शाम का धुंधलका धीरे-धीरे शहर के उस पुराने बॉटनिकल गार्डन में अपनी चादर फैला रहा था जहाँ समीर और अनन्या दस साल बाद मिल रहे थे। समीर की धड़कनें उस वक्त से ही तेज थीं जब उसने अनन्या को गेट पर इंतज़ार करते देखा था। अनन्या अब वह स्कूल वाली दुबली-पतली लड़की नहीं रही थी, बल्कि उसके शरीर के हर अंग में एक परिपक्वता और भारीपन आ गया था। उसने पीले रंग की शिफॉन की साड़ी पहन रखी थी, जिसमें से उसके शरीर के उभार साफ झलक रहे थे और उसके भारी तरबूज ब्लाउज की सीमाओं को चुनौती दे रहे थे। जैसे-जैसे वे पार्क के एक सुनसान कोने की तरफ बढ़ रहे थे, जहाँ बरगद के पुराने पेड़ों की घनी छाँव थी, हवा में मोगरे की महक और एक अनकही उत्तेजना घुलने लगी थी। समीर ने महसूस किया कि अनन्या के चलने के अंदाज़ में एक खास किस्म की लचक थी जो उसके चौड़े पिछवाड़े को और भी आकर्षक बना रही थी।
वे एक पुरानी बेंच पर बैठ गए जहाँ सन्नाटा इतना गहरा था कि वे एक-दूसरे की सांसों की आवाज़ भी सुन सकते थे। बातों-बातों में पुराने दिनों की यादें ताज़ा होने लगीं, लेकिन दोनों की आँखों में यादों से कहीं ज्यादा वर्तमान की प्यास चमक रही थी। समीर ने धीरे से अपना हाथ अनन्या के हाथ पर रखा, तो उसने अपनी उंगलियाँ उसकी उंगलियों में फंसा लीं। उसकी त्वचा मखमल जैसी नरम और ठंडी थी, लेकिन समीर के भीतर के खीरे में एक हलचल शुरू हो गई थी जो अब उसके कपड़ों के भीतर अपनी जगह बनाने के लिए बेकरार था। अनन्या ने तिरछी नज़रों से समीर के चेहरे की तरफ देखा और उसकी नज़रों में छिपी शरारत ने समीर के संयम का बांध तोड़ दिया। उसने अपनी हथेली को अनन्या की कमर के खुले हिस्से पर रखा, जहाँ रेशमी साड़ी और उसकी गोरी त्वचा के बीच का स्पर्श बिजली की तरह उसके पूरे शरीर में दौड़ गया।
अनन्या ने एक गहरी सांस ली और अपना सिर समीर के कंधे पर टिका दिया, जिससे उसके रेशमी बाल समीर के चेहरे को छूने लगे। समीर ने अपनी उंगलियों को धीरे-धीरे उसकी पीठ पर सरकाना शुरू किया, जिससे अनन्या के शरीर में एक कंपकंपी सी छूट गई। उसने महसूस किया कि अनन्या के शरीर की गर्मी अब बढ़ने लगी थी और उसके भारी तरबूज समीर की छाती से सटकर दब रहे थे। समीर ने अपना दूसरा हाथ अनन्या की गर्दन के पीछे ले जाकर उसे अपनी ओर खींचा और उनके होंठ एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए। हवा में एक अजीब सी खामोशी छा गई थी, सिर्फ उन दोनों की भारी होती सांसें और पत्तों की सरसराहट सुनाई दे रही थी। समीर ने महसूस किया कि अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं बचा है, क्योंकि उसकी अंतरात्मा और शरीर दोनों ही अनन्या के समर्पण के लिए व्याकुल हो चुके थे।
