
गर्मी की वो दोपहर बहुत ही उमस भरी थी और पूरे मोहल्ले में सन्नाटा पसरा हुआ था। समीर अपने कमरे में अकेला लेटा हुआ था और खिड़की से पड़ोस वाली छत की ओर देख रहा था। तभी उसकी नज़र अपनी पड़ोसन नीता पर पड़ी, जो छत पर कपड़े सुखाने आई थी। नीता की उम्र करीब तीस साल रही होगी, लेकिन उसका बदन किसी ढलती शाम की तरह गहरा और नशीला था। उसने एक पतली सी सूती साड़ी पहनी थी जो पसीने की वजह से उसके जिस्म से चिपक गई थी। समीर उसे देखते ही मदहोश हो गया और उसके मन में अजीब सी हलचल होने लगी।
नीता का शरीर बहुत ही सुडौल और भरा हुआ था। उसकी साड़ी के पल्लू के नीचे से उसके विशाल तरबूज साफ झलक रहे थे, जो हर हरकत के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। उनके ऊपर उभरे हुए छोटे-छोटे मटर जैसे निशान साफ़ बता रहे थे कि उसे भी अंदर ही अंदर कितनी गर्मी महसूस हो रही थी। जब वो झुककर बाल्टी से कपड़े निकालती, तो उसका भारी और गोल पिछवाड़ा साड़ी को अपनी ओर खींच लेता था, जिससे उसकी बनावट और भी उभर कर सामने आ जाती थी। समीर की नज़रें उसके उन अंगों पर जम गई थीं और उसका अपना खीरा पैंट के अंदर ही अंगड़ाइयां लेने लगा था।
समीर हिम्मत करके छत पर चला गया और बहाने से नीता से बात करने लगा। बातों-बातों में दोनों के बीच एक अनकहा सा खिंचाव महसूस होने लगा। नीता की आँखों में भी एक अजीब सी चमक थी जो समीर को अपनी ओर आमंत्रित कर रही थी। समीर ने धीरे से अपना हाथ नीता की कमर पर रखा, जहाँ साड़ी थोड़ी हटी हुई थी। नीता के शरीर में एक बिजली सी कौंध गई और उसने विरोध करने की बजाय अपनी आँखें मूँद लीं। समीर को अहसास हो गया कि नीता भी उसी आग में जल रही थी जिसमें वो खुद जल रहा था।
उनकी बातचीत अब धीमी फुसफुसाहट में बदल चुकी थी और उनके चेहरे एक-दूसरे के बेहद करीब थे। समीर ने नीता को अपनी बाहों में खींच लिया और उसके गले पर अपनी गर्म साँसों को छोड़ने लगा। नीता की धड़कनें तेज़ हो गई थीं और उसने समीर के बालों में अपनी उंगलियां फँसा दीं। समीर ने उसके ब्लाउज के हुक धीरे-धीरे खोलना शुरू किया और जैसे ही कपड़ा हटा, उसके दोनों विशाल तरबूज आज़ाद होकर बाहर आ गिरे। समीर उन्हें देखकर दंग रह गया और अपनी जीभ से उनके ऊपर मौजूद मटर को सहलाने लगा।
नीता के मुँह से हल्की कराहें निकलने लगीं और उसने समीर को और भी जोर से अपनी ओर भींच लिया। समीर अब नीचे की ओर बढ़ा और उसकी साड़ी और साया पूरी तरह से उतार दिया। नीता अब उसके सामने पूरी तरह से निर्वस्त्र खड़ी थी। उसकी घनी झाड़ियों जैसे बालों के नीचे उसकी गहरी खाई साफ़ नज़र आ रही थी जो पूरी तरह से गीली हो चुकी थी। समीर ने अपनी उंगली से खाई को सहलाया तो नीता का पूरा शरीर काँप उठा। उसने समीर के खीरे को अपनी हथेलियों में थाम लिया और उसे धीरे-धीरे सहलाने लगी।
समीर अब और इंतज़ार नहीं कर सकता था, उसने नीता को छत के एक कोने में दीवार के सहारे खड़ा किया और खुद उसके पैरों के बीच बैठ गया। उसने अपना मुँह उसकी गहरी खाई के पास ले जाकर उसे चाटना शुरू कर दिया। नीता ने उसका सिर पकड़कर अपनी खाई में और भी जोर से दबा लिया। रस की बूंदे अब समीर के मुँह में आने लगी थीं। फिर नीता ने समीर को खड़ा किया और उसके खीरे को अपने मुँह में लेकर उसे चूसना शुरू किया। समीर को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे स्वर्ग मिल गया हो और उसका रस निकलने ही वाला था।
अब असली काम शुरू होने वाला था। समीर ने नीता को सामने से पकड़ा और अपने सख्त खीरे को उसकी तंग खाई के मुहाने पर रखा। जैसे ही उसने एक धक्का मारा, उसका आधा खीरा खाई के अंदर समा गया। नीता ने दर्द और मजे की एक मिली-जुली चीख मारी और समीर के कंधों को जकड़ लिया। समीर ने धीरे-धीरे अपनी गति बढ़ाई और सामने से खोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ नीता के तरबूज हवा में उछल रहे थे और उनके टकराने की आवाज़ सन्नाटे को चीर रही थी।
समीर ने अब नीता को घुमाया और उसे घुटनों के बल झुका दिया। पिछवाड़े से खोदने का मज़ा ही कुछ और था। उसने पीछे से अपना खीरा फिर से उसकी गीली खाई में उतारा और ज़ोर-ज़ोर से धक्के मारने लगा। नीता अब बेकाबू हो चुकी थी और उसके मुँह से सिर्फ समीर का नाम और गहरी आहें निकल रही थीं। पूरा माहौल पसीने की खुशबू और कामुकता से भर गया था। खुदाई की आवाज़ अब और भी तेज़ हो गई थी क्योंकि समीर पूरी ताकत से अपनी मेहनत कर रहा था।
अंत में, जब दोनों की चरम सीमा करीब आई, तो समीर ने नीता को सीधा लिटाया और आखिरी के कुछ बहुत तेज़ धक्के मारे। नीता का शरीर पूरी तरह से अकड़ गया और उसकी खाई से ढेर सारा रस निकलने लगा। ठीक उसी समय समीर के खीरे ने भी अपना सारा रस उसकी खाई की गहराइयों में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए पसीने से तर-बतर फर्श पर गिर पड़े। उनकी साँसें अभी भी तेज़ थीं और शरीर में एक सुखद थकान थी। उस दोपहर की उस रसीली खुदाई ने उनके बीच एक ऐसा रिश्ता बना दिया था जिसे वो कभी भूल नहीं सकते थे।