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ऑफिस के सन्नाटे में पिघलती मर्यादा की रेशमी दीवारें

 


ऑफिस के सन्नाटे में पिघलती मर्यादा की रेशमी दीवारें—>

रात के ग्यारह बज चुके थे और मुंबई की गगनचुंबी इमारतों के बीच स्थित उस कॉर्पोरेट ऑफिस की चौदहवीं मंजिल पर सन्नाटा पसरा हुआ था। केबिन की कांच की खिड़कियों से बाहर शहर की लाइटें किसी टिमटिमाते जुगनू की तरह लग रही थीं, लेकिन केबिन के अंदर का तापमान किसी और ही वजह से बढ़ रहा था। नेहा, जो कि कंपनी की सीनियर प्रोजेक्ट लीड थी, अपनी मेज पर झुककर कुछ फाइलों को देख रही थी, जबकि उसका जूनियर राज उसके ठीक बगल में खड़ा था। नेहा की उम्र करीब तैंतीस साल थी, लेकिन उसकी काया किसी कमसिन कली की तरह खिली हुई थी। उसने आज एक गहरे नीले रंग की सिल्क की साड़ी पहनी थी, जो उसके शरीर के उभारों को कुछ इस तरह से लपेटे हुए थी कि राज की नजरें चाहकर भी वहां से हट नहीं पा रही थीं।

नेहा का शरीर एक भरे हुए सुराहीनुमा आकार का था, जिसमें उसकी कमर का पतलापन और उसके नीचे का भारीपन एक अद्भुत संतुलन पैदा कर रहा था। जैसे ही वह फाइलों के पन्ने पलटने के लिए थोड़ा आगे झुकी, उसकी साड़ी का पल्लू उसके कंधे से फिसलकर थोड़ा नीचे गिर गया, जिससे उसकी गहरी छाती के बीच का अंतराल साफ दिखने लगा। राज ने देखा कि नेहा के भारी और गोल तरबूज ब्लाउज की तंग दीवारों को तोड़कर बाहर आने के लिए बेताब लग रहे थे। राज के मन में एक अजीब सी हलचल मच गई और उसका अपना खीरा उसकी पतलून के अंदर करवटें लेने लगा। नेहा ने अपनी आंखों के किनारों से राज की बेचैनी को भांप लिया था, लेकिन उसने टोकने के बजाय अपनी गर्दन को थोड़ा तिरछा किया, जिससे उसके बालों की एक लट उसके गालों को छूने लगी।

राज और नेहा के बीच पिछले कुछ महीनों से एक अनकहा आकर्षण पनप रहा था, जो आज रात अपने चरम पर पहुंचने वाला था। राज ने हिम्मत जुटाकर अपना हाथ धीरे से मेज पर रखा, जो ‘गलती’ से नेहा की उंगलियों से टकरा गया। नेहा ने अपना हाथ हटाया नहीं, बल्कि उसकी उंगलियों में अपनी उंगलियां फंसा लीं। उस स्पर्श में एक ऐसी बिजली थी जिसने दोनों के शरीरों में सिहरन पैदा कर दी। नेहा की सांसें थोड़ी तेज होने लगी थीं और उसके तरबूज राज की बांहों के बहुत करीब आ गए थे। राज ने अपनी दूसरी हथेली नेहा की कमर के उस खाली हिस्से पर रखी, जहां साड़ी और ब्लाउज के बीच का फासला उसकी गोरी और मुलायम त्वचा को उजागर कर रहा था। नेहा के मुंह से एक धीमी सी आह निकली और उसने अपनी आंखें मूंद लीं।

कमरे में एसी की ठंडक के बावजूद दोनों के शरीर पसीने से भीगने लगे थे। राज ने धीरे से नेहा को अपनी ओर घुमाया और उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में भर लिया। नेहा की आंखों में शर्म और बेतहाशा इच्छा का एक अनोखा संगम था। राज ने उसके कानों के पास जाकर फुसफुसाया, ‘मैम, आज आप बहुत खूबसूरत लग रही हैं।’ नेहा ने अपनी कांपती हुई उंगलियों से राज की शर्ट के बटन खोलने शुरू किए और जवाब दिया, ‘राज, आज कोई मैम नहीं, बस मैं और तुम हैं।’ जैसे ही शर्ट के बटन खुले, राज का मजबूत सीना नेहा के सामने था। नेहा ने अपने हाथ राज के सीने पर फेरे और उसकी उंगलियां राज के खीरा की दिशा में बढ़ने लगीं, जो अब पूरी तरह से अपनी कठोरता का परिचय दे रहा था।

राज ने नेहा की साड़ी के पल्लू को पूरी तरह से हटा दिया, जिससे उसके ब्लाउज में कैद विशाल तरबूज अब पूरी तरह से राज की नजरों के सामने थे। राज ने अपनी उंगलियों से ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। जैसे ही आखिरी हुक खुला, नेहा के तरबूज आजाद होकर बाहर आ गए। वे इतने गोरे और सुडौल थे कि राज बस उन्हें देखता ही रह गया। उन तरबूजों के बीच में छोटे-छोटे भूरे रंग के मटर के दाने की तरह निप्पल उभरे हुए थे, जो ठंड और उत्तेजना से पूरी तरह से सख्त हो चुके थे। राज ने झुककर एक तरबूज को अपने मुंह में भर लिया और उसके मटर को अपनी जीभ से सहलाने लगा। नेहा ने अपनी कमर को ऊपर उठाया और राज के बालों में अपनी उंगलियां गड़ा दीं।

