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सुहानी की यादों की खुदाई

बरसों बाद जब मैं अपने पुश्तैनी गाँव की उन पगडंडियों पर वापस लौटा, तो मिट्टी की वह सोंधी खुशबू आज भी वैसी ही थी, जैसे मेरे बचपन के दिनों में हुआ करती थी। पुरानी हवेली के आँगन में खड़ा मैं अतीत के झरोखों में झाँक ही रहा था कि तभी मेरी नज़र पड़ोस के बगीचे में खड़ी सुहानी पर पड़ी। वह अब वह छोटी सी चुलबुली लड़की नहीं रही थी, बल्कि एक पूर्ण और अत्यंत आकर्षक स्त्री के रूप में ढल चुकी थी। उसके चेहरे पर वही पुरानी मासूमियत थी, लेकिन आँखों में अब एक गहरा समंदर सा ठहराव आ गया था, जो किसी को भी अपने भीतर समेट लेने की शक्ति रखता था।

सुहानी ने गहरे नीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी, जिसके साथ उसने एक गहरे गले का ब्लाउज धारण किया था, जो उसकी सुडौल देह पर पूरी तरह से फबता था। साड़ी का पल्लू हवा के झोंकों के साथ बार-बार उसके कंधे से फिसल रहा था, जिसे वह अपनी कोमल उंगलियों से संभालती तो उसकी पतली कमर का घेरा साफ नज़र आता। उसके शरीर का ढांचा किसी तराशी हुई मूरत की तरह था, जहाँ हर घुमाव और हर ढलान में एक अजीब सा सम्मोहन था। उसकी गर्दन की सुराहीदार बनावट और कानों में झूलते झुमके उसके आकर्षण में चार चाँद लगा रहे थे, जिसे देखकर मेरे दिल की धड़कनें एकाएक तेज होने लगी थीं।

हम दोनों एक-दूसरे के करीब आए, तो यादों का कारवां जैसे ठहर सा गया और बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो वह पुराने दिनों की गलियों में खो गया। सुहानी की आवाज़ में एक ऐसी खनक और गहराई थी, जो सीधे रूह को छू जाती थी और हर शब्द जैसे एक संगीत की तरह कानों में रस घोल रहा था। हमने घंटों बैठकर पुरानी शरारतों, उन कच्चे आमों की चोरी और स्कूल के दिनों की बातों को फिर से जीवित किया, जिससे हमारे बीच एक अटूट भावनात्मक जुड़ाव महसूस होने लगा। उसकी बातों में जो अपनापन और गर्मजोशी थी, उसने बरसों की उस दूरी को पल भर में मिटा दिया और हम फिर से वही दो जिस्म एक जान महसूस करने लगे।

बातों-बातों में शाम ढल गई और आसमान में काले बादलों ने डेरा जमा लिया, तभी अचानक बारिश की बूंदें ज़मीन को चूमने लगीं और हम दोनों बरामदे के भीतर चले आए। ठंडी हवा के झोंकों ने सुहानी के बदन में एक सिहरन पैदा कर दी, जिससे उसने अपने हाथों को अपनी बांहों पर लपेट लिया और उसकी आँखें मेरी आँखों से टकराईं। उस एक पल में, हमारे बीच की झिझक जैसे धुएं की तरह हवा में विलीन हो गई और आकर्षण का एक नया ज्वार हमारे भीतर उठने लगा। मैंने देखा कि उसकी साँसों की गति तेज़ हो गई है और उसके होठों पर एक हल्की सी कंपकंपी है, जो बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह रही थी।

जैसे ही बिजली कड़की, सुहानी अनजाने में ही मेरे करीब आ गई और मेरा हाथ उसकी रेशमी कलाई पर पड़ गया, वह पहला स्पर्श बिजली के करंट जैसा था। उसकी त्वचा की कोमलता और गर्माहट ने मेरे भीतर सोई हुई तमाम इच्छाओं को एक साथ जगा दिया और मैंने महसूस किया कि वह भी उस स्पर्श से अछूती नहीं रही थी। मेरी उंगलियां धीरे-धीरे उसकी कलाई से होती हुई उसकी बांहों तक पहुँचीं, जिससे उसके रोंगटे खड़े हो गए और उसने अपनी आँखें मूँद लीं। उस स्पर्श में एक पवित्रता थी, लेकिन साथ ही एक गहरी प्यास भी थी, जो बरसों से शांत पड़ी थी और अब फूटने को बेताब थी।

