संजना मौसी की रसीली चु@@ई—>
बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और बादलों की गड़गड़ाहट के बीच बिजली की कड़कन दिल को दहला रही थी। कमरे के अंदर सन्नाटा पसरा हुआ था, बस खिड़की से टकराती बारिश की बूंदों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। मैं और मेरी संजना मौसी सोफे पर बैठे हुए थे, और अचानक बिजली गुल हो गई। अंधेरा होते ही कमरे में एक अजीब सी गर्माहट महसूस होने लगी, जो शायद बाहर की ठंडी हवाओं के बिल्कुल विपरीत थी। मौसी के शरीर से उठने वाली चमेली की खुशबू मेरे नथुनों में समा रही थी और मेरा मन विचलित होने लगा था।
संजना मौसी की उम्र करीब अड़तीस साल थी, लेकिन उनका शरीर किसी जवान कली की तरह खिला हुआ था। उनके शरीर का हर हिस्सा उभारों से भरा हुआ था, खासकर उनके बड़े-बड़े तरबूज जो साड़ी के ब्लाउज से बाहर आने को बेताब दिख रहे थे। उनकी कमर का घेरा और उनके भारी पिछवाड़े की बनावट ऐसी थी कि कोई भी उन्हें देखते ही सुध-बुध खो दे। अंधेरे में भी उनकी आँखों की चमक साफ दिख रही थी, और उनकी साँसों की गति धीरे-धीरे तेज़ हो रही थी, जिससे उनके तरबूज ऊपर-नीचे हो रहे थे।
हमारे बीच हमेशा से एक अनकहा सा रिश्ता रहा था, जो प्यार और आकर्षण की महीन रेखा पर टिका था। मौसी मुझे बचपन से ही बहुत चाहती थीं, लेकिन पिछले कुछ सालों में मेरी उनके प्रति भावनाओं में एक कामुक बदलाव आ गया था। वह भी शायद इस बात को महसूस कर रही थीं, क्योंकि जब भी मैं उन्हें देखता, वह अपनी नजरें झुका लेती थीं पर उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान तैर जाती थी। आज इस तन्हाई और अंधेरे ने उस दबे हुए आकर्षण को बाहर निकलने का एक सुनहरा मौका दे दिया था।
अचानक बिजली की एक तेज़ चमक हुई और मौसी डर के मारे मेरे करीब आ गईं। उनका कोमल शरीर मुझसे छू गया और मेरे पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई। उनकी रेशमी साड़ी का स्पर्श और उनके तरबूज का दबाव मेरी छाती पर महसूस होते ही मेरा रोम-रोम कांप उठा। मैंने झिझकते हुए अपना हाथ उनकी पतली कमर पर रखा, जहाँ उनकी त्वचा मखमली एहसास दे रही थी। मौसी ने मुझे रोका नहीं, बल्कि अपनी पकड़ मेरे कंधों पर और भी मजबूत कर ली, जिससे हमारे बीच की दूरी खत्म हो गई।
मेरे मन में एक तीव्र संघर्ष चल रहा था कि क्या यह सही है, लेकिन उनकी धड़कनों की आवाज़ ने मेरी सारी झिझक को मिटा दिया। मैंने धीरे से अपना चेहरा उनके गले की तरफ झुकाया और उनकी महक को महसूस किया। मौसी के गले से एक हल्की सी कराह निकली, जो इस बात का संकेत थी कि वह भी इस पल का उतना ही इंतज़ार कर रही थीं। मेरी उंगलियां उनकी कमर पर रेंगने लगीं और धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ने लगीं, जहाँ उनका भारी पिछवाड़ा सोफे के कुशन में दबा हुआ था।
मैंने साहस जुटाकर उनके होंठों को अपने होंठों से स्पर्श किया। मौसी ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं और फिर पूरे जुनून के साथ मेरा साथ देने लगीं। हमारे होंठ आपस में ऐसे उलझ गए जैसे दो प्यासे पंछी पानी की तलाश में हों। उनकी जीभ का स्वाद शहद जैसा मीठा था। इस चुंबन के दौरान मेरा हाथ उनके ब्लाउज के ऊपर पहुँच गया, जहाँ मैंने उनके विशाल तरबूज को अपनी मुट्ठी में भर लिया। वह इतने नर्म और रसीले महसूस हो रहे थे कि मेरा जी चाहा कि उन्हें बस सहलाता रहूँ।
