पुरानी सहेली की चु@@ई—>
शहर की उस भीड़भाड़ से दूर, समीर और नेहा उस पुराने पार्क के सबसे कोने वाले हिस्से में बैठे थे, जहाँ पेड़ों की घनी छाँव ने एक प्राकृतिक परदा बना रखा था। शाम का धुंधलका धीरे-धीरे गहरा रहा था और हवा में मिट्टी की एक सोंधी सी महक घुली हुई थी। समीर ने नेहा की ओर देखा, जो सालों बाद उसे मिली थी, लेकिन उसकी खूबसूरती में जैसे वक्त ठहर सा गया था। नेहा की गहरी आँखें और उसके चेहरे की मासूमियत अब एक परिपक्व आकर्षण में बदल चुकी थी। समीर का मन पुरानी यादों के भँवर में गोते लगा रहा था, लेकिन उसका ध्यान बार-बार नेहा के उभरते हुए बदन पर टिक जाता था।
नेहा ने आज एक तंग फिटिंग वाला कुर्ता पहना था, जो उसके शरीर के हर घुमाव को स्पष्ट रूप से उभार रहा था। समीर की नजरें उसके कुर्ते के नीचे छिपे उन भारी तरबूजों पर टिक गई थीं, जो उसकी हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। समीर ने महसूस किया कि नेहा के शरीर की बनावट अब पहले से कहीं ज्यादा कामुक हो गई थी। उसके चौड़े कूल्हे और पतली कमर का मेल किसी तराशी हुई मूर्ति जैसा लग रहा था। समीर के मन में एक अजीब सी हलचल होने लगी थी, उसके भीतर का सोया हुआ पुरुष अब धीरे-धीरे जाग रहा था और उसका खीरा उसकी पैंट के अंदर करवटें लेने लगा था।
बातों-बातों में समीर ने अपना हाथ धीरे से बेंच पर रखा, जहाँ नेहा का हाथ पहले से मौजूद था। जैसे ही उनकी उंगलियों का स्पर्श हुआ, नेहा के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसने अपना हाथ हटाया नहीं, बल्कि समीर की उंगलियों को अपनी उंगलियों में फंसा लिया। इस छोटे से स्पर्श ने उनके बीच की झिझक की दीवार को गिरा दिया था। समीर ने धीरे से नेहा के करीब खिसकते हुए उसके कान के पास फुसफुसाया, ‘नेहा, तुम आज भी उतनी ही हसीन हो जितनी स्कूल के दिनों में हुआ करती थी।’ नेहा की सांसें तेज हो गईं और उसने अपनी आँखें मूँद लीं, जैसे वह इस पल का बेसब्री से इंतजार कर रही हो।
समीर का हाथ अब नेहा के कंधों से फिसलते हुए उसकी पीठ पर आ गया था। वह उसकी मखमली त्वचा को महसूस कर सकता था। उसने देखा कि नेहा के चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी और चाहत के भाव थे। समीर ने धीरे-धीरे अपना हाथ आगे बढ़ाया और नेहा के एक तरबूज को हल्के से छुआ। नेहा के मुँह से एक दबी हुई आह निकली। समीर ने महसूस किया कि उसके तरबूज काफी सख्त और गर्म थे। उसने अपनी उंगलियों से उन तरबूजों के ऊपर मौजूद मटर को महसूस किया, जो अब उत्तेजना के कारण सख्त होकर कपड़े के ऊपर से ही अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे।
नेहा ने समीर की आँखों में देखते हुए उसके हाथ को अपने तरबूज पर और मजबूती से दबा दिया। समीर अब पूरी तरह से नियंत्रण खो चुका था। उसने नेहा के होंठों की मिठास को चखना शुरू किया और साथ ही उसके तरबूजों को मसलने लगा। नेहा की सिसकियाँ पार्क की खामोशी में गूंजने लगी थीं। समीर का हाथ अब नीचे की ओर बढ़ा और वह उसकी रेशमी खाई के पास पहुँचा। नेहा ने अपनी टाँगें थोड़ी फैला दीं, जिससे समीर को उसकी खाई तक पहुँचने में आसानी हुई। समीर ने महसूस किया कि उसकी खाई अब पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और रस से लबालब थी।
