बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और आकाश में बिजली की कड़कड़ाहट पूरे वातावरण को एक अजीब सी उत्तेजना से भर रही थी। घर के अंदर सन्नाटा पसरा हुआ था क्योंकि पिता जी एक हफ्ते के लिए शहर से बाहर किसी बिजनेस मीटिंग के लिए गए हुए थे। शीतल, मेरी सोतेली माँ, अपनी उम्र के उस पड़ाव पर थीं जहाँ उनकी खूबसूरती और यौवन पूरी तरह से निखर कर सामने आ रहा था। वह मात्र सत्ताईस साल की थीं और उनके शरीर का हर हिस्सा किसी सजीली मूर्ति की तरह तराशा हुआ लगता था। उनका रंग एकदम कंचन जैसा साफ था और जब वह चलती थीं तो उनके पैरों की पायल की झंकार पूरे घर में एक मादक संगीत घोल देती थी। मैं आर्यन, इक्कीस साल का जवान लड़का, अपने कमरे में बैठा अपनी किताबों में मन लगाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन मेरा ध्यान बार-बार रसोई की तरफ जा रहा था जहाँ शीतल माँ रात का खाना बना रही थीं।
शीतल माँ का शरीर किसी मदमस्त कर देने वाली सुरा की तरह था, उनके चौड़े कूल्हे और पतली कमर का संगम किसी को भी दीवाना बना सकता था। उनकी साड़ी के पल्लू से झांकते उनके विशाल तरबूज किसी का भी मन भटकाने के लिए काफी थे। उनके उन तरबूजों पर लगे नन्हे मटर जैसे उभार अक्सर मलमल की चोली को चीर कर बाहर आने की कोशिश करते हुए दिखते थे। उनकी गहरी नाभि और कमर का वह तीखा मोड़ देखते ही बनता था। जब भी वह झुकती थीं, तो उनकी पीठ का वह गोरा हिस्सा और उनकी गहरी खाई की झलक मेरे भीतर एक अजीब सी हलचल पैदा कर देती थी। उनके रेशमी बाल हमेशा जूड़े में बंधे रहते थे, लेकिन आज बारिश के कारण कुछ लटें उनके चेहरे पर आकर उनके सौंदर्य में चार चांद लगा रही थीं। उनके चेहरे पर छाई वह हल्की सी मुस्कान और उनकी आंखों की चमक मुझे हमेशा अपनी ओर खींचती थी।
हम दोनों के बीच एक अनकहा सा रिश्ता विकसित हो रहा था, जो केवल माँ-बेटे तक सीमित नहीं रह गया था। घर में अकेले रहने के कारण हम दोनों एक-दूसरे के काफी करीब आ गए थे। शीतल माँ भी मेरी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखती थीं और अक्सर मेरे पास आकर घंटों बातें किया करती थीं। उनकी आवाज़ में वह शहद जैसी मिठास थी जो सीधे दिल को छू जाती थी। अक्सर बातें करते-करते वह अपना हाथ मेरे कंधे पर रख देती थीं और उस स्पर्श से मेरे पूरे शरीर में बिजली सी दौड़ जाती थी। वह भी जानती थीं कि मेरी निगाहें अक्सर उनके उन रसीले तरबूजों पर टिकी रहती हैं, लेकिन उन्होंने कभी इस बात पर नाराजगी नहीं जताई, बल्कि उनकी आँखों में भी एक तरह की शरारत और आमंत्रण नजर आता था। उस रात की तन्हाई ने हम दोनों के बीच के उस भावनात्मक जुड़ाव को एक नई दिशा देने का काम किया।
अचानक बिजली चली गई और पूरे घर में गहरा अंधेरा छा गया। मैंने सुना कि शीतल माँ रसोई में डर के मारे हल्का सा चिल्लाईं। मैं तुरंत मोबाइल की टॉर्च जलाकर रसोई की ओर भागा। वहाँ शीतल माँ दीवार से सटकर खड़ी थीं और उनकी सांसें काफी तेज चल रही थीं। उनके उन विशाल तरबूजों की धड़कन मैं दूर से ही देख सकता था। जब मैं उनके पास पहुंचा, तो उन्होंने घबराहट में मुझे कसकर पकड़ लिया। उनका रेशमी बदन मेरे सीने से पूरी तरह चिपक गया और मुझे उनके उन मुलायम तरबूजों का दबाव महसूस हुआ। उस पल मुझे ऐसा लगा जैसे मेरा खीरा धीरे-धीरे अपनी नींद से जाग रहा हो। उनकी सांसों की गर्मी मेरी गर्दन पर महसूस हो रही थी और उनकी खुशबू मेरे दिमाग को सुन्न कर रही थी। मैंने भी उनके पतले और नाजुक कंधों पर हाथ रख दिया और उन्हें शांत करने की कोशिश करने लगा।
