राहुल और मीरा की शादी को अभी सिर्फ छह महीने ही हुए थे। मीरा की माँ, प्रिया, ४५ साल की थीं, लेकिन उनका यौवन अभी भी किसी जवान औरत की तरह चमकता था। प्रिया के पति के गुजर जाने के बाद वे घर में अकेली रहती थीं, लेकिन मीरा के घर में अक्सर आती-जाती रहती थीं। राहुल को प्रिया से पहली नजर में ही एक अजीब सा लगाव हो गया था। उनकी आँखों में एक गहरी उदासी थी, लेकिन साथ ही एक ऐसी मादकता जो राहुल को रातों में जगा रखती थी। प्रिया के भरे हुए तरबूज, पतली कमर और भारी पिछवाड़ा राहुल के सपनों में आकर उसे बेचैन कर देते थे। लेकिन वह कभी अपनी इस भावना को जाहिर नहीं करता था। वह सोचता था कि ये सिर्फ एक क्षणिक आकर्षण है, लेकिन दिन-ब-दिन ये भावना गहरी होती जा रही थी।
प्रिया भी राहुल को बहुत पसंद करती थीं। वह कहती थीं, “मीरा, तू कितनी भाग्यशाली है। राहुल जैसा दामाद मिलना किस्मत की बात है। वो इतना केयरिंग है।” लेकिन उनकी बातों में एक छुपी हुई उदासी होती थी। प्रिया के पति की मौत के बाद उन्होंने कभी किसी और मर्द को अपने करीब नहीं आने दिया था। लेकिन राहुल की केयर और उसकी गहरी आँखें उन्हें बार-बार सोचने पर मजबूर कर देती थीं। वे खुद से कहतीं, “ये क्या हो रहा है? वो मेरा दामाद है।”
एक शाम जब मीरा अपनी सहेली की शादी में चली गई, घर में सिर्फ राहुल और प्रिया ही रह गए। बाहर बारिश हो रही थी, और घर की लाइटें कमजोर हो गई थीं। प्रिया किचन में खाना बना रही थीं। राहुल अंदर आया और कहा, “सासू माँ, आज मीरा नहीं है, आप अकेले क्यों काम कर रही हैं? मैं मदद कर दूँ।”
प्रिया मुस्कुराईं, लेकिन उनकी मुस्कान में एक थकान थी। “नहीं बेटा, तुम आराम करो। मैं तो आदत हो गई हूँ अकेले रहने की।”
राहुल ने करीब आकर कहा, “सासू माँ, आप कभी अपनी थकान हमें क्यों नहीं बतातीं? हम तो आपके लिए हैं।”
प्रिया ने सब्जी काटते हुए कहा, “बेटा, जीवन में बहुत कुछ सहना पड़ता है। अकेलापन तो बस एक हिस्सा है।”
राहुल ने हिम्मत करके कहा, “लेकिन सासू माँ, आपकी आँखों में जो उदासी है, वो मुझे चुभती है। अगर मैं कुछ कर सकता हूँ, तो बताइए।”
प्रिया रुक गईं। उनकी आँखें नम हो गईं। “तुम अच्छे हो राहुल। मीरा भाग्यशाली है। लेकिन मेरी उदासी… वो पुरानी है।”
राहुल ने उनका हाथ पकड़ा। “सासू माँ, उदासी को अकेले सहने से बेहतर है किसी से बाँटना। मैं हूँ ना।”
प्रिया ने हाथ छुड़ाया नहीं। उनकी साँसें तेज हो गईं। “तुम्हारी बातें… मुझे अच्छी लगती हैं बेटा। लेकिन… ये ठीक नहीं।”
राहुल ने धीरे से कहा, “क्या ठीक नहीं सासू माँ? आपकी खुशी?”
प्रिया ने नजरें झुका लीं। “मैं… मैं सास हूँ।”
राहुल ने कहा, “लेकिन इंसान भी तो हैं। आपकी प्यास… वो आँखों में दिखती है।”
प्रिया का चेहरा लाल हो गया। “प्यास? कैसी प्यास?”