समीर ने अपनी उंगली से उसकी खाई को टटोलना शुरू किया। नेहा की कमर ऊपर की ओर उचकी और उसने समीर के बालों को कसकर पकड़ लिया। समीर की उंगली जैसे ही उस गहरी खाई के अंदर गई, नेहा के शरीर में एक जोरदार झटका लगा। वह जोर-जोर से हांफने लगी थी। समीर ने अपनी उंगलियों की गति बढ़ाई और उसकी खाई में उंगली से खुदाई करने लगा। नेहा की सिसकियाँ अब कराहों में बदल चुकी थीं। उसने समीर की पैंट की चैन खोली और उसके बाहर निकलते हुए कड़क खीरे को अपने कोमल हाथों में थाम लिया।
समीर का खीरा अब पूरी तरह से तैयार था और नेहा के हाथों की गर्मी उसे और भी उत्तेजित कर रही थी। नेहा ने धीरे से अपना सिर नीचे झुकाया और समीर के खीरे को अपने मुँह में ले लिया। समीर की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा, वह नेहा के इस अंदाज का कायल हो गया था। नेहा जिस तरह से खीरा चूस रही थी, समीर को लग रहा था कि उसका रस अभी निकल जाएगा। उसने नेहा को रोका और उसे बेंच पर लेटा दिया। अब समय था कि उस गहरी और प्यासी खाई की असली खुदाई शुरू की जाए।
समीर ने नेहा की टाँगों को अपने कंधों पर रखा और अपने खीरे के अगले हिस्से को उसकी खाई के मुहाने पर टिकाया। नेहा ने उसे अंदर आने का इशारा किया। जैसे ही समीर ने एक जोरदार धक्का दिया, उसका आधा खीरा नेहा की तंग खाई के अंदर समा गया। नेहा के मुँह से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि बेतहाशा आनंद की थी। समीर ने धीरे-धीरे सामने से खोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ नेहा के तरबूज हवा में उछल रहे थे और उनके टकराने की आवाज समीर को और भी पागल कर रही थी।
खुदाई की गति अब बढ़ चुकी थी। समीर पूरी ताकत से अपने खीरे को नेहा की खाई की गहराइयों तक पहुँचा रहा था। नेहा भी नीचे से पूरा साथ दे रही थी, वह अपनी कमर को ऊपर उठाकर समीर के हर धक्के का स्वागत कर रही थी। पार्क का वह कोना उनकी उत्तेजित आवाजों और जिस्मों के टकराने की आवाज से भर गया था। समीर ने अब नेहा को घुमाया और उसे घुटनों के बल लाकर पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। इस पोजीशन में उसका खीरा नेहा की खाई के सबसे अंतिम छोर तक पहुँच रहा था, जिससे नेहा बेहाल हो रही थी।
नेहा की हालत अब देखने लायक थी, उसका पूरा शरीर पसीने से तरबतर था और उसकी आँखें चढ़ी हुई थीं। वह बार-बार ‘समीर… और तेज… और अंदर…’ चिल्ला रही थी। समीर भी अपने चरम पर था। उसे महसूस हो रहा था कि अब उसका रस निकलने वाला है। उसने नेहा की कमर को मजबूती से पकड़ा और खुदाई की गति को अपनी अंतिम सीमा तक पहुँचा दिया। कुछ ही पलों के बाद, समीर के खीरे ने गर्म रस की फुहारें नेहा की खाई के अंदर छोड़ दीं। उसी वक्त नेहा का भी रस छूटना शुरू हुआ और वह समीर की बाहों में ढीली पड़ गई।
दोनों काफी देर तक एक-दूसरे से लिपटे रहे, उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। नेहा का सिर समीर की छाती पर था और समीर उसके बिखरे हुए बालों को सहला रहा था। उस वीरान पार्क में हुई इस गहन खुदाई ने उन दोनों के बीच के सालों पुराने फासले को मिटा दिया था। नेहा ने मुस्कुराते हुए समीर की ओर देखा, उसके चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि और सुकून था। समीर को अहसास हुआ कि यह सिर्फ शारीरिक जरूरत नहीं थी, बल्कि उनकी रूहों का एक मिलन था जिसने उन्हें हमेशा के लिए एक-दूसरे के करीब ला दिया था।