मैडम की जबरदस्त चु@@ई—>
करीब पांच साल बाद कबीर अपनी सबसे पसंदीदा कॉलेज प्रोफेसर महक के घर के दरवाजे पर खड़ा था। महक हमेशा से ही उसे अपनी ओर खींचती थी, उनकी गंभीर आवाज और उनकी गहरी आँखों में एक रहस्यमयी चमक थी जो उसे कॉलेज के दिनों में भी बेचैन कर देती थी। आज जब महक ने दरवाजा खोला, तो कबीर की सांसें थम सी गईं; वह पहले से कहीं ज्यादा खूबसूरत और निखरी हुई लग रही थीं। उन्होंने एक बैंगनी रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी जो उनके शरीर के हर घुमाव को बड़ी ही खूबसूरती और कामुकता के साथ उभार रही थी। महक ने मुस्कराते हुए उसे अंदर आने का इशारा किया, और उनकी उस मुस्कान ने कबीर के भीतर दबी हुई बरसों पुरानी प्यास को एक बार फिर से जगा दिया।
महक की उम्र करीब पैंतीस साल थी, लेकिन उनका शरीर किसी जवान कली की तरह खिला हुआ और भरा-पूरा था। उनकी रेशमी साड़ी के ब्लाउज से उनके भारी-भरकम और उभरे हुए तरबूज बाहर झांकने के लिए बेताब लग रहे थे, जो कबीर की आँखों को बार-बार अपनी ओर खींच रहे थे। जब वह चल रही थीं, तो उनके भारी और चौड़े पिछवाड़े की मटकन कबीर के दिल की धड़कनें तेज कर रही थी, और उनकी पतली कमर उस भारीपन के साथ एक अद्भुत संतुलन बना रही थी। उनके गोरे बदन पर पसीने की कुछ बूंदें चमक रही थीं, जो उनके शरीर की प्राकृतिक महक के साथ मिलकर एक नशीला माहौल बना रही थीं, जिसे महसूस कर कबीर का मन विचलित होने लगा था।
वे दोनों घर की लाइब्रेरी में बैठे थे, जहाँ महक ने कबीर को चाय पेश की और पुरानी यादों के बारे में बात करने लगीं। बातों-बातों में कबीर ने महसूस किया कि महक की आँखों में एक तरह की तन्हाई और चाहत थी, जो शायद वह सालों से दबाए हुए थीं। लाइब्रेरी की हल्की रोशनी और पुरानी किताबों की खुशबू ने माहौल को और भी रूमानी बना दिया था। कबीर की नजरें बार-बार महक के गले से नीचे उतरती हुई उनके गहरे ब्लाउज की दरार पर जा टिकती थीं, जहाँ से उनके तरबूजों की गोलाई साफ झलक रही थी। महक ने उसकी नजरों को भांप लिया था, लेकिन उन्होंने मना करने के बजाय अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा और ढीला कर दिया, जिससे कबीर की हिम्मत और बढ़ गई।
कबीर धीरे से उठा और महक के करीब जाकर बैठ गया, जिससे उनके शरीर की गर्मी उसे महसूस होने लगी। उसने कांपते हाथों से महक के हाथ को छुआ, और जैसे ही उनकी त्वचा का संपर्क हुआ, महक के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। महक ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक लंबी आह भरी, जिससे उनके तरबूज तेजी से ऊपर-नीचे होने लगे। कबीर ने उनके चेहरे को अपने हाथों में लिया और धीरे-धीरे उनके होंठों के करीब गया, और फिर उनकी पंखुड़ियों का मिलन हुआ। वह स्पर्श इतना गहरा और भावुक था कि दोनों के बीच की झिझक बर्फ की तरह पिघल गई, और महक की बाहें कबीर के गले में कस गईं।
जैसे-जैसे पंखुड़ियों का मिलन गहरा होता गया, कबीर के हाथ महक की कमर के नीचे उनके भारी पिछवाड़े को सहलाने लगे। महक की सांसें तेज हो गई थीं और वे कबीर के शरीर से चिपकती जा रही थीं। कबीर ने धीरे से उनकी साड़ी का पल्लू कंधे से नीचे गिरा दिया, जिससे उनके विशाल और गोरे तरबूज पूरी तरह सामने आ गए। उन तरबूजों के बीच में छोटे-छोटे मटर की तरह उभरे हुए उनके हिस्से कबीर को पागल कर रहे थे। कबीर ने अपने होंठ उन मटरों पर रख दिए और उन्हें धीरे से सहलाने लगा, जिससे महक के मुँह से सिसकारी निकल गई और उन्होंने कबीर के बालों में अपनी उंगलियां फंसा लीं।
महक ने कबीर की शर्ट के बटन खोलने शुरू किए और उसके मजबूत सीने को चूमने लगीं। जल्द ही दोनों पूरी तरह निर्वस्त्र हो गए और लाइब्रेरी के सोफे पर एक-दूसरे की बाहों में थे। कबीर का खीरा अब पूरी तरह से अकड़ चुका था और अपनी प्यास बुझाने के लिए तड़प रहा था। महक की नजर जब उस लंबे और सख्त खीरा पर पड़ी, तो उनकी आँखों में भूख साफ दिखने लगी। उन्होंने कबीर को पीछे धकेला और नीचे झुककर उस खीरा को अपने मुँह में ले लिया। महक ने जिस तरह से उस खीरा को चूसना शुरू किया, कबीर की आँखों के सामने अंधेरा छा गया और वह आनंद की पराकाष्ठा पर पहुँचने लगा।