मैंने अपनी दूसरी हथेली उसकी कमर के उस हिस्से पर रखी जहाँ साड़ी का रेशमी स्पर्श खत्म होकर उसकी नग्न त्वचा शुरू होती थी। वह मेरी छुअन से कांप उठी और एक दबी हुई आह उसके गले से निकली, जिसने मेरे भीतर की बेचैनी को और बढ़ा दिया। सुहानी ने अपना सर मेरे सीने पर टिका दिया और हम दोनों की धड़कनें एक-दूसरे से मुकाबला करने लगीं, जैसे वे कोई अनकही दास्ताँ सुना रही हों। उसकी साँसों की खुशबू मेरे रोम-रोम में बसने लगी और उस नज़दीकी ने हमें दुनिया के बाकी तमाम शोर से पूरी तरह अलग कर दिया।

धीरे-धीरे हमारी दूरियां पूरी तरह समाप्त हो गईं और सुहानी ने अपनी बाहें मेरे गले में डाल दीं, जिससे उसका पूरा बदन मेरे शरीर से सट गया। उसके जिस्म की हरारत और उसकी खुशबू ने मुझे मदहोश कर दिया था, और मैंने महसूस किया कि उसके हृदय की गति और भी तीव्र हो गई है। हमारी साँसें आपस में उलझ रही थीं और हम दोनों एक-दूसरे की बाहों में इस कदर समा गए थे जैसे बरसों के बिछड़े हुए प्रेमी अपनी मंज़िल पा चुके हों। उसकी पलकों की झपक और उसके होठों की नमी ने इस पल को और भी अधिक कामुक और भावुक बना दिया था, जहाँ सिर्फ मौन की भाषा ही प्रभावी थी।

प्रेम की इस पराकाष्ठा में, हर स्पर्श एक नई कहानी लिख रहा था और हर सिसकी एक नए समर्पण का गवाह बन रही थी। सुहानी के शरीर से निकलता हुआ पसीना और उसकी आँखों की चमक यह बता रही थी कि वह इस घनिष्ठता में पूरी तरह डूब चुकी है। हमने एक-दूसरे के वजूद को इस तरह महसूस किया जैसे कोई मूर्तिकार अपनी रचना को अंतिम रूप दे रहा हो, जहाँ हर अंग और हर भावना का मिलन अनिवार्य था। उस रात की तन्हाई में, हमारी मोहब्बत ने वह मुकाम हासिल किया जहाँ शरीर और आत्मा के बीच का अंतर पूरी तरह मिट गया और सिर्फ प्रेम ही शेष रह गया।

पूरी तरह से एक होने के बाद, जब हम एक-दूसरे के आगोश में शांत पड़े थे, तो मन में एक अद्भुत शांति और तृप्ति का अहसास था। सुहानी की आँखों में अब एक नई चमक थी, जो हमारे इस मिलन की गवाह थी और उसके चेहरे पर छाई वह हल्की सी शर्म और मुस्कान मेरे दिल को जीत रही थी। हमने एक-दूसरे का हाथ थामे रखा और बाहर गिरती बारिश की आवाज़ सुनते रहे, मानो कुदरत भी हमारे इस मिलन पर अपनी मोहर लगा रही हो। उस पल में हमें अहसास हुआ कि यह सिर्फ एक शारीरिक मिलन नहीं था, बल्कि दो रूहों का एक-दूसरे में विलीन हो जाना था जो जन्मों का बंधन बन चुका था।

जब वह सुबह हुई, तो सूरज की पहली किरण ने सुहानी के चेहरे को सहलाया और वह मेरी बाहों में और भी सिमट गई, जैसे वह इस सुखद अहसास को कभी छोड़ना नहीं चाहती थी। हमारी आँखों में एक-दूसरे के लिए सम्मान और भी बढ़ गया था, क्योंकि हमने उस रात सिर्फ शरीर की खुदाई नहीं की थी, बल्कि प्रेम की उन गहराइयों को खोजा था जहाँ तक पहुँचना हर किसी के बस की बात नहीं। वह अनुभव हमारे जीवन का सबसे सुंदर अध्याय बन गया था, जिसे हम ताउम्र अपनी यादों के संदूक में महफूज़ रखने वाले थे।

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