ऑफिस वाली गरम चु@@ई—>
रात के ग्यारह बज चुके थे और ऑफिस की पच्चीसवीं मंजिल पर सन्नाटा पसरा हुआ था, सिवाय उस कोने के केबिन के जहाँ समीर और नेहा एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट की फाइलें निपटा रहे थे। एयर कंडीशनर की हल्की सनसनाहट के बीच नेहा के कीबोर्ड पर थिरकती उंगलियों की आवाज गूँज रही थी, लेकिन समीर का ध्यान स्क्रीन पर कम और नेहा की रेशमी साड़ी के पल्लू से छनकर दिखते उसके गौरवर्ण बदन पर ज्यादा था। नेहा ने गहरे नीले रंग की शिफॉन साड़ी पहनी थी, जो उसके शरीर के हर उभार को इस तरह पकड़ रही थी जैसे कोई प्यासा राही पानी की तलाश में हो। उसके चेहरे पर थकावट की हल्की परत थी, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जो समीर के दिल की धड़कनें बढ़ा रही थी। समीर ने महसूस किया कि केबिन के अंदर का तापमान एसी के बावजूद बढ़ता जा रहा था, और यह गर्मी बाहरी नहीं बल्कि उन दोनों के बीच पनप रहे अनकहे तनाव की थी।
नेहा की शारीरिक बनावट किसी शिल्पी की बेहतरीन कलाकृति जैसी थी, उसकी कमर इतनी पतली थी कि समीर को लगता वह उसे अपनी एक हथेली में भर सकता है। साड़ी के ब्लाउज से झांकते उसके तरबूज इतने पुष्ट और सुडौल थे कि हर बार जब वह सांस लेती, तो वे ऊपर-नीचे होते हुए समीर के संयम की परीक्षा लेते थे। साड़ी के नीचे से उसके भारी और गोल पिछवाड़े का आकार साफ झलक रहा था, जो चलने पर एक मदहोश कर देने वाली लय पैदा करता था। नेहा के लंबे काले बाल उसकी पीठ पर नागिन की तरह लहरा रहे थे, और जब वह झुककर फाइल उठाती, तो उसके तरबूज की गहरी घाटी समीर को मदहोश कर देती थी। उसकी त्वचा का रंग कुंदन जैसा चमक रहा था और उस पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें मोतियों की तरह सजी हुई थीं, जो समीर की इच्छाओं को और भी तीव्र कर रही थीं।
समीर और नेहा पिछले तीन सालों से साथ काम कर रहे थे, लेकिन आज की रात कुछ अलग थी, जैसे कि दोनों के बीच का पेशेवर पर्दा धीरे-धीरे गिर रहा हो। समीर को अक्सर नेहा की आँखों में अपने प्रति एक विशेष झुकाव महसूस होता था, लेकिन ऑफिस की मर्यादा ने हमेशा उन्हें बांधे रखा था। आज रात की तन्हाई ने उनके दिलों की दबी हुई भावनाओं को बाहर आने का रास्ता दे दिया था, और नेहा भी समीर की नज़रों की तपिश को अपने शरीर पर महसूस कर रही थी। जब भी समीर उसके पास आकर फाइल देखता, नेहा की सांसें तेज हो जातीं और उसे अपने शरीर में एक अजीब सी सिहरन महसूस होती थी। उनके बीच का यह भावनात्मक खिंचाव अब केवल शब्दों तक सीमित नहीं था, बल्कि एक ऐसी प्यास बन चुका था जिसे बुझाने का समय अब करीब आ रहा था।
