समीर ने खिड़की से बाहर देखते हुए एक गहरी सांस ली, रात के घने अंधेरे में ट्रेन की गड़गड़ाहट एक अलग ही मदहोश कर देने वाला संगीत पैदा कर रही थी। उसके ठीक सामने वाली सीट पर रेखा जी बैठी थीं, जो उसके पड़ोस के ब्लॉक में रहती थीं और इत्तेफाक से आज इसी लंबी दूरी की ट्रेन में उसी के साथ सफर कर रही थीं। उनके चेहरे पर एक हल्की सी रहस्यमयी मुस्कान थी, लेकिन उनकी आंखों में एक अनकही प्यास साफ झलक रही थी, जो समीर को बार-बार अपनी ओर खींच रही थी और उसे बेचैन कर रही थी।
रेखा जी का शरीर किसी अनुभवी मूर्तिकार द्वारा तराशी हुई मूर्ति की तरह था, जिसमें उम्र का परिपक्व तजुर्बा और जवानी की अदम्य कसावट दोनों ही एक साथ मौजूद थे। उन्होंने आज गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी और उनका ब्लाउज काफी गहरा कटा हुआ था, जिसमें से उनके बड़े-बड़े और रसीले तरबूज आधे से ज्यादा बाहर झांक रहे थे। जब भी ट्रेन कोई तेज मोड़ लेती, उनके तरबूज हल्की सी हलचल करते और समीर की धड़कनें किसी नगाड़े की तरह तेज हो जाती थीं, उसका मन बार-बार उन गोल और भरे हुए अंगों को छूने के लिए मचल रहा था।
जैसे-जैसे रात परवान चढ़ती गई, दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला गहरा होता गया और जल्द ही वे अपनी निजी जिंदगी के अनकहे पन्नों और अकेलेपन के बारे में चर्चा करने लगे। रेखा जी ने बहुत ही धीमी आवाज में बताया कि उनके पति अक्सर काम के सिलसिले में हफ्तों बाहर रहते हैं और वह उस बड़े से घर में खुद को कितना अकेला और उपेक्षित महसूस करती हैं। यह कहते हुए उनकी आवाज में एक अजीब सी थिरकन और नमी थी, जिसे सुनकर समीर ने धीरे से उनके नरम हाथों को थाम लिया, और उस एक स्पर्श ने जैसे दोनों के बीच की सारी झिझक की दीवारों को एक पल में ढहा दिया।
समीर ने महसूस किया कि रेखा जी के हाथ थोड़े ठंडे थे लेकिन उनमें एक गजब की बिजली थी जो उसके पूरे शरीर में दौड़ गई थी। उसने धीरे से अपनी उंगलियों को उनकी हथेलियों पर फेरना शुरू किया, जिससे रेखा जी के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई और उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं। समीर ने धीरे से फुसफुसाते हुए कहा, ‘रेखा जी, आप इतनी खूबसूरत हैं कि कोई भी आपको अकेला छोड़ने की गलती कैसे कर सकता है?’ उनके चेहरे पर शर्म की एक हल्की सुर्खी दौड़ गई और उन्होंने समीर की तरफ एक चाहत भरी निगाहों से देखा।
अब झिझक पूरी तरह खत्म हो चुकी थी, समीर अपनी सीट से उठकर उनके पास जाकर बैठ गया और अपना हाथ उनके कंधे पर रख दिया। रेखा जी ने अपना सिर समीर के कंधे पर टिका दिया और एक लंबी आह भरी, जिससे उनके सीने पर मौजूद वे विशाल तरबूज समीर की बाहों से रगड़ने लगे। समीर ने महसूस किया कि उनके तरबूज के ऊपर लगे छोटे-छोटे मटर अब साड़ी के पतले कपड़े के नीचे सख्त होने लगे थे, जो उनकी बढ़ती हुई कामुक उत्तेजना का साफ इशारा कर रहे थे।
समीर ने अब और इंतजार करना मुनासिब नहीं समझा और धीरे से अपना हाथ उनके ब्लाउज के अंदर डाल दिया, जहाँ उसकी उंगलियां उन गर्म और कोमल तरबूजों से टकराईं। रेखा जी के मुंह से एक दबी हुई कराह निकली और उन्होंने समीर के गले में अपनी बाहें डाल दीं, मानो वह सदियों की प्यासी हों। समीर ने उनके तरबूजों को अपनी हथेलियों में भरकर धीरे-धीरे भीचना शुरू किया, और अपनी उंगलियों से उन छोटे मटरों को सहलाने लगा, जिससे रेखा जी का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया।
