कॉलेज की अधूरी हसरत और वह सुनसान पार्क—>शहर के शोर-शराबे से दूर उस पुराने और घने बोटैनिकल गार्डन के एक सुनसान कोने में समीर और मेघा आज दस साल बाद मिल रहे थे। समीर की नजरें मेघा पर टिकी थीं, जो अब पहले से कहीं ज्यादा परिपक्व और मादक लग रही थी। नीले रंग की सिल्क साड़ी में लिपटी मेघा के शरीर के उभार समीर की धड़कनें बढ़ा रहे थे। दोपहर की चिलचिलाती धूप में पेड़ों की घनी छांव के नीचे दोनों एक बेंच पर बैठे थे, जहां इंसानों की आवाजाही न के बराबर थी। हवा में एक अजीब सी खामोशी और पुरानी यादों की महक घुली हुई थी, जिसने दोनों के दिलों में दबी हुई हसरतों को फिर से जगा दिया था।
मेघा की कद-काठी अब पहले से ज्यादा सुडौल और आकर्षक हो गई थी। साड़ी के ब्लाउज से झांकते उसके दो बड़े और रसीले तरबूज किसी का भी मन डगमगाने के लिए काफी थे। जब वह गहरी सांस लेती, तो उसके तरबूज ऊपर-नीचे होते और समीर की आंखों में एक प्यास जगा देते। उसके चलने का अंदाज, उसके भारी पिछवाड़े का मटकना और उसकी गहरी काली आंखें समीर को मदहोश कर रही थीं। समीर ने गौर किया कि मेघा की साड़ी का पल्लू बार-बार खिसक रहा था, जिससे उसके गोरे बदन की चमक और उसके तरबूजों की गहरी खाई साफ नजर आ रही थी।
बातों-बातों में पुराने दिनों की यादें ताजा होने लगीं। समीर ने धीरे से मेघा का हाथ अपने हाथ में लिया और उसकी कोमल उंगलियों को सहलाने लगा। मेघा ने अपना हाथ खींचा नहीं, बल्कि उसने अपनी नजरें झुका लीं और उसके गालों पर शर्म की सुर्खी दौड़ गई। ‘तुम्हें पता है समीर, उस वक्त मैं कह नहीं पाई थी, लेकिन मेरे दिल में हमेशा तुम्हारे लिए जगह थी,’ मेघा ने धीमी आवाज में कहा। समीर ने महसूस किया कि उनके बीच का भावनात्मक जुड़ाव अब एक शारीरिक आकर्षण में तब्दील हो रहा था। उन दोनों के बीच एक अनकहा सा वादा था, जो अब पूरा होने की कगार पर था।
आकर्षण की उस तीव्र लहर ने दोनों को एक-दूसरे के और करीब ला दिया। समीर ने अपना हाथ मेघा की कमर पर रखा और उसे धीरे से अपनी ओर खींचा। मेघा के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई, लेकिन उसने कोई विरोध नहीं किया। उसके मन में एक तरफ शर्म और समाज का डर था, तो दूसरी तरफ बरसों की दबी हुई इच्छाएं हिलोरे मार रही थीं। समीर की सांसें अब मेघा के कानों के पास गरम महसूस हो रही थीं, जिससे उसके रोंगटे खड़े हो रहे थे। द्वंद्व और झिझक के बीच आखिरकार प्रेम और वासना की जीत हुई और मेघा ने अपना सिर समीर के कंधे पर रख दिया।
समीर का पहला स्पर्श जादुई था। उसने अपनी उंगलियों से मेघा के चेहरे के बालों को हटाया और उसके होंठों की ओर झुका। जैसे ही उनके होंठ मिले, सारा संसार थम सा गया। समीर का हाथ धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ा और उसने मेघा के एक रसीले तरबूज को हल्के से दबाया। मेघा के मुंह से एक धीमी कराह निकली। समीर ने अपनी उंगलियों से उसके तरबूज के ऊपर उभरे हुए छोटे मटर को सहलाया, जो उत्तेजना के मारे अब सख्त हो चुके थे। साड़ी और ब्लाउज की बाधा अब दोनों को खल रही थी और वे एक ऐसी जगह की तलाश करने लगे जहां कोई उन्हें देख न सके।
पेड़ों के पीछे एक गहरी झाड़ी और नर्म घास की जगह पाकर समीर ने मेघा को वहां लिटा दिया। धीरे-धीरे समीर ने उसके कपड़े उतारने शुरू किए। जब मेघा पूरी तरह से निर्वस्त्र हुई, तो समीर उसे देखता ही रह गया। उसके बड़े-बड़े तरबूज, पतली कमर और उसके नीचे बालों से ढकी हुई वह गहरी और नम खाई। समीर ने अपनी जीभ से उसकी खाई चाटना शुरू किया, जिससे मेघा पागलों की तरह तड़पने लगी। उसने समीर का सिर कसकर अपने साथ चिपका लिया। वहीं समीर का अपना लंबा और सख्त खीरा अब पूरी तरह से आजाद होने के लिए बेताब था, जो उसकी पैंट के अंदर फन मार रहा था।
समीर ने अपना खीरा बाहर निकाला और उसे मेघा के हाथ में दे दिया। मेघा ने बड़े चाव से उस खीरा को अपने मुंह में लिया और उसे चूसने लगी। समीर की आंखों में आनंद के आंसू आने लगे। अब समय आ गया था पूरी तरह से एक होने का। समीर ने मेघा की दोनों टांगें ऊपर उठाईं और अपने खीरे की नोक को उसकी गीली खाई के द्वार पर रखा। एक झटके के साथ समीर ने अपना खीरा खाई के अंदर धकेल दिया। मेघा के मुंह से एक तीखी चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं, बल्कि अपार सुख की थी। समीर ने अब सामने से खोदना शुरू किया, हर धक्का गहरा और दमदार था।
खुदाई की प्रक्रिया अब अपनी चरम सीमा पर पहुंच रही थी। समीर ने मेघा को पलटा और उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। ‘ओह समीर, और जोर से… मुझे पूरी तरह से भर दो,’ मेघा सिसकते हुए बोल रही थी। पार्क की उस खामोशी में केवल उनके शरीरों के टकराने की आवाज और उनकी भारी सांसें सुनाई दे रही थीं। समीर की गति अब और तेज हो गई थी, वह बार-बार अपने खीरे को पूरी गहराई तक डाल रहा था। मेघा की खाई अब पूरी तरह से रस से लबालब हो चुकी थी। तभी एक जोरदार झटके के साथ समीर के खीरे से गरम रस निकलना शुरू हुआ और मेघा के अंदर समा गया, जिससे मेघा भी पूरी तरह से तृप्त होकर कांप उठी।
उस गहरी खुदाई के बाद दोनों पसीने से लथपथ एक-दूसरे की बाहों में घास पर लेटे हुए थे। मेघा की हालत ऐसी थी कि वह हिल भी नहीं पा रही थी, उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर संतुष्टि का भाव था। समीर ने उसे प्यार से चूमा और उसके बिखरे हुए बालों को सहलाया। उस सुनसान पार्क में हुई इस अधूरी हसरत की पूर्ति ने उनके दिलों के बोझ को हल्का कर दिया था। वे जानते थे कि यह पल हमेशा के लिए उनकी यादों में दर्ज हो गया है, एक ऐसा एहसास जिसे वे चाहकर भी कभी भुला नहीं पाएंगे।