मेरा स्पर्श पाते ही शीतल माँ के शरीर में एक कंपन सी हुई, लेकिन उन्होंने मुझे खुद से अलग नहीं किया। उन्होंने धीरे से अपना सिर उठाया और टॉर्च की मद्धम रोशनी में उनकी आँखें सीधे मेरी आँखों से टकराईं। उन आँखों में डर नहीं, बल्कि एक गहरी प्यास और सालों की तन्हाई साफ़ झलक रही थी। मैंने अपनी उंगलियों से उनके चेहरे पर आई उन भीगी लटों को हटाया और मेरे हाथ धीरे से उनके गालों को सहलाने लगे। शीतल माँ ने अपनी आँखें मूंद लीं और एक गहरी आह भरी। उस पल समय जैसे रुक सा गया था। मेरा मन कह रहा था कि यह गलत है, लेकिन मेरे शरीर की इच्छाओं ने सारे बंधनों को तोड़ दिया था। मैंने धीरे से अपना चेहरा उनके पास ले जाकर उनके माथे पर शहद चखा। वह शांत रहीं, मानो उन्हें भी इसी लम्हे का इंतज़ार था।
धीरे-धीरे मेरा साहस बढ़ता गया और मैंने अपना हाथ उनकी कमर के उस मखमली हिस्से पर रखा जो साड़ी से बाहर था। उनकी कमर इतनी कोमल थी कि मुझे लगा जैसे मैं किसी रेशम के थान को छू रहा हूँ। उन्होंने धीरे से मेरे नाम की कराह ली और अपने हाथ मेरी गर्दन के पीछे डाल दिए। अब हमारे बीच की दूरियां पूरी तरह खत्म हो चुकी थीं। मैंने उनके होठों पर अपना शहद चखना शुरू किया और हम दोनों एक-दूसरे के रसपान में डूब गए। उनकी सांसें उखड़ रही थीं और मेरा खीरा उनकी जांघों के बीच की खाई को महसूस करने के लिए बेचैन हो रहा था। हम दोनों के शरीर एक-दूसरे की गर्मी में पिघल रहे थे। मैंने धीरे से उन्हें गोद में उठा लिया और अंधेरे में ही अपने कमरे की ओर कदम बढ़ा दिए, जहाँ आज एक नई कहानी लिखी जाने वाली थी।
बिस्तर पर लिटाते ही मैंने उनकी साड़ी के पल्लू को धीरे से हटाया। उनके उन विशाल तरबूजों को चोली की कैद से आजाद करना मेरा पहला मकसद था। जैसे ही मैंने उनकी चोली के हुक खोले, उनके दोनों गोरे तरबूज उछलकर बाहर आ गए। उन पर लगे छोटे-छोटे मटर की तरह के उभार अब ठंड और उत्तेजना के कारण पूरी तरह सख्त हो चुके थे। मैंने झुककर बारी-बारी से उन दोनों तरबूजों का रस लेना शुरू किया। शीतल माँ बिस्तर पर तड़प रही थीं और उनकी उंगलियां मेरे बालों को कसकर जकड़े हुए थीं। वह रह-रहकर कराह रही थीं और अपनी कमर को ऊपर की ओर उठा रही थीं। उनके मुँह से निकलने वाली आहें कमरे की खामोशी को चीर रही थीं। मैंने अपना हाथ धीरे से उनकी साड़ी के नीचे ले जाकर उनकी रेशमी खाई के पास मौजूद बालों को सहलाया, जिससे वह पूरी तरह कांप उठीं।
उनकी खाई अब पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वहाँ से एक मदहोश कर देने वाली प्राकृतिक महक आ रही थी। मैंने अपनी उंगली से उनकी उस गीली खाई को खोदना शुरू किया। शीतल माँ ने अपनी टांगें चौड़ी कर दीं और जोर-जोर से सांसें लेने लगीं। उनकी आवाज़ अब और भी गहरी और कामुक हो चुकी थी। “आर्यन… बेटा… और तेज… मुझे आज अपनी पूरी खुदाई दे दो… मैं बरसों से इस दिन का इंतज़ार कर रही थी,” उनकी यह बात सुनकर मेरा खीरा और भी ज्यादा कड़क और बड़ा हो गया। मैंने धीरे से अपनी उंगली से उनकी खाई को गहराई तक खोदा और वह अपने रस में पूरी तरह भीग गईं। वह लगातार अपना पिछवाड़ा बिस्तर पर पटक रही थीं और उनके तरबूज बेतरतीब ढंग से ऊपर-नीचे हो रहे थे।
अब मुझसे और इंतज़ार नहीं हो रहा था। मैंने अपने कपड़े उतारे और अपने उस लंबे और कड़क खीरे को उनकी नज़रों के सामने लाया। शीतल माँ ने उसे देखते ही अपनी आँखें बड़ी कर लीं और धीरे से अपना हाथ बढ़ाकर उसे सहलाया। “कितना बड़ा है यह…” उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा और फिर धीरे से मेरे खीरे को अपने मुँह में ले लिया। उनके मुँह की गर्मी और उनकी जीभ का स्पर्श मेरे खीरे को और भी ज्यादा उत्तेजित कर रहा था। वह उसे किसी कैंडी की तरह चूस रही थीं और मेरा हाथ उनके सिर को पकड़े हुए था। जब मुझे लगा कि मेरा रस निकलने ही वाला है, तो मैंने उन्हें रोका और उन्हें सामने से खोदने के लिए तैयार किया। मैंने उनकी टांगें अपने कंधों पर रखीं और अपने खीरे के मुहाने को उनकी उस गीली खाई पर सेट कर दिया।