काम खत्म करने के बहाने समीर नेहा की कुर्सी के पीछे जाकर खड़ा हो गया, और उसकी खुशबू ने समीर के दिमाग में कोहराम मचा दिया। उसने धीरे से अपना हाथ नेहा के कंधे पर रखा, तो नेहा ने एक गहरी आह भरी और अपनी आँखें मूंद लीं, जैसे वह इसी स्पर्श का इंतजार कर रही हो। समीर ने देखा कि उसकी गर्दन पर मौजूद छोटे-छोटे बाल खड़े हो गए थे, जो उसकी उत्तेजना को साफ बयां कर रहे थे। नेहा ने पीछे मुड़कर समीर की आँखों में देखा, जहाँ झिझक और बेपनाह चाहत का एक गहरा समुद्र हिलोरे मार रहा था। उसने समीर का हाथ नहीं हटाया, बल्कि धीरे से अपनी गर्दन एक तरफ झुका दी ताकि समीर को और जगह मिल सके, और यहीं से उनकी मर्यादा की दीवारें ढहने लगीं।
समीर ने नेहा के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके होंठों का रस पीना शुरू कर दिया, यह चुंबन इतना गहरा और भावुक था कि नेहा के हाथ खुद-ब-खुद समीर की कमीज के बटन खोलने लगे। जैसे ही समीर ने नेहा की साड़ी का पल्लू गिराया, उसके पुष्ट तरबूज ब्लाउज की कैद से आजाद होने को बेताब दिखे। समीर ने धीरे से ब्लाउज के हुक खोले और उन विशाल तरबूजों को अपनी हथेलियों में भर लिया, जिनका स्पर्श रेशम से भी ज्यादा कोमल और गर्म था। तरबूजों के बीच मौजूद छोटे-छोटे मटर अब सख्त हो चुके थे, जिन्हें समीर ने अपनी उंगलियों से सहलाया तो नेहा के गले से एक मदहोश कर देने वाली कराह निकली। नेहा का पूरा शरीर अब कांप रहा था और वह समीर की बाहों में पिघलती जा रही थी, उसकी शर्म धीरे-धीरे बढ़ती हुई कामेच्छा के नीचे दबती जा रही थी।
समीर ने नेहा को धीरे से ऑफिस की बड़ी सी मेज पर लिटा दिया और उसकी साड़ी और पेटीकोट को पूरी तरह उतार फेंका, जिससे नेहा का नग्न बदन चांदनी रात में चमकने लगा। नेहा की टांगों के बीच की गहरी खाई अब पूरी तरह समीर के सामने थी, जहाँ काले रेशमी बालों का एक छोटा सा जंगल उस पवित्र द्वार की रक्षा कर रहा था। समीर ने अपनी उंगली से उस खाई को टटोला तो वह पूरी तरह गीली और चिपचिपी हो चुकी थी, जो नेहा की चरम उत्तेजना का सबूत थी। उसने नेहा की खाई को अपने मुंह से लगाया और उसे चाटना शुरू किया, तो नेहा ने समीर के बालों को कसकर पकड़ लिया और अपनी कमर हवा में उठाने लगी। वह इस नए और तीव्र सुख से पागल हो रही थी, और उसकी सिसकियाँ पूरे केबिन में गूँजने लगी थीं, जो समीर को और भी ज्यादा उग्र बना रही थीं।
अब समीर ने अपनी पैंट उतारी और उसका विशाल और फौलादी खीरा बाहर निकल आया, जो नेहा की खाई में समाने के लिए पूरी तरह बेताब और तना हुआ था। नेहा ने जब उस विशाल खीरे को देखा तो उसकी आँखें फैल गईं, लेकिन उसने तुरंत उसे अपने हाथों में लेकर सहलाया और उसे अपने कोमल होंठों के बीच ले लिया। समीर के पूरे शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ गई जब नेहा ने उसके खीरे को चूसना शुरू किया और अपनी जीभ से उसके अगले हिस्से को सहलाने लगी। इस क्रिया ने समीर के धैर्य का बांध तोड़ दिया और उसने नेहा को मेज पर सही स्थिति में किया ताकि वह अपनी मुख्य खुदाई शुरू कर सके। दोनों की सांसें अब एक-दूसरे में उलझ चुकी थीं और कमरे का माहौल पूरी तरह कामुक और उत्तेजक हो चुका था।