कुछ देर खीरा चूसने के बाद, महक सोफे पर लेट गईं और अपनी टांगें फैला दीं। कबीर ने देखा कि उनकी रेशमी खाई अब पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वहां के काले बाल पसीने और रस से चमक रहे थे। कबीर ने अपनी उंगली से उस खाई को टटोलना शुरू किया, जिससे महक का पूरा बदन धनुष की तरह तन गया। वह बार-बार कबीर का नाम लेकर कराह रही थीं और अपनी खाई को कबीर के हाथ पर रगड़ रही थीं। कबीर ने अब अपनी जीभ का इस्तेमाल किया और उस गहरी खाई को चाटना शुरू किया, जिससे महक के शरीर में बिजली सी दौड़ गई और वह मदहोशी में अपना सिर हिलाने लगीं।
अब खुदाई का वक्त आ चुका था, कबीर ने अपने खीरे को महक की खाई के द्वार पर रखा और धीरे से भीतर धकेलना शुरू किया। जैसे ही खीरा उस तंग और गरम खाई के अंदर गया, महक के मुँह से एक लंबी और तीखी कराह निकली। ‘ओह कबीर, तुम कितने बड़े हो,’ महक ने सिसकते हुए कहा। कबीर ने धीरे-धीरे सामने से खोदना शुरू किया, और हर धक्के के साथ महक के तरबूज हवा में उछल रहे थे। कमरे में केवल उनके जिस्मों के टकराने की आवाज और महक की सिसकारियां गूंज रही थीं। कबीर ने अपनी गति बढ़ाई और गहरी खुदाई करने लगा, जिससे महक के अंदर का रस बाहर निकलने लगा था।
खुदाई की प्रक्रिया अब और भी उग्र हो गई थी, कबीर ने महक को घुमाया और उन्हें घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब वह पिछवाड़े से खोदना शुरू कर चुका था। इस स्थिति में महक का पिछवाड़ा और भी उभरा हुआ और उत्तेजक लग रहा था। कबीर ने उनके तरबूजों को पीछे से पकड़ लिया और अपने खीरे को पूरी ताकत से उनकी खाई में उतारने लगा। महक बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींच रही थीं और जोर-जोर से चिल्ला रही थीं। ‘और तेज कबीर, मुझे पूरी तरह खोदो!’ महक की यह मांग सुनकर कबीर ने अपनी रफ्तार को चरम पर पहुंचा दिया, और कमरे का तापमान जैसे उबलने लगा।
दोनों का शरीर पसीने से लथपथ हो चुका था, लेकिन उनकी भूख खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी। कबीर ने फिर से स्थिति बदली और महक को ऊपर ले लिया। महक अब कबीर के खीरे पर सवार होकर खुद को खोद रही थीं, उनके तरबूज कबीर के चेहरे के सामने झूल रहे थे। कबीर उन मटरों को चूसते हुए महक की कमर को ऊपर-नीचे होने में मदद कर रहा था। महक के चेहरे पर चरम सुख के भाव थे और उनकी आँखें बंद थीं। जैसे ही कबीर ने महसूस किया कि अब उसका रस छूटने वाला है, उसने महक को कसकर पकड़ लिया और आखिरी कुछ दमदार धक्के लगाए।
अचानक महक का पूरा बदन कांपने लगा और उनकी खाई से भारी मात्रा में रस निकलने लगा। उसी पल कबीर का खीरा भी पूरी तरह से अपनी सीमा लांघ गया और महक की गहराई में अपना सारा गरम रस छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे को पकड़कर सोफे पर गिर पड़े, उनकी सांसें इतनी तेज थीं जैसे कोई दौड़ लगाकर आए हों। महक ने कबीर को अपने सीने से लगा लिया और उसके माथे को चूमा। उस पल में केवल शारीरिक सुख नहीं था, बल्कि एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव भी था जिसे वे सालों से महसूस कर रहे थे।
खुदाई खत्म होने के बाद की वह शांति बहुत ही सुकून भरी थी। महक का बदन अभी भी हल्का-हल्का कांप रहा था और कबीर उनकी रेशमी त्वचा पर अपना हाथ फेर रहा था। ‘मैंने कभी नहीं सोचा था कि हमारा मिलना इस तरह होगा,’ महक ने धीरे से कहा। कबीर ने उनके कानों में फुसफुसाते हुए जवाब दिया, ‘यह तो बस शुरुआत है महक, हमारी कहानी अब असल में शुरू हुई है।’ वे दोनों उसी हाल में घंटों लेटे रहे, अपनी थकान और उस अद्भुत अनुभव को महसूस करते हुए, जो उनकी जिन्दगी में एक नई गर्माहट लेकर आया था।
अगले कुछ घंटों तक उन्होंने प्यार भरी बातें कीं और एक-दूसरे के करीब होने के अहसास को जिया। महक को अब अकेलापन महसूस नहीं हो रहा था, और कबीर को अपनी अधूरी चाहत का मुकाम मिल गया था। उस रात की खुदाई ने न केवल उनके जिस्मों को जोड़ा था, बल्कि उनकी आत्माओं को भी एक कर दिया था। लाइब्रेरी की वे किताबें गवाह थीं कि एक पुरानी छात्र-शिक्षक की मर्यादा कैसे एक गहरे और अटूट प्रेम संबंध में बदल गई थी। अंधेरी रात अब ढलने लगी थी, लेकिन उनके दिलों में जलती हुई वह कामुक आग अब हमेशा के लिए एक मीठी याद बन चुकी थी।