जवान चाची की चु@@ई —> दोपहर का वह सन्नाटा आज कुछ ज्यादा ही गहरा लग रहा था, जैसे घर की दीवारें भी किसी अनकही इच्छा के बोझ तले दबी हुई हों। बाहर सूरज की तपिश अपनी चरम सीमा पर थी, लेकिन घर के भीतर कूलर की ठंडी हवा एक अजीब सी सिहरन पैदा कर रही थी। मेरी चाची, नेहा, जिनकी उम्र मुश्किल से अट्ठाइस साल रही होगी, सोफे पर बड़े ही बेतकल्लुफ अंदाज में लेटी हुई थीं। उन्होंने हल्के नीले रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी थी, जो उनके गोरे और सुडौल बदन पर पानी की तरह चिपकी हुई थी। उनकी साड़ी का पल्लू कंधे से सरक कर नीचे गिर गया था, जिससे उनके विशाल और तने हुए तरबूज आधे से ज्यादा बाहर झांक रहे थे। उन रसीले तरबूजों की गोलाई देखकर मेरी धड़कनें बेकाबू होने लगी थीं और मेरी नजरें बार-बार वहीं जाकर टिक जाती थीं।
नेहा चाची का शरीर किसी कसी हुई वीणा की तरह था, जिसकी हर लय में एक मादकता छिपी थी। उनके तरबूजों के बीच की जो गहरी घाटी बन रही थी, वह इतनी सम्मोहक थी कि मुझे उसमें डूब जाने की तीव्र इच्छा होने लगी। उनके तरबूजों के ऊपर के दो छोटे-छोटे मटर साड़ी के पतले कपड़े के ऊपर से ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे, जो ठंडक या शायद किसी अनजानी उत्तेजना की वजह से सख्त हो चुके थे। जब वह सांस लेती थीं, तो उनके वे तरबूज एक अजीब सी लय में थिरकते थे, जिससे मेरा ध्यान अपनी पढ़ाई से हटकर पूरी तरह उन पर केंद्रित हो गया था। उनके कमर की पतली गोलाई और नीचे का चौड़ा पिछवाड़ा उस सोफे पर इस तरह फैला था कि कोई भी पुरुष अपनी सुध-बुध खो दे।
हम दोनों के बीच हमेशा से एक दोस्ताना रिश्ता रहा था, लेकिन आज उस रिश्ते में एक अजीब सी गर्माहट महसूस हो रही थी। नेहा चाची ने मेरी तरफ देखते हुए शरारत भरी मुस्कान दी और बोलीं, ‘आर्यन, तुम वहां खड़े-खड़े मुझे ऐसे क्यों देख रहे हो जैसे पहली बार देख रहे हो? क्या आज मैं कुछ ज्यादा ही सुंदर लग रही हूं?’ उनकी आवाज में एक नशीली खनक थी जिसने मेरे भीतर के सोए हुए अरमानों को जगा दिया। मैंने हिम्मत जुटाकर कहा, ‘चाची, आप हमेशा ही सुंदर लगती हैं, लेकिन आज इस नीली साड़ी में आप किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही हैं।’ मेरी बात सुनकर उनके गालों पर हल्की सी लाली छा गई, जो उनकी खूबसूरती में चार चांद लगा रही थी।
वह धीरे से उठकर बैठीं, जिससे उनके तरबूज थोड़े और उछले, और उन्होंने मुझे अपने पास बैठने का इशारा किया। जैसे ही मैं उनके पास बैठा, उनके बदन से आने वाली मोगरे की धीमी खुशबू ने मुझे मदहोश करना शुरू कर दिया। हमारा स्पर्श पहली बार तब हुआ जब उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। वह स्पर्श बिजली के झटके जैसा था, जिससे मेरा खीरा अचानक अपनी जगह पर अंगड़ाई लेने लगा। मेरे मन में एक तरफ तो चाची के प्रति सम्मान था और दूसरी तरफ उस दहकते हुए यौवन को छूने की तीव्र तड़प। हम दोनों के बीच का मौन अब शब्दों से ज्यादा भारी हो गया था, और हमारी आंखों में छिपी वासना की आग अब और ज्यादा देर तक दबाई नहीं जा सकती थी।
उन्होंने अपनी उंगलियां मेरे बालों में घुमाना शुरू किया, जिससे मेरे पूरे शरीर में एक लहर सी दौड़ गई। मेरा खीरा अब पूरी तरह से सख्त होकर मेरी पैंट के भीतर छटपटाने लगा था। नेहा चाची की नजरें नीचे मेरे उभरे हुए हिस्से पर पड़ीं, और उन्होंने अपनी पलकें झुका लीं, लेकिन उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान अभी भी तैर रही थी। उन्होंने धीरे से फुसफुसाते हुए कहा, ‘आर्यन, तुम बहुत बड़े हो गए हो, तुम्हारी पसंद और तुम्हारी जरूरतें अब बदल गई हैं।’ यह सुनते ही मेरी सारी झिझक खत्म हो गई और मैंने अपना हाथ उनके नरम और रेशमी तरबूजों पर रख दिया।
जैसे ही मेरा हाथ उनके तरबूजों पर पड़ा, चाची के मुंह से एक दबी हुई आह निकली। उनके वे तरबूज हाथ में आते ही इतने मुलायम और गर्म महसूस हुए कि मुझे लगा जैसे मैं किसी बादलों के टुकड़े को छू रहा हूं। मैंने धीरे-धीरे उन्हें सहलाना और दबाना शुरू किया, जिससे चाची की सांसें तेज हो गईं। उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं और अपना सिर पीछे की ओर झुका लिया। मैंने अपनी उंगलियों से उनके मटरों को हल्के से मसला, जिससे वह और भी ज्यादा सख्त हो गए। अब वह पूरी तरह से कामुकता के सागर में गोते लगा रही थीं और मुझे अपनी ओर और जोर से खींचने लगी थीं।