अगले ही पल समीर ने उनके होठों को अपने होठों में भर लिया और उनका मीठा रस पीने लगा, रेखा जी भी पूरी शिद्दत के साथ उसका साथ दे रही थीं। समीर ने धीरे से उनके साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा दिया और उनके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने लगा, जैसे-जैसे कपड़ा हट रहा था, उनकी गोरी देह का सौंदर्य और भी निखर कर सामने आ रहा था। जब वे पूरी तरह से आजाद हुए, तो समीर ने अपना चेहरा उन तरबूजों के बीच फंसा दिया और उन्हें पागलों की तरह चखने लगा।
रेखा जी की सांसें अब बहुत तेज हो गई थीं, उन्होंने समीर के बालों में अपनी उंगलियां फंसा लीं और उसे अपने और करीब खींचने लगीं। समीर ने अब अपना हाथ नीचे की ओर बढ़ाया और उनकी रेशमी साड़ी को ऊपर उठाना शुरू किया, जहाँ उसे रेशमी और घने बाल महसूस हुए। जैसे ही समीर का हाथ उनकी गहरी और गीली खाई तक पहुँचा, उसे एहसास हुआ कि रेखा जी पहले ही पूरी तरह से तैयार थीं और उनकी खाई से रसीला शहद बहकर बाहर आ रहा था।
समीर ने अपनी दो उंगलियों को धीरे से उस गहरी खाई में उतारा, जिससे रेखा जी के मुंह से एक ऊंची आह निकली और उन्होंने अपनी कमर ऊपर उठा दी। वह अपनी उंगली से खाई में धीरे-धीरे खुदाई करने लगा, जिससे अंदर की गर्मी और नमी समीर को और भी ज्यादा उत्तेजित करने लगी। रेखा जी अब बेकाबू हो रही थीं, उन्होंने समीर की पैंट की चैन खोली और उसके सख्त और गरम खीरा को अपने हाथों में ले लिया, जो अब पूरी तरह से तना हुआ और हमला करने को तैयार था।
उन्होंने अपनी जीभ से उस खीरा को चाटना शुरू किया और फिर उसे अपने पूरे मुंह में ले लिया, समीर की आंखों के सामने जैसे बिजली कौंध गई। वह उनके सिर को पकड़कर तालमेल बिठाने लगा, जबकि रेखा जी बड़ी कुशलता से उस खीरा को चूस रही थीं, मानो वह कोई स्वादिष्ट फल हो। कुछ देर बाद, समीर ने उन्हें बिस्तर पर सीधा लिटाया और उनके दोनों पैरों को चौड़ा करके उनके बीच में बैठ गया, ताकि वह अपनी मुख्य खुदाई की प्रक्रिया शुरू कर सके।
उसने अपने सख्त खीरा की नोक को उनकी गीली खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से एक धक्का दिया, जिससे वह आधा अंदर समा गया। रेखा जी ने दर्द और आनंद की एक मिली-जुली चीख मारी और समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए। समीर ने धीरे-धीरे अपनी गति बढ़ाई और फिर एक जोरदार धक्का मारकर पूरे खीरा को खाई की गहराई तक उतार दिया, जिससे दोनों के शरीर आपस में जोर से टकराए और एक मधुर आवाज गूंज उठी।
ट्रेन की लयबद्ध गति के साथ समीर की खुदाई की रफ्तार भी बढ़ती जा रही थी, वह कभी सामने से खोदता तो कभी उन्हें घुमाकर उनके पिछले हिस्से से खुदाई करने लगता। रेखा जी हर धक्के के साथ ज़ोर-ज़ोर से कराह रही थीं और उनके तरबूज हवा में जोर-जोर से उछल रहे थे। समीर ने उनके पिछवाड़े को मजबूती से पकड़ रखा था और पूरी ताकत के साथ खुदाई कर रहा था, जिससे कमरे का तापमान काफी बढ़ गया था और दोनों पसीने से लथपथ हो चुके थे।
काफी देर तक चली इस जबरदस्त खुदाई के बाद, समीर को महसूस हुआ कि अब उसका बांध टूटने वाला है और रेखा जी भी अपने चरम पर पहुँच रही थीं। उन्होंने समीर को कसकर जकड़ लिया और उनकी खाई के अंदर एक अजीब सी हलचल महसूस हुई, और अगले ही पल दोनों का रस एक साथ छूट गया। समीर का गर्म रस उनकी गहरी खाई को पूरी तरह से भर चुका था, और दोनों निढाल होकर एक-दूसरे की बाहों में गिर पड़े, उनकी सांसें अब भी तेज थीं लेकिन मन को एक असीम शांति मिल चुकी थी।
अगली सुबह जब स्टेशन आया, तो दोनों के बीच एक नया और गहरा रिश्ता बन चुका था, जो सिर्फ शारीरिक नहीं बल्कि भावनात्मक भी था। रेखा जी ने समीर की आंखों में देखते हुए उसे एक आखिरी बार छुआ और मुस्कुराते हुए ट्रेन से नीचे उतर गईं, लेकिन उस रात की खुदाई और उन पलों की गर्माहट समीर के दिलो-दिमाग में हमेशा के लिए दर्ज हो गई थी।