमर पर रखा, जहाँ साड़ी और ब्लाउज के बीच की खाली जगह थी। उसकी रेशमी त्वचा को छूते ही मेरे शरीर में करंट सा दौड़ गया। माया ने भी अपनी आँखें मूँद लीं और धीरे से अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। उसकी गर्म साँसें मेरी गर्दन को छू रही थीं, जिससे मेरे शरीर का तापमान बढ़ने लगा था। मैंने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसकी आँखों में छिपी प्यास को पढ़ने की कोशिश की। वह भी अपनी भावनाओं को अब और नहीं छिपा पा रही थी और उसने अपनी बाहें मेरे गले में डाल दीं।

मन में एक पल के लिए झिझक आई कि क्या यह सही है, लेकिन अगले ही पल माया की बढ़ती नजदीकियों ने सारे संकोच मिटा दिए। मैंने उसे अपनी बाहों में भरकर अपनी ओर खींचा और उसकी गर्दन पर अपने होंठ रख दिए। माया के मुँह से एक हल्की सी कराह निकली और उसने मुझे और कसकर पकड़ लिया। उसकी उंगलियाँ मेरे बालों में उलझ गई थीं और वह अपनी देह को मुझसे सटाने की कोशिश कर रही थी। हमारे शरीर एक-दूसरे की गर्मी को महसूस कर रहे थे और दिल की धड़कनें अब साफ़ सुनी जा सकती थीं। कमरे की खामोशी अब सिर्फ हमारी भारी होती साँसों से टूट रही थी।

मैंने धीरे से उसके ब्लाउज की डोरी खोली और अपने हाथों को उसके भारी तरबूजों तक ले गया। जैसे ही मेरा स्पर्श उन गोल और नरम अंगों पर पड़ा, माया का पूरा शरीर कांप उठा। उसके तरबूज इतने बड़े और सख्त थे कि मेरी हथेलियों में भी नहीं समा रहे थे। मैंने धीरे से उन पर बने मटर जैसे दानों को अपनी उंगलियों से सहलाया, जिससे वह बेकाबू होने लगी। उसकी सिसकारियाँ अब तेज हो गई थीं और वह अपना पिछवाड़ा मेरे खीरे की ओर रगड़ने लगी थी, जो अब पूरी तरह से जाग चुका था और अपनी जगह बनाने के लिए बेताब था।

माया ने अपनी साड़ी उतार फेंकी और अब वह सिर्फ अपने अंतःवस्त्रों में मेरे सामने खड़ी थी। उसके शरीर की बनावट देखकर मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसका पिछवाड़ा इतना मांसल और सुडौल था कि मेरा मन किया कि उसे बस देखता रहूँ। मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया और उसके ऊपर झुक गया। मैंने उसके रेशमी बालों को सहलाते हुए उसके चेहरे को चूमा और फिर धीरे-धीरे नीचे उतरते हुए उसके तरबूजों के बीच अपनी जगह बनाई। वह अपने शरीर को धनुष की तरह मोड़ रही थी और उसकी आँखें आधी बंद थीं, जैसे वह किसी और ही दुनिया में पहुँच गई हो।

अब समय आ गया था उस रहस्यमयी खाई को तलाशने का। मैंने उसके नीचे के कपड़े हटाए और उसकी गहरी खाई के दर्शन किए। वह पूरी तरह से गीली और रसीली हो चुकी थी। वहाँ उगे हुए बारीक बाल उसकी खूबसूरती को और बढ़ा रहे थे। मैंने अपना खीरा निकाला जो अब पत्थर की तरह सख्त और बड़ा हो चुका था। माया ने जब मेरे खीरे को देखा, तो उसकी आँखों में एक चमक और चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई। उसने अपना हाथ बढ़ाकर मेरे खीरे को छुआ और उसे सहलाने लगी। उसकी उंगलियों का स्पर्श इतना सुखद था कि मेरा रस छूटने को बेताब हो गया।

मैंने उसे और तड़पाने के लिए अपनी जीभ का इस्तेमाल किया। मैंने उसकी खाई के किनारों को चाटना शुरू किया, जिससे वह बिस्तर पर तड़पने लगी। उसकी कराहें अब पूरे कमरे में गूँज रही थीं। ‘ओह कबीर, प्लीज… अब और नहीं सहा जाता, मुझे अपनी गहराई दो,’ वह चिल्ला उठी। उसकी बेताबी देखकर मैंने भी अपनी गति बढ़ाई और अपना खीरा उसके मुँह के पास ले गया। उसने बड़े प्यार से मेरे पूरे खीरे को अपने मुँह में समा लिया और उसे चूसने लगी। उसकी जुबान की गर्मी और उसके मुँह का दबाव मुझे स्वर्ग जैसा अहसास करा रहा था।

