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होटल वाली चु@@ई

अजनबी शहर की उस धुंधली शाम में समीर अपने होटल के गलियारे में धीरे-धीरे बढ़ रहा था। वह थका हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। तभी उसकी नज़र अपने कमरे के बगल वाले दरवाज़े पर पड़ी, जहाँ एक बेहद खूबसूरत महिला खड़ी थी। उसने गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी, जो उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव को बखूबी बयां कर रही थी। वह अपने कमरे का कार्ड बार-बार लगा रही थी, लेकिन दरवाज़ा नहीं खुल रहा था। उसकी बेचैनी साफ़ झलक रही थी और समीर का दिल उसकी उस घबराहट को देखकर तेज़ी से धड़कने लगा था।

समीर ने पास जाकर मदद की पेशकश की। उस महिला का नाम अनन्या था। जब वह बात कर रही थी, तो समीर की नज़रें उसके साड़ी के पल्लू से झांकते उन गोल और भारी तरबूजों पर टिक गईं। साड़ी की कसी हुई चोली के भीतर वे तरबूज जैसे बाहर आने को बेताब थे। अनन्या का शरीर किसी तराशी हुई मूरत जैसा था। उसका पिछवाड़ा साड़ी के भीतर से इतना उभरा हुआ और सुडौल लग रहा था कि समीर के भीतर एक हलचल सी मच गई। अनन्या की गर्दन पर पसीने की कुछ बूंदें चमक रही थीं, जो उसके जिस्म की गर्मी का अहसास करा रही थीं।

बातों-बातों में पता चला कि मेंटेनेंस आने में समय लगेगा। समीर ने शालीनता से उसे अपने कमरे में इंतज़ार करने को कहा। कमरे के भीतर का माहौल शांत था, लेकिन दोनों के बीच एक अनकही कशिश जन्म ले रही थी। अनन्या सोफे पर बैठी, तो उसकी साड़ी थोड़ी सरक गई, जिससे उसके गोरे पैर और कमर का कुछ हिस्सा दिखाई देने लगा। समीर ने उसे पानी का गिलास दिया, तो उनके हाथ एक-दूसरे से छुए। वह पहला स्पर्श किसी बिजली के झटके जैसा था। अनन्या की साँसे थोड़ी तेज़ हो गईं और समीर की नसों में खून का बहाव बढ़ने लगा।

समीर उसके करीब बैठ गया। कमरे की मद्धम रोशनी में अनन्या की आँखें और भी गहरी लग रही थीं। समीर ने धीरे से अपना हाथ उसकी मखमली पीठ पर रखा। अनन्या कांप उठी, लेकिन उसने उसे हटाया नहीं। समीर ने अपनी उंगलियों को उसकी साड़ी के किनारे से भीतर डाला और उसकी त्वचा को महसूस किया। अनन्या के मुँह से एक दबी हुई आह निकली। समीर ने उसे अपनी तरफ मोड़ा और उसकी आँखों में झांका। वहाँ झिझक थी, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा गहरी खुदाई की चाहत थी। समीर ने धीरे से उसके होठों को अपने होठों में भर लिया और उनका रस पीने लगा।

धीरे-धीरे समीर के हाथ अनन्या के भारी तरबूजों पर पहुँच गए। उसने मखमली कपड़े के ऊपर से ही उन्हें सहलाना शुरू किया। अनन्या ने अपनी आँखें बंद कर लीं और समीर के बालों में अपनी उंगलियां फँसा दीं। समीर ने उसकी चोली के हुक एक-एक करके खोले, और जैसे ही वे आज़ाद हुए, दो विशाल और सफ़ेद तरबूज उसके सामने आ गए। उनके ऊपर लगे छोटे-छोटे गुलाबी मटर ठंड और उत्तेजना से अकड़ चुके थे। समीर ने अपनी जीभ से उन मटरों को सहलाया, तो अनन्या का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया और वह सिसकने लगी।

समीर ने अब अनन्या की साड़ी पूरी तरह उतार दी। वह अब सिर्फ अपनी अंतःवस्त्रों में थी। उसका सुडौल पिछवाड़ा समीर की आँखों के सामने किसी पहाड़ी की तरह उभरा हुआ था। समीर ने उसे अपनी बाहों में उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। अनन्या की रेशमी त्वचा समीर के हाथों के नीचे पिघल रही थी। समीर ने अपने कपड़े उतार फेंके, और उसका सख्त और लंबा खीरा अब आज़ाद था। वह खीरा पूरी तरह से तैयार था और अपनी मंजिल की तलाश में था। अनन्या ने जब उस विशाल खीरे को देखा, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और डर का मिला-जुला भाव आया।

