पुरानी यादों की छाँव में बगीचे की रसीली खुदाई—>
शहर के उस शोर-शराबे से दूर, वनस्पति उद्यान के सबसे आखिरी और घने कोने में जहाँ बरगद की विशाल जटाएँ जमीन को चूम रही थीं, समीर और नेहा एक दूसरे के बहुत करीब बैठे थे। दस साल बाद जब वे मिले थे, तो उनके बीच की वह पुरानी कॉलेज वाली झिझक अब एक भारी और गहरी वासना में बदल चुकी थी। नेहा ने आज गहरे नीले रंग की साड़ी पहनी थी, जिसमें से उसका गठा हुआ शरीर और उसकी कमर की गोलाई समीर की धड़कनों को बेकाबू कर रही थी। समीर ने देखा कि नेहा की साँसें तेज चल रही थीं, जिससे उसकी रेशमी चोली के अंदर दबे उसके भारी और गोल-मटोल तरबूज ऊपर-नीचे हो रहे थे। हवा में मोगरे की खुशबू और उन दोनों के शरीरों की बढ़ती गर्मी एक अजीब सा नशा घोल रही थी, जहाँ शब्दों से ज्यादा उनकी खामोश निगाहें एक-दूसरे से बहुत कुछ कह रही थीं और एक अनकहे समझौते की ओर बढ़ रही थीं।
समीर ने अपनी हिम्मत जुटाई और धीरे से अपना हाथ नेहा की नंगी कमर पर रखा, जहाँ की कोमल त्वचा किसी रेशम के अहसास से कम नहीं थी। नेहा के शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई और उसने अपनी आँखें मूँद लीं, जैसे वह बरसों से इसी स्पर्श का इंतजार कर रही हो। समीर के हाथों ने धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ना शुरू किया और उसकी उँगलियाँ नेहा की चोली के हुक तक जा पहुँचीं। जैसे ही उसने पहला हुक खोला, नेहा के भारी तरबूज अपनी कैद से आजाद होने के लिए मचलने लगे। समीर ने नेहा के चेहरे की ओर देखा, जहाँ लाज और बेपनाह चाहत का संगम था। उसने धीरे से चोली को खिसकाया और नेहा के उन गोरे और विशाल तरबूजों को बाहर निकाला, जिनकी चोटियों पर लगे गुलाबी मटर ठंड और उत्तेजना के कारण पत्थर की तरह सख्त हो चुके थे। समीर की आँखें उन मटरों की खूबसूरती को देख कर फटी की फटी रह गईं।
नेहा ने एक सिसकी भरी और समीर के बालों में अपनी उँगलियाँ फँसा दीं, जैसे वह उसे अपने और करीब खींचना चाहती हो। समीर अब खुद को रोक नहीं पा रहा था; उसने अपना सिर झुकाया और नेहा के एक तरबूज को अपने हाथों में भरकर उसके गुलाबी मटर को अपने होंठों के बीच ले लिया। नेहा के मुँह से एक आह निकली और उसका पूरा शरीर काँप उठा। समीर ने बड़े प्यार से उन मटरों को सहलाया और नेहा के तरबूजों के बीच अपनी जीभ घुमाने लगा। नेहा की सिसकियाँ अब गहरी होती जा रही थीं और उसने समीर की टी-शर्ट उतार दी। समीर का मजबूत सीना नेहा के कोमल अंगों से टकराया, तो दोनों के बीच जैसे कोई ज्वालामुखी फट पड़ा। समीर ने अब नेहा की साड़ी के पल्लू को पूरी तरह हटा दिया और उसकी कमर के नीचे हाथ ले गया, जहाँ उसकी उँगलियाँ नेहा की रेशमी पेटीकोट के अंदर सरकने लगीं।
