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प्यासी भाभी की चु@@ई


प्यासी भाभी की चु@@ई—>

शहर की भीड़भाड़ से दूर उस बड़े से घर में समीर पिछले दो महीनों से अपने बड़े भाई और भाभी कविता के साथ रह रहा था। समीर की उम्र लगभग बाईस साल थी और वह कॉलेज की पढ़ाई के लिए यहाँ आया था, जबकि कविता बमुश्किल अट्ठाइस की थी। समीर की आँखें अक्सर अपनी भाभी के ढलते हुए यौवन और उनकी सुडौल काया पर टिक जाती थीं, जिसे वह चाहकर भी नजरअंदाज नहीं कर पाता था। कविता स्वभाव से बहुत ही सरल और ममतामयी थीं, लेकिन उनके भीतर एक अनकही प्यास छिपी थी जो उनके पति के अक्सर काम के सिलसिले में शहर से बाहर रहने के कारण बढ़ती जा रही थी। घर का शांत माहौल और दोनों का साथ होना धीरे-धीरे एक ऐसी चिंगारी को जन्म दे रहा था, जो जल्द ही एक बड़ी आग में बदलने वाली थी।

कविता भाभी का शरीर किसी नक्काशीदार मूर्ति की तरह था, उनके शरीर के हर हिस्से में एक अजीब सा खिंचाव था जो समीर को अपनी ओर आकर्षित करता था। जब भी वह साड़ी पहनकर रसोई में काम करती थीं, तो उनके रेशमी साड़ी के नीचे दबे हुए भारी और गोल मटोल तरबूज साफ नजर आते थे, जो हर हरकत के साथ धीरे-धीरे हिलते थे। उनके तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर जैसे उभार समीर की धड़कनों को तेज कर देते थे। भाभी का पिछवाड़ा भी काफी चौड़ा और गदगद था, जो साड़ी के महीन कपड़े में से अपनी मौजूदगी का अहसास कराता रहता था। समीर अक्सर उन्हें पीछे से निहारता और कल्पना करता कि उस भारी पिछवाड़े की बनावट कितनी कोमल और उत्तेजक होगी, जिसे छूने मात्र से ही मन में तूफान उठ खड़ा हो।

समीर और कविता के बीच धीरे-धीरे एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव होने लगा था, जहाँ बातें सिर्फ पढ़ाई और खाने तक सीमित नहीं रही थीं। रात के सन्नाटे में जब पूरा मोहल्ला सो जाता था, तब दोनों ड्राइंग रूम में बैठकर घंटों बातें करते थे, जिसमें कविता अपनी तन्हाई और अकेलेपन का जिक्र घुमा-फिराकर करती थीं। समीर उनकी बातों को बड़े ध्यान से सुनता और उनकी आँखों में झाँककर उस नमी को महसूस करता जो प्यार और स्पर्श की भूखी थी। उनके बीच एक अनकहा सा आकर्षण जन्म ले चुका था, जहाँ एक-दूसरे की मौजूदगी ही दिल की धड़कनें बढ़ा देती थी। हर बार जब समीर उनके करीब बैठता, तो कविता की साँसें थोड़ी तेज हो जाती थीं और उनकी साड़ी का पल्लू अक्सर उनके कंधों से फिसल जाया करता था।

एक रात जब बाहर हल्की ठंडी हवा चल रही थी, समीर किचन में पानी पीने गया जहाँ कविता पहले से ही खड़ी थीं। जैसे ही समीर उनके पास पहुँचा, उनका हाथ गलती से कविता की कमर से टकरा गया, जिससे दोनों के शरीर में बिजली सी दौड़ गई। कविता ने तुरंत अपनी निगाहें नीचे झुका लीं, लेकिन उन्होंने खुद को पीछे नहीं हटाया, बल्कि समीर के स्पर्श का आनंद लेने लगीं। समीर ने हिम्मत जुटाकर उनके कंधे पर हाथ रखा और उन्हें अपनी ओर घुमाया, जहाँ कविता की आँखों में झिझक और मन का गहरा संघर्ष साफ दिख रहा था। उनकी आँखों में एक अजीब सी बेबसी थी, जो समीर से कह रही थी कि वह उन्हें अपनी बाहों में भर ले और उनकी बरसों की तन्हाई को मिटा दे।

समीर ने धीरे से अपना हाथ भाभी के गालों पर फेरा और उनके होठों के करीब अपना चेहरा ले गया, जहाँ उनकी गर्म साँसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं। पहला स्पर्श इतना जादुई था कि कविता के शरीर में कंपन होने लगा और उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। समीर ने धीरे से उनके होठों का रस पीना शुरू किया और कविता ने भी अपनी बाहें समीर के गले में डाल दीं। यह चुंबन एक प्यासे की प्यास बुझाने जैसा था, जिसमें सालों की तड़प और इच्छा घुली हुई थी। समीर के हाथ अब कविता की पीठ पर रेंग रहे थे और धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ते हुए उनके भारी पिछवाड़े को सहलाने लगे, जिससे कविता के मुँह से एक धीमी आह निकल गई जो पूरे किचन में गूँज उठी।

