बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और ठंडी हवाएं कमरे की खिड़कियों को झकझोर रही थीं, जिससे माहौल में एक अजीब सी गर्माहट पैदा हो गई थी। अनीता भाभी रसोई में चाय बना रही थीं, उनकी नीली रेशमी साड़ी उनके सुडौल शरीर पर ऐसे लिपटी थी जैसे कोई बेल किसी तने से लिपटी हो। जब वह झुककर गैस की लौ धीमी करतीं, तो उनके ब्लाउज के पीछे से उनकी गोरी पीठ और कमर का वह हिस्सा साफ दिखता जो रोहन के दिल की धड़कनें बढ़ा देता था। रोहन दरवाजे के पास खड़ा उन्हें देख रहा था, उसके भीतर भावनाओं का एक ज्वार उमड़ रहा था जो आज काबू से बाहर होने को बेताब था। भाभी के शरीर का हर कोना, उनके वे उभरे हुए विशाल तरबूज जो ब्लाउज को फाड़कर बाहर आने को आतुर दिखते थे, रोहन की आंखों में बस गए थे।
अनीता भाभी के जिस्म की बनावट किसी अप्सरा जैसी थी, उनकी कमर पतली थी और उनके नीचे का हिस्सा यानी उनका पिछवाड़ा इतना भरा हुआ और गोल था कि उस पर से नजर हटाना नामुमकिन था। उनके तरबूजों के बीच की जो गहरी लकीर थी, वह रोहन को अपनी ओर खींच रही थी, और उन तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर की तरह उभरे उनके हिस्से साड़ी के पतले कपड़े के पार से भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे। रोहन ने महसूस किया कि आज की खामोशी में एक अनकहा निमंत्रण है, एक ऐसी प्यास जो बरसों से दबी हुई थी। भाभी ने पलटकर रोहन को देखा, उनकी आंखों में भी वही चमक थी, वही अधूरापन और वही दबी हुई इच्छा जो रोहन के चेहरे पर साफ पढ़ी जा सकती थी।
रोहन धीरे-धीरे उनके करीब आया, उसके शरीर से निकलने वाली गर्मी अनीता को महसूस होने लगी थी, और उन दोनों के बीच की दूरी अब महज कुछ इंच की रह गई थी। अनीता की सांसें तेज हो गई थीं, उनके तरबूज ऊपर-नीचे हो रहे थे जैसे वे भी इस स्पर्श का इंतजार कर रहे हों। रोहन ने साहस जुटाकर अपना हाथ उनकी मखमली कमर पर रखा, जहां साड़ी थोड़ी सरक गई थी, और उस पहले स्पर्श ने दोनों के शरीरों में बिजली सी दौड़ा दी। अनीता की आंखों में झिझक थी, लेकिन उनका शरीर समर्पण कर चुका था, उन्होंने धीरे से अपनी आंखें मूंद लीं और रोहन के कंधे पर अपना सिर टिका दिया। इस पल में समाज के कायदे और रिश्तों की दीवारें ढहती हुई महसूस हो रही थीं, बस दो प्यासे बदन थे और एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव।
अनीता ने धीमी आवाज में कहा, ‘रोहन, यह गलत है, हम क्या कर रहे हैं?’ लेकिन उनके स्वर में कोई सख्ती नहीं थी, बल्कि एक ऐसी कराह थी जो बता रही थी कि उन्हें भी इसी की जरूरत थी। रोहन ने उनके कानों के पास फुसफुसाते हुए कहा, ‘भाभी, प्यार कभी गलत नहीं होता, आपकी खामोशी आपकी तड़प बयां कर रही है, और मैं अब और दूर नहीं रह सकता।’ उसने धीरे से उनके होंठों का रसपान किया, वह मीठा मिलन इतना गहरा था कि दोनों के पैर लड़खड़ाने लगे। रोहन ने अपने हाथों से उनके भारी तरबूजों को थाम लिया और धीरे-धीरे उन्हें सहलाने लगा, जिससे अनीता के मुंह से एक दबी हुई आह निकली और उन्होंने रोहन को और जोर से अपने करीब खींच लिया।
माहौल अब पूरी तरह कामुक हो चुका था, रोहन ने भाभी के ब्लाउज की डोरियां खोलनी शुरू कीं, जैसे ही कपड़ा सरका, उनके वे विशाल और सफेद तरबूज पूरी तरह आजाद हो गए। उन पर गुलाबी मटर साफ चमक रहे थे, जो ठंड और उत्तेजना की वजह से और भी सख्त हो गए थे। रोहन ने झुककर उन मटरों को अपने मुंह में लिया और धीरे-धीरे चूसना शुरू किया, अनीता का पूरा शरीर कांप उठा और उन्होंने रोहन के बालों में अपनी उंगलियां फंसा दीं। उनकी सांसें अब एक लय में थीं, और कमरे में केवल उनकी भारी सांसों और बारिश की बूंदों की आवाज गूंज रही थी, जैसे कुदरत भी उनकी इस मिलन गाथा का गवाह बन रही हो।
