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जिम सहेली की चु@@ई

पुरानी सहेली स्नेहा से उस शाम पार्क के सुनसान कोने में मिलना मेरे लिए किसी सपने जैसा था, लेकिन उस सपने में एक अलग ही बेचैनी और गहराई छिपी हुई थी। हम दोनों स्कूल के दिनों में एक-दूसरे के बेहद करीब थे, लेकिन वक्त की धूल ने हमारे बीच दूरियां पैदा कर दी थीं। आज सालों बाद जब वह मेरे सामने खड़ी थी, तो वह पहले वाली पतली-दुबली स्नेहा नहीं, बल्कि एक जिम जाने वाली बेहद कसरती और कामुक महिला में तब्दील हो चुकी थी। शाम की धुंधलकी रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे उसकी आंखों की चमक और भी बढ़ गई थी। हम दोनों घास पर बैठ गए और पुरानी यादों के साथ-साथ एक अनकही प्यास भी हमारे बीच बढ़ने लगी थी।

स्नेहा की शारीरिक बनावट आज वाकई कातिलाना थी, उसके शरीर का हर एक हिस्सा जैसे पुकार-पुकार कर अपनी जवानी का बखान कर रहा था। उसने एक तंग जिम लेगिंग और एक छोटा सा टॉप पहना था, जिसमें से उसके तरबूज जैसे उभार साफ झलक रहे थे और हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। उसके तरबूज इतने भरे हुए और सुडौल थे कि टॉप का कपड़ा उन्हें ढंकने में नाकामयाब हो रहा था, और उन पर उभरे छोटे-छोटे मटर जैसे दाने कपड़े के ऊपर से ही अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे। जब वह हिलती, तो उसका भारी पिछवाड़ा लेगिंग के अंदर एक अजीब सी हलचल पैदा करता था, जिसे देखकर किसी भी मर्द का मन डोल जाए। उसकी कमर इतनी पतली थी कि जैसे कोई कलाकार ने इसे तराशा हो, और उस पर चढ़ा मांस उसके पूरे व्यक्तित्व को और भी भारी बना रहा था।

बातों-बातों में हमारा भावनात्मक जुड़ाव फिर से गहरा होने लगा और पुराने स्कूल के दिनों की वे दबी हुई इच्छाएं फिर से जाग उठीं। स्नेहा ने बताया कि वह अपनी शादीशुदा जिंदगी में कितनी अकेली महसूस करती है और उसे कभी वह सुकून नहीं मिला जिसकी वह हकदार थी। उसकी आंखों में हल्की नमी थी और आवाज़ में एक भारीपन, जिसने मेरे दिल को अंदर तक झकझोर दिया। मैंने धीरे से उसका हाथ अपने हाथ में लिया, और उस एक स्पर्श ने जैसे हमारे बीच के सारे बांध तोड़ दिए। उस समय हवा में एक अजीब सी गर्माहट महसूस होने लगी थी, और हमारी सांसों की गति एक-दूसरे के करीब आने के साथ-साथ तेज होती जा रही थी। हमारे मन के बीच चल रहा संघर्ष अब खत्म हो रहा था और शरीर की जरूरतें हावी हो रही थीं।

आकर्षण की उस चरम सीमा पर, आकर्षण ने एक नई शक्ल अख्तियार कर ली थी जहाँ अब सिर्फ शब्दों का कोई काम नहीं बचा था। मैंने धीरे से अपना हाथ उसकी गर्दन के पीछे ले जाकर उसे अपनी ओर खींचा और हम दोनों के होठों के बीच की दूरी खत्म हो गई। वह चुंबन इतना गहरा और लंबा था कि जैसे हम एक-दूसरे की आत्मा को पी जाना चाहते हों। स्नेहा के मुंह से एक हल्की सी आह निकली और उसने अपनी बाहें मेरे गले में डाल दीं। हमारी जीभ एक-दूसरे के रस को चखने के लिए व्याकुल हो उठी थी, और उस पल में झिझक का हर कतरा पिघल कर बह गया था। मेरा एक हाथ उसके रेशमी बालों को सहला रहा था, तो दूसरा हाथ धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़कर उसके भारी तरबूजों पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा था।

जैसे ही मेरा हाथ उसके तरबूजों तक पहुँचा, स्नेहा का पूरा शरीर थरथरा उठा और उसने अपनी आंखें बंद कर लीं। मैंने धीरे से उसके टॉप के अंदर हाथ डाला, जहाँ उसके नरम और गर्म तरबूज मेरे हाथ की हथेली में समा गए। उन पर मौजूद मटर जैसे दाने मेरी उंगलियों के स्पर्श से और भी सख्त हो गए थे, जो उसकी उत्तेजना का साफ संकेत थे। मैंने धीरे से उन मटरों को अपनी उंगलियों के बीच मसलना शुरू किया, जिससे उसके मुंह से सिसकारियां निकलने लगीं। वह बार-बार मेरा नाम लेकर मुझे और करीब खींच रही थी, और उसका पिछवाड़ा जमीन पर बेचैनी से रगड़ खा रहा था। हवा में अब सिर्फ हमारी भारी होती सांसों और प्यार भरी सिसकारियों की आवाज गूंज रही थी, जो इस बात की गवाह थी कि अब खुदाई की शुरुआत होने वाली है।