उत्तेजना धीरे-धीरे अपनी सीमाएं लांघ रही थी और समीर ने कविता को गोद में उठाकर बेडरूम की ओर कदम बढ़ाए। बिस्तर पर लिटाते ही समीर ने उनकी साड़ी के पल्लू को हटा दिया, जिससे उनके बड़े और रसीले तरबूज पूरी तरह सामने आ गए। समीर ने अपनी जीभ से उनके तरबूजों के बीच की खाई को चाटना शुरू किया और फिर धीरे से एक मटर को अपने मुँह में लेकर चूसने लगा। कविता बिस्तर पर तड़प रही थीं, उनकी उंगलियां समीर के बालों में फंसी हुई थीं और वह बार-बार समीर का नाम लेकर कराह रही थीं। समीर ने नीचे झुककर उनकी खाई के पास उगे कोमल बालों को सहलाया और अपनी उंगली से खोदना शुरू किया, जिससे कविता का शरीर धनुष की तरह तन गया।

कविता की खाई अब पूरी तरह गीली हो चुकी थी और वह समीर के गर्म खीरे के स्पर्श के लिए बेताब थीं। समीर ने अपने कपड़े उतारे और अपना लंबा और सख्त खीरा भाभी के सामने पेश किया, जिसे देखकर कविता की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने तुरंत समीर के खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे बड़े चाव से चूसने लगीं, जैसे कोई कीमती फल चख रही हों। खीरा चूसने की आवाज और कविता के गले से निकलने वाली सिसकियां समीर को पागल कर रही थीं। समीर ने उन्हें बिस्तर पर सीधा लिटाया और सामने से खुदाई करने की स्थिति में आ गया। जैसे ही उसने अपने खीरे का सिरा भाभी की तंग खाई पर टिकाया, कविता ने अपनी आँखें जोर से बंद कर लीं और समीर को कसकर पकड़ लिया।

समीर ने एक झटके में अपना पूरा खीरा कविता की तंग खाई के भीतर उतार दिया, जिससे एक जोरदार आवाज हुई और कविता के मुँह से एक चीख निकल गई। शुरुआत में थोड़ी तकलीफ हुई, लेकिन धीरे-धीरे कविता को उस खुदाई में मजा आने लगा और वह खुद भी अपनी कमर ऊपर उठाकर समीर का साथ देने लगीं। समीर पूरी ताकत से खुदाई कर रहा था, हर धक्के के साथ उसका खीरा भाभी की गहराई को नाप रहा था और उनके तरबूज बुरी तरह ऊपर-नीचे उछल रहे थे। कमरे में सिर्फ जिस्मों के टकराने की आवाज और दोनों की भारी साँसें सुनाई दे रही थीं। समीर कभी उनके होठों को चूसता तो कभी उनके मटरों को अपने दांतों से हल्के से काटता, जिससे उत्तेजना का स्तर सातवें आसमान पर पहुँच गया था।

कुछ देर सामने से खुदाई करने के बाद, समीर ने कविता को पलट दिया और उन्हें पिछवाड़े से खोदने की स्थिति में ले आया। कविता के भारी पिछवाड़े के बीच से उनकी खाई का गुलाबी हिस्सा समीर को आमंत्रित कर रहा था। समीर ने पीछे से अपना खीरा फिर से उनकी गहराई में डाल दिया और अब धक्कों की रफ्तार और भी तेज हो गई थी। कविता की आहें अब कराहों में बदल चुकी थीं और वह बार-बार कह रही थीं, ‘समीर, मुझे और जोर से खोदो, आज मेरा सारा रस निकाल दो।’ समीर ने उनके बालों को पीछे से पकड़ा और पूरी ताकत से खुदाई जारी रखी। भाभी का शरीर पसीने से लथपथ था और उनकी आँखों में एक अलग ही नशा छाया हुआ था, जो इस खुदाई के चरम सुख की गवाही दे रहा था।

काफी देर तक चली इस जबरदस्त खुदाई के बाद, समीर को महसूस हुआ कि उसका रस अब छूटने वाला है। ठीक उसी समय कविता का शरीर भी बुरी तरह कांपने लगा और उनकी खाई के भीतर से गर्म रस निकलने लगा। समीर ने अपने खीरे को गहराई तक घुसाया और अपना सारा गर्म रस भाभी की खाई के भीतर छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े, उनकी साँसें बहुत तेज चल रही थीं और पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था। कविता की हालत ऐसी थी जैसे वह किसी गहरी नींद से जागी हों, उनके चेहरे पर एक असीम संतुष्टि और सुकून था जो उन्होंने वर्षों से महसूस नहीं किया था। समीर ने उन्हें माथे पर चूमा और दोनों उसी अवस्था में एक-दूसरे की बाहों में सो गए।

अगली सुबह जब सूरज की किरणें कमरे में आईं, तो कविता ने खुद को समीर की बाहों में सुरक्षित पाया। उनके मन में अब कोई शर्म या झिझक नहीं थी, बल्कि एक नया अहसास था कि उन्होंने अपने जीवन की उस खाली जगह को भर लिया है जो अब तक अधूरी थी। समीर ने उनकी आँखों में देखा और मुस्कुराया, जिसके जवाब में कविता ने उसे कसकर गले लगा लिया। उस रात की खुदाई ने न केवल उनके जिस्मों को जोड़ा था, बल्कि उनकी आत्माओं के बीच के फासले को भी हमेशा के लिए खत्म कर दिया था। अब वह घर सिर्फ चार दीवारों का ढांचा नहीं था, बल्कि उनकी गुप्त इच्छाओं और गहरे प्यार का एक खूबसूरत मंदिर बन चुका था, जहाँ हर रात एक नई खुदाई की दास्तान लिखी जानी थी।

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