धीरे-धीरे मेरा हाथ उनकी कमर से होता हुआ उनके भारी पिछवाड़े तक पहुंच गया। वह पिछवाड़ा इतना मांसल और गद्देदार था कि उसे मुट्ठी में भरते ही मुझे एक असीम आनंद की अनुभूति हुई। चाची ने अब खुद ही अपनी साड़ी का पल्लू पूरी तरह हटा दिया और अपने ब्लाउज के हुक खोलने लगीं। जैसे ही उनका ब्लाउज खुला, उनके वे दूध जैसे सफेद और विशाल तरबूज पूरी तरह आजाद हो गए। उनके मटर गुलाबी और तने हुए थे, जो अब मेरे स्पर्श का इंतजार कर रहे थे। मैंने झुककर अपनी जीभ से उनके मटरों को सहलाया और फिर बारी-बारी से उन तरबूजों का रस पीने लगा।
चाची की आहें अब और तेज हो गई थीं। उन्होंने अपना हाथ मेरी पैंट के ऊपर रखा और मेरे सख्त खीरे को सहलाने लगीं। उन्होंने मेरी पैंट की जिप खोली और मेरे खीरे को बाहर निकाला। मेरा खीरा अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ उनके सामने खड़ा था। उन्होंने बड़े ही प्यार से उसे अपने हाथों में लिया और उसे सहलाते हुए अपनी आंखों से चूम लिया। फिर उन्होंने अपनी गर्दन झुकाई और मेरे खीरे को अपने मुंह में भर लिया। उनके गर्म मुंह के भीतर अपने खीरे को पाकर मुझे ऐसा लगा जैसे मैं स्वर्ग के द्वार पर पहुंच गया हूं। वह बड़े ही कौशल से खीरा चूस रही थीं, जिससे मेरा सारा शरीर थरथराने लगा था।
जब उनकी और मेरी उत्तेजना अपनी चरम सीमा पर पहुंच गई, तो मैंने उन्हें सोफे पर ही लिटा दिया। मैंने उनकी साड़ी और पेटीकोट पूरी तरह से उतार दिए, जिससे उनकी रेशमी और गहरी खाई मेरे सामने उजागर हो गई। उनकी उस खाई के पास घने काले बाल थे, जो उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। मैंने अपनी उंगलियों को उस खाई के गीलेपन में भिगोया और धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया। चाची अपनी कमर ऊपर उठा-उठा कर मेरा साथ दे रही थीं। उनकी खाई अब पूरी तरह से शहद छोड़ रही थी, जो खुदाई के लिए एकदम तैयार थी।
मैंने अपने खीरे की नोक को उनकी गीली खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से धक्का दिया। चाची ने एक दर्द और मजे से भरी आह भरी और मेरे कंधों को मजबूती से पकड़ लिया। जैसे-जैसे मेरा खीरा उनकी तंग खाई के भीतर समा रहा था, मुझे उनकी मांसपेशियों का कसाव और गर्मी महसूस हो रही थी। मैंने सामने से खोदना शुरू किया, हर धक्के के साथ मेरा खीरा उनकी खाई की गहराई तक पहुंच रहा था। हम दोनों के शरीर पसीने से लथपथ थे और कमरे में सिर्फ हमारे अंगों के टकराने की आवाजें गूंज रही थीं। चाची जोर-जोर से मेरा नाम पुकार रही थीं और मुझे और गहराई तक जाने के लिए कह रही थीं।
कुछ देर सामने से खोदने के बाद, मैंने उन्हें पलट दिया और उनके भारी पिछवाड़े को ऊपर उठाकर पीछे से खोदना शुरू किया। यह स्थिति और भी ज्यादा उत्तेजक थी क्योंकि उनके तरबूज नीचे लटक रहे थे और मैं उन्हें पीछे से पकड़कर झटके दे रहा था। मेरा खीरा उनकी खाई के भीतर पूरी तरह समा चुका था और हर प्रहार के साथ उन्हें चरम सुख की ओर ले जा रहा था। चाची की सिसकियां अब चीखों में बदलने लगी थीं। खुदाई की यह प्रक्रिया इतनी दमदार थी कि हम दोनों ही अपने होश खो चुके थे। अंत में, हम दोनों का रस एक साथ छूटा, और मैं उनके ऊपर ही ढेर हो गया।
खुदाई के बाद हम दोनों काफी देर तक एक-दूसरे की बाहों में बंधे रहे। चाची के चेहरे पर एक गजब का सुकून और तृप्ति थी। उनके बिखरे हुए बाल और पसीने से भीगा शरीर उनकी कामुकता को और बढ़ा रहा था। वह मेरे सीने पर सिर रखकर धीरे-से मुस्कुराईं और बोलीं, ‘आर्यन, आज तुमने मुझे सचमुच एक औरत होने का एहसास करा दिया।’ उनकी उस हालत को देखकर मेरा दिल भर आया और मैंने उनके माथे को चूम लिया। वह दोपहर हमारे लिए हमेशा के लिए यादगार बन गई थी, जहां हमने लोक-लाज की दीवारों को तोड़कर अपनी भावनाओं और जिस्मानी जरूरतों को एक मुकाम दिया था।