मौसी के मुँह से सिसकारियां निकलने लगीं जब मैंने उनके ब्लाउज के हुक धीरे-धीरे खोलने शुरू किए। जैसे ही ब्लाउज ढीला हुआ, उनके शानदार तरबूज पूरी तरह से मेरे सामने आ गए। उनके ऊपर लगे छोटे-छोटे मटर ठंड और उत्तेजना की वजह से बिल्कुल सख्त हो चुके थे। मैंने अपने हाथों से उन मटरों को सहलाया और फिर बारी-बारी से उन्हें अपने मुँह में भरकर चूसने लगा। मौसी ने अपना सिर पीछे की ओर झुका दिया और उनके हाथों के नाखून मेरी पीठ में गड़ गए, जो उनके आनंद की गवाही दे रहे थे।
अब उत्तेजना अपने चरम पर थी। मैंने मौसी को सोफे से उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया। उनके शरीर की बनावट इस समय किसी अप्सरा जैसी लग रही थी। मैंने उनकी साड़ी को पूरी तरह से हटा दिया, जिससे उनकी गहरी और रसीली खाई मेरे सामने आ गई। वहाँ के घने काले बाल उस खाई की शोभा बढ़ा रहे थे। मैंने धीरे से अपनी उंगली उनकी खाई में डाली, जो पहले से ही गीली और फिसलन भरी हो चुकी थी। उंगली से खोदना शुरू करते ही मौसी बिस्तर पर मछली की तरह तड़पने लगीं और बार-बार मेरा नाम पुकारने लगीं।
मैंने अपना खीरा बाहर निकाला, जो उत्तेजना की वजह से पत्थर की तरह सख्त और लंबा हो चुका था। मौसी ने जब पहली बार मेरे खीरे को देखा, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गई। उन्होंने झिझकते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया और मेरे खीरे को सहलाने लगीं। फिर उन्होंने उसे अपने मुँह में ले लिया और रसीले ढंग से खीरा चूसना शुरू कर दिया। उनके मुँह की गर्माहट और जीभ की हरकत ने मुझे पागल कर दिया था, मुझे महसूस हो रहा था कि बस अब मेरा रस निकलने ही वाला है।
लेकिन मैंने खुद पर काबू रखा और मौसी को सीधा लिटा दिया। अब समय था असली खुदाई का। मैंने मौसी की टांगों को फैलाया और अपने खीरे के अगले हिस्से को उनकी खाई के मुहाने पर रखा। जैसे ही मैंने थोड़ा दबाव दिया, मौसी के मुँह से एक लंबी आह निकली। उनकी खाई बहुत तंग थी, लेकिन फिर भी मेरा खीरा धीरे-धीरे अंदर जाने लगा। पूरी तरह से अंदर जाते ही मौसी ने मुझे कसकर गले लगा लिया। मैंने सामने से खोदना शुरू किया, हर धक्का गहरा और दमदार था, जिससे मौसी के तरबूज जोर-जोर से उछल रहे थे।
कमरे में बस हमारे शरीरों के टकराने की आवाज़ और मौसी की सिसकारियां गूँज रही थीं। ‘आह… आर्यन… और तेज़… मुझे बर्बाद कर दो,’ मौसी ने उत्तेजना में चिल्लाते हुए कहा। मैंने उनकी इच्छा का मान रखते हुए खुदाई की गति और बढ़ा दी। अब हम दोनों पसीने से तर-बतर थे, लेकिन रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। फिर मैंने उन्हें घुमाया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। इस स्थिति में मेरा खीरा और भी गहराई तक जा रहा था और मौसी अपने हाथों से बिस्तर की चादर को खींच रही थीं।
खुदाई की प्रक्रिया अब अपने अंत की ओर बढ़ रही थी। मौसी के शरीर में एक अजीब सी थरथराहट होने लगी, जो संकेत था कि उनका रस छूटने वाला है। मैंने भी अपनी पूरी ताकत लगा दी और कुछ ही क्षणों में हम दोनों का रस एक साथ निकल गया। मौसी की खाई मेरे गर्म रस से भर गई और वह बेदम होकर बिस्तर पर गिर पड़ीं। हम दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए थे, हमारी सांसें फूल रही थीं और शरीर में एक अद्भुत संतुष्टि का अहसास था।
कुछ देर बाद जब हमारी सांसें सामान्य हुईं, तो मौसी ने मेरे माथे को चूमा और धीरे से मुस्कुराईं। उनकी आँखों में अब कोई शर्म नहीं थी, बल्कि एक गहरा संतोष और प्यार था। उस रात की उस खुदाई ने हमारे रिश्ते को एक नई गहराई दे दी थी। हम दोनों जानते थे कि यह सिर्फ एक शारीरिक मिलन नहीं था, बल्कि दो रूहों का एक-दूसरे में समा जाना था। बाहर बारिश अब धीमी हो चुकी थी, लेकिन हमारे अंदर की आग ने एक मीठी याद की शक्ल ले ली थी।