मैंने एक गहरे धक्के के साथ अपने खीरे को उनकी उस तंग खाई के अंदर उतार दिया। शीतल माँ के मुँह से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि चरम आनंद की थी। उनकी खाई इतनी तंग थी कि मेरे खीरे को अंदर जाने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी। मैंने धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया और जल्द ही पूरे कमरे में हमारे शरीरों के टकराने की चप-चप की आवाज़ गूंजने लगी। मैं उन्हें पूरी ताकत से खोद रहा था और वह हर धक्के पर मेरा नाम पुकार रही थीं। उनके तरबूज मेरे सीने से टकरा रहे थे और उनके मटर के दाने मेरे शरीर को कुरेद रहे थे। यह खुदाई इतनी गहरी और आनंदमयी थी कि हम दोनों सुध-बुध खो बैठे थे। मैंने उन्हें करवट दिलाकर उनके पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, जिससे उन्हें और भी अधिक आनंद आने लगा।
उनकी आहें अब और भी तेज हो गई थीं। “हाँ आर्यन… वैसे ही… गहराई तक जाओ… अपनी माँ को पूरी तरह से अपना बना लो…” शीतल माँ के इन शब्दों ने मेरे भीतर की आग को और भड़का दिया। मैंने उनकी कमर को मजबूती से पकड़ लिया और अपनी खुदाई की गति को और बढ़ा दिया। हमारे शरीर पसीने से पूरी तरह तर-बतर हो चुके थे और कमरे में उस मिलन की एक सोंधी सी खुशबू फैल गई थी। उनकी खाई अब मेरे खीरे को और भी कसकर पकड़ रही थी, मानो वह उसे कभी छोड़ना नहीं चाहती हो। हर धक्के के साथ वह और भी ज्यादा उत्तेजित हो रही थीं और उनकी आँखें ऊपर की ओर चढ़ने लगी थीं। चरम सीमा अब बहुत करीब थी, और हम दोनों का शरीर कांप रहा था।
अंततः, एक बहुत ही गहरे और शक्तिशाली धक्के के साथ शीतल माँ ने मुझे कसकर जकड़ लिया और उनका रस पूरी तरह से निकल गया। वह बिस्तर पर ढीली पड़ गईं और उनकी सांसें बहुत तेज चलने लगीं। ठीक उसी समय, मेरा खीरा भी अपनी पूरी ताकत के साथ उनकी गहराई में अपना सारा गरम रस छोड़ने लगा। वह एहसास इतना सुखद था कि मुझे लगा जैसे मैं स्वर्ग में हूँ। हमने कई मिनटों तक एक-दूसरे को वैसे ही थामे रखा, हमारे शरीर एक-दूसरे में सिमटे हुए थे और बारिश की आवाज़ अब धीमी हो गई थी। हम दोनों पूरी तरह से थक चुके थे, लेकिन एक अजीब सी संतुष्टि और शांति हमारे चेहरों पर थी। वह रात हमारे जीवन की सबसे यादगार रात बन गई थी, जिसने सभी रिश्तों की सीमाओं को पार कर प्रेम और वासना के एक नए धरातल पर हमें खड़ा कर दिया था।
अगली सुबह जब रोशनी खिड़की से अंदर आई, तो मैंने शीतल माँ को अपनी बाहों में पाया। वह अभी भी सो रही थीं और उनके चेहरे पर एक असीम शांति थी। उनके खुले हुए बाल और उनके शरीर पर पड़ी चादर उनके सौंदर्य को और भी गहरा बना रही थी। मैंने धीरे से उनके माथे को चूमा और महसूस किया कि अब हमारे बीच का रिश्ता केवल शारीरिक नहीं, बल्कि एक गहरे विश्वास और समर्पण का हो गया है। उस रात की खुदाई ने न केवल हमारी प्यास बुझाई थी, बल्कि हमें एक-दूसरे के और भी करीब ला दिया था। हमने तय किया कि यह राज केवल हमारे बीच रहेगा, एक ऐसा मीठा राज जिसे हम बार-बार जीना चाहेंगे। वह मेरी सोतेली माँ थीं, लेकिन अब वह मेरी प्रेमिका, मेरा प्यार और मेरी सबसे गहरी इच्छा भी बन चुकी थीं।