रोहन ने धीरे से साड़ी के पल्लू को नीचे गिराया और अनीता को पूरी तरह से प्राकृतिक रूप में ले आया, उनके जिस्म की चमक अंधेरे कमरे में भी बिजली की तरह कौंध रही थी। उनकी गहरी खाई अब रोहन के सामने थी, जो रेशमी बालों से ढकी हुई थी और जिसमें से एक भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी। रोहन ने अपनी उंगली से उस खाई को टटोला, तो पाया कि वह पहले से ही गीली और रसीली हो चुकी थी, भाभी की कामवासना अपने चरम पर थी। उन्होंने रोहन के कपड़े भी उतार दिए और जब उनका सख्त और लंबा खीरा भाभी की नजरों के सामने आया, तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गई और उन्होंने धीरे से उस खीरे को अपने हाथ में ले लिया।
अनीता भाभी ने उस गर्म खीरे को सहलाया और फिर धीरे से उसे अपने मुंह में ले लिया, खीरा चूसने की उनकी कला इतनी माहिर थी कि रोहन का रस छूटने ही वाला था। उसने भाभी को बिस्तर पर लेटाया और उनके दोनों पैरों को फैलाकर उनकी उस गहरी खाई के दर्शन किए जो अब पूरी तरह से खुदाई के लिए तैयार थी। रोहन ने पहले अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया, जिससे अनीता बिस्तर पर मछलियां की तरह तड़पने लगीं, उनके हाथ चादर को कसकर जकड़ चुके थे। ‘ओह रोहन, अब और बर्दाश्त नहीं होता, मुझे खोद डालो,’ अनीता ने सिसकते हुए कहा, और रोहन ने बिना देर किए अपने खीरे का सिरा उनकी खाई के मुहाने पर टिका दिया।
धीरे-धीरे रोहन ने अपने खीरे को उस तंग खाई के भीतर धकेलना शुरू किया, अनीता की आंखों से पानी निकल आया लेकिन वह दर्द नहीं, बल्कि एक परम सुख की प्राप्ति थी। जैसे-जैसे खीरा अंदर जा रहा था, अनीता की आवाज और गहरी होती जा रही थी, उन्होंने रोहन की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए। जब पूरा खीरा उस खाई में समा गया, तो दोनों को एक असीम शांति का अनुभव हुआ, जैसे दो बिछड़े हुए मुसाफिर अपनी मंजिल पर पहुंच गए हों। रोहन ने अब धीरे-धीरे अपने कूल्हों को हिलाना शुरू किया, सामने से खुदाई की यह प्रक्रिया इतनी दमदार थी कि कमरे का तापमान और बढ़ गया, हर धक्के के साथ एक थप-थप की आवाज आ रही थी।
रोहन अब पूरी तेजी से अनीता भाभी को खोद रहा था, उनके तरबूज हवा में उछल रहे थे और रोहन बार-बार उन मटरों को अपने मुंह में भर रहा था। अनीता चिल्ला रही थी, ‘हाँ रोहन, ऐसे ही, और तेज, आज अपनी इस भाभी को पूरी तरह अपना बना लो।’ रोहन ने उन्हें घुमाया और पिछवाड़े से खोदने की मुद्रा में ले आया, उनके उभरे हुए पिछवाड़े पर जब रोहन के शरीर की टक्कर होती, तो एक अलग ही आनंद का अहसास होता था। खुदाई इतनी गहरी थी कि अनीता का पूरा शरीर पसीने से तरबतर हो गया था, और उनकी सिसकियां अब चीखों में बदल चुकी थीं जो सुख की पराकाष्ठा को छू रही थीं।
अंततः, वह क्षण आ ही गया जब दोनों का सब्र जवाब दे गया, रोहन ने अपने खीरे को पूरी गहराई तक धंसा दिया और अनीता की खाई के भीतर अपना गर्म रस छोड़ दिया। उसी पल अनीता का भी रस निकल गया, उनका पूरा शरीर थरथराया और वह निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ीं। दोनों एक-दूसरे की बांहों में लिपटे हुए थे, पसीने की बूंदें उनके शरीरों पर मोती की तरह चमक रही थीं। खुदाई के बाद की वह शांति बहुत गहरी थी, जिसमें प्यार, समर्पण और एक अजीब सा सुकून था। अनीता ने रोहन के माथे को चूमा और कहा, ‘आज तुमने मुझे एक नई जिंदगी दी है,’ और रोहन ने उन्हें और जोर से भींच लिया, यह जानते हुए कि यह रिश्ता अब सिर्फ जिस्मानी नहीं, बल्कि रूहानी हो चुका था।