आखिरकार, मैंने उसे सामने से खोदने की मुद्रा में लिटाया और अपने खीरे का सिरा उसकी रसीली खाई के मुहाने पर टिकाया। एक जोरदार झटके के साथ मैंने अपना पूरा खीरा उसकी खाई के अंदर धकेल दिया। माया के मुँह से एक लंबी आह निकली और उसने मेरे कंधों को अपने नाखूनों से जकड़ लिया। उसकी खाई इतनी तंग और गर्म थी कि मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी ज्वालामुखी के अंदर जा रहा हूँ। मैंने धीरे-धीरे अपनी कमर हिलाना शुरू किया और खुदाई की प्रक्रिया को गति दी। हर धक्के के साथ हमारा पसीना एक-दूसरे में मिल रहा था।

खुदाई जैसे-जैसे बढ़ रही थी, माया का उत्साह भी बढ़ता जा रहा था। वह भी नीचे से अपनी कमर उठा-उठा कर मेरे हर धक्के का जवाब दे रही थी। मैंने उसके दोनों हाथों को बिस्तर से ऊपर दबा दिया और तेजी से उसे खोदने लगा। कमरे में केवल हमारे शरीरों के टकराने की आवाज और हमारी सिसकारियाँ ही सुनाई दे रही थीं। ‘हाँ कबीर, और तेज… मुझे पूरी तरह से भर दो,’ उसने उत्तेजित होकर कहा। मैंने उसे घुमाकर पिछवाड़े से खोदने की स्थिति में ला दिया। उसका भारी पिछवाड़ा ऊपर की ओर उठा हुआ था और मेरी खुदाई का रास्ता अब और भी साफ हो गया था।

पिछवाड़े से खुदाई करते समय जब मेरा खीरा उसकी गहराई को छूता, तो वह पागल सी हो जाती। मैंने उसके दोनों तरबूजों को पीछे से पकड़ लिया और पागलों की तरह उसे खोदने लगा। हमारे बीच का संवाद अब सिर्फ जिस्मानी रह गया था। वह बार-बार अपनी गर्दन पीछे मोड़कर मुझे देख रही थी और उसकी आँखों में बेइंतहा सुख के आंसू थे। मेरी गति अब अपने चरम पर थी। मुझे महसूस हो रहा था कि अब मेरा रस छूटने ही वाला है। माया भी अपने रस निकलने के मुहाने पर खड़ी थी और उसका पूरा शरीर थरथरा रहा था।

तभी एक जोरदार धक्के के साथ माया ने अपना सारा रस छोड़ दिया और उसके साथ ही मैंने भी अपना सारा गर्म रस उसकी गहरी खाई के अंदर उड़ेल दिया। हम दोनों एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े, पूरी तरह से पसीने से लथपथ और हांफते हुए। उस पल ऐसा लगा जैसे वक्त ठहर गया हो। वह खुदाई इतनी गहन और भावुक थी कि हम दोनों को अपनी सुध-बुध नहीं रही। माया ने पलटकर मुझे गले लगा लिया और मेरे माथे को चूमते हुए कहा, ‘यह आज तक का सबसे खूबसूरत अहसास था, कबीर।’

कुछ देर तक हम वैसे ही खामोश पड़े रहे, एक-दूसरे की धड़कनों को महसूस करते हुए। कमरे की हवा में अभी भी उस मिलन की खुशबू और गर्माहट मौजूद थी। माया का शरीर अभी भी हल्का-हल्का कांप रहा था और उसके चेहरे पर एक सुकून भरी संतुष्टि थी। हमने उस रात एक नई शुरुआत की थी, जहाँ दोस्ती के साथ-साथ एक गहरा शारीरिक और भावनात्मक जुड़ाव भी जुड़ गया था। थकावट की वजह से धीरे-धीरे हमारी आँखें मुँदने लगीं और हम एक-दूसरे की बाहों में ही गहरी नींद में सो गए, यह जानते हुए कि कल की सुबह हमारे लिए कुछ नया लेकर आएगी।

अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण कमरे में दाखिल हुई, तो माया ने अपनी आँखें खोलीं और मुझे मुस्कुराते हुए देखा। उसकी त्वचा सुबह की रोशनी में और भी चमक रही थी। हमने एक-दूसरे को फिर से कसकर पकड़ा, कल रात की यादें हमारे जेहन में ताजा थीं। उस खुदाई ने हमारे बीच के सारे फासलों को मिटा दिया था। वह रात सिर्फ वासना की नहीं, बल्कि दो पुराने दोस्तों के रूहानी मिलन की भी थी, जिसने हमें हमेशा के लिए एक-दूसरे का बना दिया था।

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