राहुल ने फुसफुसाया, “वही प्यास जो बरसों से दबी है। मैं देखता हूँ सासू माँ, आप कैसे अकेले रातें काटती हैं।”
प्रिया काँप उठीं। “राहुल… ये गलत है। मीरा…”
राहुल ने कहा, “मीरा को कुछ पता नहीं चलेगा। ये बस हमारा राज़ रहेगा।”
प्रिया ने कुछ नहीं कहा। राहुल ने उनका चेहरा ऊपर उठाया और धीरे से उनके होंठों को चूम लिया। प्रिया ने आँखें बंद कर लीं। चुंबन गहरा होता गया। प्रिया की साँसें भारी हो गईं। “राहुल… मत करो… मैं… मैं कमजोर हूँ।”
राहुल ने कहा, “सासू माँ, आपकी कमजोरी मेरी ताकत है। आज मैं आपको वो सुख दूँगा जो आपने सपनों में भी नहीं सोचा।”
प्रिया ने सर झुका लिया। राहुल ने उन्हें बाहों में भर लिया। प्रिया की साड़ी का पल्लू सरक गया। उनके तरबूज ब्लाउज में उभरे हुए थे। राहुल ने ब्लाउज के हुक खोले। तरबूज बाहर आ गए – बड़े, गोल, गोरे, मटर सख्त। राहुल ने एक तरबूज को हाथ में लिया, दबाया। “सासू माँ… कितने नरम हैं ये… कितने गरम।”
प्रिया ने आह भरी, “राहुल… धीरे… मैं… मैं शरमा रही हूँ।”
राहुल ने मटर को जीभ से चाटा। “शर्माइए मत सासू माँ। आज रात हमारी है।”
प्रिया काँप रही थीं। राहुल ने साड़ी पूरी खोल दी। प्रिया अब सिर्फ पैंटी में थीं। राहुल ने पैंटी सरकाई। खाई नंगी हो गई – हल्के बालों से घिरी, गुलाबी, भीगी हुई। राहुल ने जीभ से खाई चाटी। प्रिया चीखीं, “आह… राहुल… ये क्या कर रहे हो… मैं… मैं मर जाऊँगी…”
राहुल ने कहा, “सासू माँ, ये प्यास बुझाने का तरीका है।”
प्रिया का रस निकल आया। वे कराह रही थीं, “राहुल… अब… अब और मत तड़पाओ… मुझे… मुझे अपना बना लो।”
राहुल ने अपना खीरा निकाला। प्रिया ने देखा, “इतना बड़ा… इतना सख्त…”
राहुल ने कहा, “सासू माँ, ये आपके लिए है।”
प्रिया ने खीरा मुंह में लिया, चूसा। “आह… कितना गरम है… राहुल… मुझे खोदो…”
राहुल ने खीरा खाई में डाला। प्रिया चीखीं, “आह… पूरा… हाँ… खोदो मुझे… मेरी खाई को भर दो…”
राहुल ने धीरे-धीरे खोदा। “सासू माँ… कितनी तंग है आपकी खाई…”
प्रिया बोलीं, “राहुल… तेज… और तेज… मुझे अपनी र@#ड़ी बना लो… खोदो मुझे… आह…”
वे कई बार रस निकालती रहीं। राहुल ने पोजीशन बदली, पिछवाड़े से खोदा। प्रिया चीखीं, “हाँ… मेरी पिछवाड़ा भी खोदो… सब तुम्हारा है…”
आखिर में राहुल का रस निकला। प्रिया बोलीं, “अंदर… सब अंदर… मुझे अपना बच्चा दे दो…”
दोनों थककर लेट गए। प्रिया बोलीं, “राहुल… ये पाप है… लेकिन कितना सुकून है।”
राहुल ने कहा, “सासू माँ, ये प्यार है।”
रात भर वे जुड़े रहे। सुबह प्रिया मुस्कुराईं, “ये राज़ हमारा रहेगा। लेकिन जब भी तन्हाई सताए… आ जाना।”