समीर ने अपने होंठ अनन्या के कानों के पास ले जाकर धीरे से कुछ कहा, जिससे वह पूरी तरह से सिहर उठी और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसके हाथ समीर के कंधों पर कस गए और उसकी उंगलियाँ उसकी टी-शर्ट के कपड़े को भींचने लगीं। समीर ने अब अपनी पकड़ मजबूत की और उसके हाथों ने अनन्या के तरबूजों को सहलाना शुरू कर दिया। ब्लाउज के ऊपर से ही वह उनकी गोलाई और भारीपन को महसूस कर पा रहा था, जो कि बेहद सख्त और उभरे हुए थे। जैसे ही समीर ने अपने अंगूठे से उनके ऊपर मौजूद मटरों को धीरे से दबाया, अनन्या के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकल गई। उसकी गर्दन पीछे की ओर झुक गई और समीर को उसकी सुंदरता को करीब से निहारने का पूरा मौका मिल गया, जहाँ उसका सीना सांसों की तेजी की वजह से ऊपर-नीचे हो रहा था।
समीर ने अब और इंतज़ार न करते हुए अनन्या की साड़ी के पल्लू को धीरे से कंधे से नीचे सरका दिया। चाँद की हल्की रोशनी में उसकी दूध जैसी गोरी त्वचा चमक रही थी, जिसे देखकर समीर की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। उसने अपने हाथ अनन्या के ब्लाउज की डोरी तक पहुँचाए और एक झटके में उसे खोल दिया। जैसे ही कपड़े की बंदिशें ढीली हुईं, अनन्या के दोनों विशाल तरबूज बाहर निकल आए और समीर की आँखों के सामने नाचने लगे। उनके ऊपर मौजूद गुलाबी मटर अब पूरी तरह से अकड़ चुके थे, जैसे वे समीर के स्पर्श का इंतज़ार कर रहे हों। समीर ने बारी-बारी से उन दोनों को अपने हाथों में भर लिया और उन्हें धीरे-धीरे दबाने लगा, जिससे अनन्या के शरीर में उत्तेजना की एक नई लहर दौड़ गई और उसने समीर के बाल अपनी उंगलियों में जकड़ लिए।
अनन्या की सिसकारियां अब हवा में गूंजने लगी थीं और उसका शरीर समीर के करीब आने के लिए तड़प रहा था। समीर ने अपने चेहरे को नीचे झुकाया और उन मटरों को अपने मुँह में लेकर धीरे-धीरे चूसना शुरू किया। अनन्या ने अपनी कमर ऊपर की ओर उठाई और समीर का सिर अपने तरबूजों में और भी गहराई से दबा लिया। जैसे-जैसे समीर अपनी जीभ और होंठों का जादू चला रहा था, अनन्या की खाई में नमी बढ़ने लगी थी। वह पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और उसके भीतर की गर्मी अब बर्दाश्त के बाहर हो रही थी। समीर ने महसूस किया कि अब समय आ गया है कि वह अनन्या की निचली दुनिया की सैर करे, जहाँ उसकी खुशबू और गर्माहट उसे पुकार रही थी। उसने धीरे से अनन्या को घास के नरम बिस्तर पर लेटा दिया और उसकी साड़ी और पेटीकोट को पूरी तरह से उतारकर किनारे कर दिया।
अब अनन्या पूरी तरह से कुदरती अवस्था में समीर के सामने थी, उसका पूरा शरीर किसी सुंदर प्रतिमा की तरह लग रहा था। समीर की नज़रें उसकी जांघों के बीच मौजूद उस गहरी और घनी खाई पर जाकर टिक गईं, जहाँ काले बालों का एक छोटा सा जंगल फैला हुआ था। समीर ने अपनी उंगलियों को उस खाई के मुहाने पर रखा और महसूस किया कि वह कितनी फिसलन भरी और गर्म थी। जब उसने अपनी उंगली से खोदना शुरू किया, तो अनन्या ने अपनी जांघें फैला दीं और अपने होंठों को दांतों तले दबा लिया। उसकी खाई से निकलने वाला रस अब समीर की उंगलियों पर चिपक रहा था, जो इस बात का सबूत था कि वह पूरी तरह से तैयार हो चुकी थी। समीर ने अपनी उंगली को गहराई तक अंदर डाला और उसे एक लय में घुमाना शुरू किया, जिससे अनन्या का शरीर मछली की तरह तड़पने लगा।