अब स्नेहा भी पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थी, उसने कांपते हाथों से मेरे कपड़े उतारने शुरू किए और जब मेरा लंबा और सख्त खीरा उसके सामने आया, तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गई। उसने बड़े ही प्यार से मेरे खीरे को छुआ और फिर उसे अपने मुंह में ले लिया। उसके गीले मुंह की गर्माहट और जीभ का स्पर्श मेरे खीरे को और भी पत्थर जैसा बना रहा था। वह बड़ी ही कुशलता से खीरे को चूस रही थी, जैसे वह दुनिया का सबसे मीठा फल हो। इधर मैं भी शांत नहीं बैठा था, मैंने उसकी लेगिंग नीचे की और उसके पैरों के बीच छिपी गहरी और गीली खाई को अपनी उंगलियों से टटोलना शुरू कर दिया। उसकी खाई पूरी तरह से चिपचिपी और गर्म हो चुकी थी, जो इस बात का संकेत थी कि वह अंदर से कितनी प्यासी है।

मैंने उसे धीरे से घास पर लेटा दिया और अपनी उंगलियों से उसकी खाई के भीतर खुदाई शुरू की। जैसे-जैसे मेरी उंगलियां उसकी खाई की गहराइयों को छूतीं, स्नेहा अपनी कमर ऊपर उठाती और जोर-जोर से आहें भरती। वह कहती, “अंदर तक खोदो, मुझे आज रुकना नहीं है।” उसकी सिसकारियां अब ऊंची होने लगी थीं और वह मेरे खीरे को दोबारा चखने के लिए बेताब थी। मैंने उसे अपनी बाहों में उठाया और उसके दोनों पैरों को चौड़ा किया ताकि मैं उसकी खाई का पूरा नजारा ले सकूँ। उसकी खाई के किनारे लगे छोटे-छोटे बाल ओस की बूंदों की तरह गीले हो चुके थे। मैंने झुककर अपनी जीभ से उसकी खाई को चाटना शुरू किया, जिससे वह पागलों की तरह तड़पने लगी और उसके हाथ घास को मुट्ठियों में भींचने लगे।

अब वक्त आ गया था कि असली खुदाई शुरू की जाए। मैंने उसे सामने से खोदने के लिए सही स्थिति में लाया और अपने खीरे का सिरा उसकी गीली खाई के मुहाने पर रखा। जैसे ही मैंने धीरे से दबाव डाला, खीरा उसकी तंग खाई के अंदर समाने लगा। स्नेहा ने एक दर्द और आनंद से भरी चीख निकाली और मुझे कसकर पकड़ लिया। उसकी खाई इतनी तंग थी कि मेरा खीरा हर मिलीमीटर पर उसकी दीवारों को महसूस कर रहा था। मैंने धीरे-धीरे अपनी गति बढ़ाई और सामने से खुदाई की प्रक्रिया को तेज किया। हर धक्के के साथ मेरे अंडकोष उसके पिछवाड़े से टकरा रहे थे, जिससे एक थप-थप की सुरीली आवाज गूंज रही थी। स्नेहा का चेहरा पसीने से भीग चुका था और उसके तरबूज ऊपर-नीचे तेजी से उछल रहे थे।

हम दोनों एक-दूसरे के शरीर की लय में खो चुके थे, मानो पूरा ब्रह्मांड उस समय हमारे इर्द-गिर्द सिमट आया हो। खुदाई की उस आग में हम दोनों झुलस रहे थे। मैंने उसे धीरे से घुमाया और अब वह अपने घुटनों के बल खड़ी थी, ताकि मैं पिछवाड़े से खुदाई कर सकूँ। पीछे से देखने पर उसका पिछवाड़ा दो पहाड़ियों की तरह लग रहा था, जिसके बीच की घाटी में मेरा खीरा बार-बार जा रहा था। यह स्थिति स्नेहा को और भी ज्यादा उत्तेजित कर रही थी, वह अपने सिर को बार-बार पीछे मोड़कर मुझे देख रही थी और गंदे-गंदे डाइलोग बोल रही थी। “हाँ, और जोर से खोदो, आज मेरी इस खाई को पूरी तरह भर दो,” उसके इन शब्दों ने मेरी उत्तेजना को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया और मैं पागलों की तरह उसे खोदने लगा।

जैसे-जैसे खुदाई का अंत करीब आ रहा था, हमारी सांसें उखड़ने लगी थीं। स्नेहा का पूरा शरीर कांपने लगा था और उसकी खाई के अंदर की मांसपेशियां मेरे खीरे को जोर-जोर से भींच रही थीं। उसने चिल्लाते हुए कहा कि उसका रस छूटने वाला है। ठीक उसी पल, मेरा भी सब्र टूट गया और मैंने एक आखिरी गहरा धक्का मारा। हम दोनों का रस एक साथ निकला और उसकी खाई के अंदर सैलाब आ गया। स्नेहा निढाल होकर घास पर गिर पड़ी और मैं भी उसके ऊपर ही ढह गया। हमारा शरीर पसीने से लथपथ था और हम दोनों एक-दूसरे को पकड़कर लंबी-लंबी सांसें ले रहे थे। उस खुदाई के बाद जो सुकून हमें मिला, वह बयान करना मुश्किल था।

कुछ देर तक हम उसी हालत में पड़े रहे, पसीने की बूंदें हमारे शरीर पर चमक रही थीं और ठंडी हवा हमें राहत दे रही थी। स्नेहा ने अपनी गीली आंखों से मुझे देखा और मुस्कुराते हुए कहा कि आज उसने वह सब महसूस किया जो उसने पहले कभी नहीं किया था। हमने धीरे-धीरे अपने कपड़े पहने, लेकिन हमारे बीच का वह शारीरिक और भावनात्मक खिंचाव अब पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुका था। वह शाम सिर्फ एक मुलाकात नहीं थी, बल्कि दो पुराने जिस्मों और रूहों का मिलन था, जिसने हमें हमेशा के लिए एक-दूसरे के और करीब ला दिया था। हमने एक-दूसरे को अलविदा कहा, लेकिन यह जानते हुए कि इस सुनसान पार्क में हुई यह खुदाई बस एक शुरुआत थी, अंत नहीं।

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