समीर ने नेहा की टांगों को अपने कंधों पर रखा और अपने विशाल खीरे को उसकी तंग और गीली खाई के मुहाने पर सेट किया। जैसे ही उसने एक जोरदार धक्का दिया, खीरा उस तंग खाई में आधा समा गया और नेहा के मुंह से एक तीखी लेकिन सुखद आह निकली। खाई इतनी तंग थी कि समीर को आगे बढ़ने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ रही थी, लेकिन नेहा की गीलाहट ने उस खुदाई को संभव बना दिया। धीरे-धीरे समीर ने पूरे खीरे को नेहा की खाई की गहराइयों तक पहुंचा दिया, जिससे नेहा की आँखें ऊपर चढ़ गईं और उसका पूरा बदन धनुष की तरह तन गया। यह मिलन इतना गहरा था कि उन्हें लग रहा था जैसे वे दो जिस्म नहीं बल्कि एक रूह बन चुके हैं, जो इस ब्रह्मांड के सबसे बड़े सुख का अनुभव कर रहे हैं।
अब खुदाई की गति बढ़ने लगी थी, समीर के हर धक्के के साथ नेहा के तरबूज जोर-जोर से उछल रहे थे और मेज की चरमराहट उनके मिलन का संगीत बन गई थी। समीर ने अब नेहा को घुमाया और उसे मेज के सहारे झुका दिया ताकि वह उसे पिछवाड़े से खोद सके। इस स्थिति में नेहा का पिछवाड़ा ऊपर उठा हुआ था और समीर को उसकी गहराई तक पहुँचने का पूरा मौका मिल रहा था। हर बार जब समीर का शरीर नेहा के पिछवाड़े से टकराता, तो एक जोरदार चटाक की आवाज आती जो नेहा को और भी ज्यादा उत्तेजित कर देती थी। नेहा जोर-जोर से चिल्ला रही थी, ‘हाँ समीर, और तेज, मुझे पूरी तरह खोद दो, आज मुझे अपना बना लो’, और समीर उसकी इस मांग को पूरी करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रहा था।
खुदाई अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी, नेहा की खाई अब पूरी तरह गर्म और पसीने से तर-बतर थी। समीर ने फिर से नेहा को सीधा लेटाया और अपनी गति को तूफानी बना दिया, वह नेहा के होंठों को चूसते हुए उसे लगातार खोद रहा था। नेहा के शरीर में अब झटके लगने शुरू हो गए थे, जो इस बात का संकेत था कि उसका रस निकलने वाला है। अचानक नेहा ने समीर को कसकर जकड़ लिया और उसका शरीर बुरी तरह कांपने लगा, उसकी खाई से रस की फुहारें छूटने लगीं जिसने समीर के खीरे को पूरी तरह नहला दिया। नेहा के रस निकलते ही समीर ने भी अपनी गति और बढ़ा दी और कुछ ही क्षणों बाद उसका भी सारा रस नेहा की खाई की गहराइयों में समा गया।
खुदाई खत्म होने के बाद दोनों मेज पर ही एक-दूसरे से लिपटे हुए पड़े थे, उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं लेकिन उनके शरीरों की गर्मी अभी भी बरकरार थी। नेहा ने समीर के सीने पर अपना सिर रखा और अपनी उंगलियों से उसके बालों को सहलाने लगी, उसके चेहरे पर एक गहरी संतुष्टि और सुकून की लहर थी। समीर ने उसे अपने आगोश में और कस लिया, उसे महसूस हो रहा था कि इस शारीरिक संबंध ने उनके बीच के भावनात्मक बंधन को और भी मजबूत कर दिया है। वह रात उनके लिए सिर्फ एक कामुक अनुभव नहीं थी, बल्कि एक ऐसी शुरुआत थी जिसने उनके रिश्तों की परिभाषा को हमेशा के लिए बदल दिया था। ऑफिस की वे दीवारें आज एक गुप्त प्रेम और उस गहरी खुदाई की गवाह बन चुकी थीं, जो हमेशा नेहा और समीर की यादों में महकती रहेगी।