समीर ने अब अपना चेहरा अनन्या की जांघों के बीच की उस गहरी खाई की ओर किया। वहाँ की रेशमी घास यानी बाल बहुत करीने से कटे हुए थे। समीर ने अपनी जीभ से उस खाई के किनारों को चूसना शुरू किया। अनन्या बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींचने लगी। खाई पूरी तरह से गीली और रसीली हो चुकी थी। समीर ने अपनी उंगली से खाई की गहराई को मापना शुरू किया। जैसे ही उसकी उंगली खाई के भीतर गई, अनन्या ने एक ज़ोरदार कराह भरी और अपना पिछवाड़ा ऊपर उठा लिया। वह रस से पूरी तरह सराबोर हो चुकी थी।

समीर ने अब और इंतज़ार नहीं किया। उसने अनन्या की दोनों टांगों को अपने कंधों पर रखा और अपने कड़क खीरे को उस गीली खाई के मुहाने पर टिका दिया। उसने धीरे से दबाव बनाया, तो अनन्या के मुँह से एक तीखी आह निकली। ‘ओह समीर, धीरे…’ उसने फुसफुसाते हुए कहा। खीरा धीरे-धीरे उस तंग खाई के भीतर समाने लगा। वह जगह इतनी तंग थी कि समीर को भी अपनी नसों में जबरदस्त दबाव महसूस हो रहा था। जैसे ही पूरा खीरा खाई के भीतर समा गया, दोनों कुछ पलों के लिए शांत हो गए, बस एक-दूसरे की बढ़ती धड़कनों को महसूस करते रहे।

फिर समीर ने अपनी कमर को हिलाना शुरू किया। वह धीरे-धीरे खुदाई कर रहा था। हर धक्के के साथ अनन्या का शरीर बिस्तर पर ऊपर-नीचे हो रहा था। कमरे में सिर्फ उनके जिस्मों के टकराने की आवाज़ और अनन्या की सिसकियां गूँज रही थीं। समीर ने अब रफ़्तार बढ़ाई। वह अपने खीरे को पूरी तरह बाहर निकालता और फिर एक झटके के साथ खाई की गहराई तक पहुँचा देता। अनन्या अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थी। वह चिल्ला रही थी, ‘हाँ समीर, और तेज़… मुझे और खोदो… बहुत मज़ा आ रहा है।’

समीर ने अब उसे पलट दिया और उसे घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब वह उसे पिछवाड़े से खोदने के लिए तैयार था। पीछे से अनन्या का भारी पिछवाड़ा समीर के सामने था। उसने अपने खीरे को फिर से उस गीली खाई में उतारा। यह पोजीशन और भी गहरी खुदाई का अहसास दे रही थी। समीर ने अनन्या के दोनों तरबूजों को पीछे से पकड़ लिया और उन्हें बुरी तरह मसलने लगा। हर धक्के के साथ अनन्या के मटर समीर के हाथों में दब रहे थे। वह पागलों की तरह अपना सिर हिला रही थी और उसकी सासों की गर्मी समीर को और भी उत्तेजित कर रही थी।

खुदाई अब अपने चरम पर थी। समीर का पूरा शरीर पसीने से लथपथ था और अनन्या की खाई अब रस से लबालब भर चुकी थी। समीर को महसूस हुआ कि अब उसका रस निकलने वाला है। उसने आखिरी कुछ झटके बहुत तेज़ी से और गहराई से मारे। अनन्या भी कांपने लगी थी, उसकी खाई की दीवारें समीर के खीरे को कसकर जकड़ रही थीं। अचानक अनन्या का पूरा शरीर अकड़ गया और उसकी खाई से ढेर सारा रस छूटने लगा। ठीक उसी पल समीर ने भी अपना सारा गर्म रस अनन्या की खाई की गहराइयों में छोड़ दिया।

दोनों काफी देर तक एक-दूसरे से लिपटे बिस्तर पर पड़े रहे। कमरे का तापमान अब भी बढ़ा हुआ था। अनन्या का सिर समीर की छाती पर था और समीर उसके बालों को सहला रहा था। वह थकावट और सुकून का एक अनोखा संगम था। अनन्या ने ऊपर देखा और समीर के होठों पर एक छोटा सा प्यार भरा निशान छोड़ दिया। वह अजनबी मुलाकात अब एक रूहानी और शारीरिक जुड़ाव में बदल चुकी थी। उस रात उस होटल के कमरे ने एक ऐसी कहानी देखी थी, जो शब्दों से परे थी, जहाँ दो शरीर एक-दूसरे की रूह में समा गए थे।

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