समीर की उँगलियाँ अब नेहा की उस गहरी और गीली खाई की ओर बढ़ रही थीं, जो अब पूरी तरह से रस छोड़ने लगी थी। जैसे ही समीर ने अपनी एक उंगली नेहा की खाई के द्वार पर छुआई, नेहा ने अपनी कमर ऊपर उठा दी और समीर के खीरे को महसूस करने के लिए छटपटाने लगी। समीर ने महसूस किया कि नेहा की खाई के आसपास के बाल अब पसीने से भीग चुके थे और वहाँ से एक मदहोश कर देने वाली प्राकृतिक गंध आ रही थी। उसने अपनी दो उँगलियाँ धीरे से उस गहरी खाई के अंदर डाल दीं और धीरे-धीरे उन्हें बाहर-अंदर करने लगा। नेहा अब पूरी तरह से होश खो चुकी थी, उसके मुँह से बस ‘समीर… और तेज… ओह समीर’ के शब्द निकल रहे थे। समीर ने देखा कि नेहा की खाई अब पूरी तरह से चिकनी और रसीली हो चुकी थी, जो उसके खीरे का स्वागत करने के लिए पूरी तरह तैयार थी।
अब सब्र का बांध टूट चुका था, समीर ने अपनी पेंट उतारी और उसका गरमा-गरम और सख्त खीरा पूरी शान से बाहर निकल आया। नेहा ने जब उस विशाल और कड़क खीरे को देखा, तो उसकी आँखें फैल गईं और उसने अपनी उँगलियों से उसकी लंबाई को नापा। उसने धीरे से समीर के खीरे को अपने मुँह में लिया और उसे चूसने लगी, जैसे वह दुनिया का सबसे स्वादिष्ट फल हो। समीर के मुँह से एक कराह निकली और उसने नेहा के सिर को पकड़ कर उसे और गहराई से खीरा चूसने में मदद की। करीब दस मिनट तक खीरा चूसने के बाद, समीर ने नेहा को घास पर लिटाया और उसकी टांगों को अपने कंधों पर रख लिया। उसने अपने खीरे की टोपी को नेहा की रसीली खाई के मुहाने पर रखा और एक ही झटके में आधे से ज्यादा खीरा उस गहरी खाई के अंदर उतार दिया।
नेहा के गले से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि चरम सुख की थी। समीर ने अब सामने से खोदना शुरू किया, उसके हर धक्के के साथ नेहा के भारी तरबूज हवा में उछल रहे थे और उनके आपस में टकराने की आवाज उस सुनसान पार्क में गूँज रही थी। समीर ने अपनी गति बढ़ाई और पूरी ताकत से नेहा की खाई की गहराई को नापने लगा। ‘आह समीर… तुम बहुत अच्छा खोद रहे हो… मुझे पूरा भर दो!’ नेहा ने चिल्लाते हुए कहा। समीर ने अब नेहा को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने की स्थिति में ला दिया। उसने पीछे से नेहा की कमर पकड़ी और अपने खीरे को फिर से उसकी गीली खाई में घुसा दिया। इस स्थिति में समीर का खीरा नेहा की खाई की हर दीवार को छू रहा था, जिससे नेहा पागलों की तरह अपना पिछवाड़ा हिलाने लगी और समीर को और गहरा धक्का मारने के लिए उकसाने लगी।
खुदाई अब अपने चरम पर थी, दोनों के शरीर पसीने से लथपथ थे और उनकी साँसें मानो थम सी गई थीं। समीर ने नेहा के तरबूजों को पीछे से पकड़ कर जोर-जोर से मसलना शुरू किया और अपनी खुदाई की गति को दोगुना कर दिया। नेहा का शरीर अब थरथराने लगा था, उसकी खाई से रस अब धाराओं की तरह बह रहा था। ‘समीर… मेरा रस निकलने वाला है… मैं अब और नहीं सह सकती!’ नेहा ने चिल्लाते हुए कहा। समीर ने भी महसूस किया कि उसका खीरा अब फटने को तैयार है। उसने अंतिम कुछ जोरदार धक्के मारे और नेहा की खाई की गहराई में अपना सारा गरम रस छोड़ दिया। उसी पल नेहा का भी रस निकल गया और वह बेदम होकर घास पर गिर पड़ी। दोनों कई मिनटों तक एक-दूसरे से लिपटे रहे, उनके दिलों की धड़कनें अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। उस दिन उस पुराने पार्क ने एक बार फिर दो रूहों के मिलन और उनकी रसीली खुदाई की कहानी को अपने भीतर समेट लिया।