उत्तेजना अब सातवें आसमान पर थी। राज ने नेहा को मेज पर लिटा दिया और उसकी साड़ी को धीरे-धीरे पैरों की तरफ सरकाने लगा। जैसे ही साड़ी और पेटीकोट नीचे गिरे, नेहा का निचला हिस्सा पूरी तरह से निर्वस्त्र हो गया। वहां घने काले बालों के बीच एक रहस्यमयी और गहरी खाई छिपी हुई थी। वह खाई पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वहां से एक मादक खुशबू आ रही थी। राज ने अपनी उंगलियों को उस खाई के मुहाने पर रखा और धीरे-धीरे उंगली से खोदना शुरू किया। नेहा ने अपनी टांगें फैला दीं और सिसकारियां लेते हुए राज को और करीब खींच लिया। राज ने अपना चेहरा नीचे झुकाया और उस गीली खाई को चखने लगा। नेहा का शरीर धनुष की तरह तन गया और जब राज ने अपनी जीभ उस खाई के अंदर डाली, तो नेहा के मुंह से एक जोरदार चीख निकली।

अब राज की बारी थी। उसने अपनी पतलून उतारी और उसका विशाल और फौलादी खीरा उछलकर बाहर आ गया। नेहा ने उस खीरे को अपने हाथों में पकड़ा और उसकी लंबाई और मोटाई को महसूस किया। उसने बिना देर किए उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे चूसना शुरू किया। खीरा चूसने की उस क्रिया ने राज को पागलपन की हद तक पहुंचा दिया। वह नेहा के सिर को पकड़कर उसे अपने खीरे पर गहराई से उतारने लगा। कुछ देर बाद, राज ने नेहा को मेज पर ही अपने पिछवाड़े के बल बिठाया और उसकी टांगों को अपने कंधों पर रख लिया। वह समय आ गया था जब असली खुदाई शुरू होने वाली थी।

राज ने अपने खीरे की नोक को नेहा की गीली खाई के मुहाने पर टिकाया और एक धीमे लेकिन गहरे धक्के के साथ उसे अंदर उतार दिया। नेहा की आंखों से खुशी और दर्द के मिले-जुले आंसू निकल आए क्योंकि वह पहली बार इतनी गहराई महसूस कर रही थी। राज ने सामने से खोदना जारी रखा, हर धक्के के साथ उसके अंडकोष नेहा के पिछवाड़े से टकरा रहे थे, जिससे एक अजीब सा संगीत पैदा हो रहा था। कमरे में सिर्फ उनके जिस्मों के टकराने की आवाज और भारी सांसें गूंज रही थीं। राज ने नेहा के तरबूजों को अपने हाथों में भींच लिया और उसके मटर को अपने दांतों से हल्का सा दबाया। खुदाई की गति अब तेज हो गई थी, हर धक्का नेहा के अस्तित्व को हिला कर रख रहा था।

नेहा ने अब राज को अपनी ओर पलटा और खुद उसके ऊपर बैठ गई। उसने अपने पिछवाड़े को राज के खीरे पर जोर-जोर से पटकना शुरू किया। यह नजारा बहुत ही कामुक था, नेहा के तरबूज हवा में उछल रहे थे और उसकी आंखों में एक जंगलीपन था। वह अपनी खाई के अंदर उस खीरे की हर इंच को महसूस कर रही थी। कुछ देर बाद राज ने उसे घुमाया और पिछवाड़े से खोदने की मुद्रा (डॉगिस्टाइल) में ले आया। राज ने पीछे से उसके पिछवाड़े को अपने हाथों से फैलाया और अपने खीरे को पूरी ताकत से नेहा की खाई के अंदर उतार दिया। नेहा ने अपनी हथेलियां मेज पर जमा दीं और हर धक्के के साथ उसकी कमर नीचे की ओर झुकती चली गई।

खुदाई अब अपने अंतिम चरण में थी। दोनों के शरीर पसीने से लथपथ थे और सांसें उखड़ रही थीं। राज ने नेहा को फिर से मेज पर सीधा लिटाया और अपनी पूरी ताकत से अंतिम कुछ धक्के लगाए। नेहा की खाई अब पूरी तरह से रस से भर गई थी। राज ने महसूस किया कि उसका खीरा अब फटने वाला है और ठीक उसी पल नेहा के शरीर में एक जोरदार कंपन हुआ और उसकी खाई से ढेर सारा रस निकलने लगा। राज ने भी अपने खीरे को गहराई तक धंसा दिया और अपना सारा गर्म रस नेहा की खाई की गहराइयों में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए वहीं मेज पर गिर पड़े, उनके दिलों की धड़कनें एक-दूसरे की छाती में सुनाई दे रही थीं।

कुछ मिनटों के सन्नाटे के बाद, नेहा ने राज की आंखों में देखा और उसके माथे को चूम लिया। उस रात की उस खुदाई ने उनके बीच के पेशेवर रिश्ते को हमेशा के लिए एक गहरे भावनात्मक बंधन में बदल दिया था। नेहा ने धीरे से उठकर अपने बिखरे हुए कपड़ों को समेटा, लेकिन उसकी चाल में अभी भी उस आनंद की लचक बाकी थी। राज ने उसे पीछे से गले लगाया और उसकी गर्दन पर अपनी नाक रगड़ी। वे जानते थे कि कल जब वे फिर से इस ऑफिस में मिलेंगे, तो वे सिर्फ कलीग नहीं होंगे, बल्कि एक-दूसरे के जिस्म और रूह के उन राजों के साझीदार होंगे जो आज इस केबिन की दीवारों में कैद हो गए थे। उस ठंडे ऑफिस में अब एक नई ऊष्मा का जन्म हो चुका था।

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