समीर ने अब अपनी बेताबी पर काबू खो दिया और अपनी जींस उतारकर अपने विशाल खीरे को आज़ाद कर दिया। वह खीरा अब पूरी तरह से तन चुका था और किसी लोहे की छड़ की तरह सख्त महसूस हो रहा था। उसे देखकर अनन्या की आँखें फटी की फटी रह गईं और उसने धीरे से उस पर अपना हाथ फेरा। खीरे की गर्मी और उसकी मोटाई ने उसे अंदर तक झकझोर दिया था। समीर ने अनन्या के पैरों को अपने कंधों पर रखा और अपने खीरे के अगले हिस्से को उसकी गीली खाई के द्वार पर टिका दिया। जैसे ही उसने पहला धक्का दिया, खीरे का आधा हिस्सा अनन्या की तंग और गर्म खाई में समा गया। अनन्या के मुँह से एक चीख निकलते-निकलते रह गई और उसने समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए। उसकी खाई इतनी तंग थी कि समीर को आगे बढ़ने के लिए अपनी पूरी ताकत लगानी पड़ रही थी।
समीर ने अपनी गति धीमी रखी और धीरे-धीरे पूरे खीरे को अनन्या की खाई की गहराई तक पहुँचा दिया। जब वे दोनों पूरी तरह से एक-दूसरे में समा गए, तो कुछ पल के लिए दोनों शांत होकर उस अहसास को महसूस करने लगे। फिर समीर ने सामने से खोदना शुरू किया, हर धक्का अनन्या के गर्भाशय तक महसूस हो रहा था। पार्क के उस एकांत में सिर्फ उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ और अनन्या की कराहें गूंज रही थीं। समीर की मेहनत अब रंग ला रही थी क्योंकि अनन्या अब पूरी तरह से लय में आ चुकी थी और वह भी नीचे से अपनी कमर ऊपर उठाकर समीर का साथ दे रही थी। हर बार जब समीर का खीरा बाहर निकलता और फिर पूरी ताकत से अंदर जाता, अनन्या के तरबूज हवा में उछलते और समीर उन्हें फिर से अपने हाथों में दबोच लेता।
खुदाई की यह प्रक्रिया अब अपनी चरम सीमा की ओर बढ़ रही थी। समीर ने स्थिति बदली और अनन्या को घुटनों के बल झुकाकर पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। पीछे से उसके भारी पिछवाड़े को देख कर समीर की उत्तेजना कई गुना बढ़ गई थी। उसने अनन्या के बालों को मुट्ठी में पकड़ा और पूरी ताकत से धक्के मारने लगा। अनन्या अब पूरी तरह से होश खो चुकी थी और वह बस ज़ोर-ज़ोर से समीर का नाम पुकार रही थी। उसके शरीर का हर हिस्सा अब पसीने से भीग चुका था और उसकी खाई में मची हलचल अब उसे उस बिंदु पर ले जा रही थी जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं थी। समीर ने भी महसूस किया कि उसका खीरा अब फटने वाला है और उसका रस निकलने के लिए बेताब है।
अंतिम कुछ धक्के इतने ज़ोरदार थे कि अनन्या का शरीर पूरी तरह से कांपने लगा और उसकी खाई ने समीर के खीरे को कसकर जकड़ लिया। तभी अनन्या का रस छूटना शुरू हुआ और वह पूरी तरह से निढाल होकर गिर पड़ी। समीर ने भी अपने आप को पूरी तरह से उसके भीतर खाली कर दिया, उसका गर्म रस अनन्या की खाई की दीवारों से टकराता हुआ अंदर तक भर गया। दोनों कुछ देर तक उसी अवस्था में लेटे रहे, उनकी सांसें अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। उस शांत रात में, बॉटनिकल गार्डन के उस कोने में, दो पुराने दोस्तों ने न केवल अपने शरीर बल्कि अपनी आत्माओं की प्यास को भी शांत किया था। अनन्या की आँखों में अब एक सुकून था और समीर के मन में एक नया जुड़ाव, जिसने उनके रिश्ते को हमेशा के लिए एक नई पहचान दे दी थी।