हम ननिहाल पहुंचे तो नानी ने दरवाजे पर खड़े होकर हमें गले लगाया, पूछ रही थीं – “कैसी रही यात्रा? थकी तो नहीं?” माँ मुस्कुरा रही थीं, लेकिन उनकी मुस्कान में वो छुपी हुई आग थी जो मैं अब समझ सकता था। चाय-पानी, मिठाई, सब चला। रात का खाना खाते वक्त भी बातें चलती रहीं – खेत का किस्सा छुपाकर, सिर्फ “रास्ते में थक गए थे” कहकर टाल दिया। लेकिन मेरी नजर माँ पर बार-बार जा रही थी, और उनकी नजर मुझ पर। हर बार जब माँ झुककर प्लेट उठातीं, उनका पल्लू सरकता और स्त@@@#@ी की गहराई झांकती, तो मेरा दिल जोर से धड़कता। माँ भी जानती थीं कि मैं देख रहा हूं, लेकिन वो बस हल्की मुस्कान देकर नजरें फेर लेतीं।
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रात गहरी होने लगी। नानी ने कहा, “आजकल घर छोटा है, एक कमरा खाली है। तुम दोनों उसी में सो जाना। बेटा पास में रहेगा तो बहू को डर नहीं लगेगा।” माँ ने हल्का सा विरोध किया, “नहीं अम्मा, मैं अकेले…” लेकिन नानी ने टाल दिया। हम दोनों मेरे पुराने कमरे में चले गए। छोटा सा कमरा, एक पलंग, पुरानी अलमारी, और खिड़की से चांदनी आ रही थी। दरवाजा बंद करते ही माँ ने लंबी सांस ली। हम बिस्तर पर लेट गए, माँ की साड़ी अभी भी वही गंदी वाली थी लेकिन अब वो बदल चुकी थीं – हल्की नीली साड़ी, टाइट ब्लाउज। “बेटा… आज का दिन…” उन्होंने धीरे से कहा। मैंने जवाब दिया, “माँ… वो सब भूल जाएं।” लेकिन बातें चलती रहीं – मालिक के बारे में, खेत के बारे में, और धीरे-धीरे हमारी आवाजें धीमी होती गईं। “सो जा बेटा,” माँ ने कहा, और हम दोनों करवट बदलकर लेट गए।
लेकिन नींद कहाँ? मेरा मन तूफान में था। माँ की सांसें सुनाई दे रही थीं, लेकिन वो भी सोई नहीं लग रही थीं। मैं करवट बदला, फिर बदला। आखिरकार, हिम्मत करके मैंने अपना हाथ बढ़ाया और माँ की कमर पर रख दिया। उनकी साड़ी का किनारा हल्का सा ऊपर था। माँ का शरीर हल्का सा कांपा, लेकिन वो चुप रहीं। मैंने सोचा वो सो गई हैं। लेकिन नहीं। वो जाग रही थीं, बस सोने का नाटक कर रही थीं। मैंने धीरे से हाथ सरकाया, उनकी पेट पर, फिर ऊपर। उनकी सांसें थोड़ी तेज हो गईं, लेकिन आंखें बंद।
मेरी हिम्मत बढ़ी। मैंने हाथ और ऊपर किया, उनके ब्लाउज के नीचे सरकाया। उनके स्त@@@#@ गर्म थे, नि@@@#@ सख्त। मैंने हल्के से दबाया। माँ की सांस रुक गई, लेकिन फिर सामान्य हो गई। “माँ…” मैंने मन में सोचा, “तुम जाग रही हो ना?” लेकिन मैं रुका नहीं। हाथ नीचे सरका, उनकी साड़ी के अंदर। उनकी चु@@@#@ पहले से गीली थी। उंगली छूते ही माँ का शरीर सिहर उठा, लेकिन वो फिर भी नाटक करती रहीं। मैंने धीरे से उंगली अंदर डाली। “आह…” एक बहुत हल्की सी कराह निकली उनके मुंह से, लेकिन आंखें बंद। मैंने उंगली अंदर-बाहर करना शुरू किया, धीरे-धीरे, उनकी गर्मी महसूस करते हुए। माँ की सांसें अब तेज हो गईं, पेट ऊपर-नीचे हो रहा था। “उफ्फ…” एक और कराह निकली, लेकिन वो अभी भी आंखें बंद रखे हुए थीं।
अब मैं रुक नहीं सकता था। मैंने उनकी साड़ी पूरी ऊपर की, पैं@@@#@ खींचकर उतारी। माँ की चु@@@#@ पूरी तरह खुली, चमक रही थी, झा@@@#@ हल्की-हल्की गीली। मैंने पैंट उतारी, लन@@@#@ बाहर निकाला – पूरा खड़ा, नसें फड़क रही थीं, टिप पहले से गीली। मैं माँ के ऊपर चढ़ गया, लेकिन धीरे से। लन@@@#@ उनकी चु@@@#@ पर रगड़ा। माँ की टांगें हल्की सी फैलीं, जैसे सोते-सोते ही। मैंने धीरे से अंदर डाला। “आह्ह्ह…” माँ की कराह अब थोड़ी जोर की, लेकिन आंखें अभी भी बंद। “बेटा… तेरा लन@@@#@… मेरी चु@@@#@ में…” उन्होंने फुसफुसाया, आंखें खोलकर, लेकिन नाटक जारी।
मैंने धक्के देने शुरू किए। धीरे-धीरे। हर धक्के पर माँ की चु@@@#@ मेरे लन@@@#@ को चूस रही थी। “ओह्ह… राहुल… तू अपनी माँ को चो@@@#@ कर रहा है… आह्ह… कितना गहरा… मेरी चु@@@#@ तेरे लन@@@#@ से भर गई… हां… चो@@@#@ कर… लेकिन धीरे… कोई सुन न ले…” अब नाटक खत्म। माँ ने अपनी टांगें मेरी कमर पर लपेट लीं। “आह्ह… हां… ऐसे ही… तेरे लन@@@#@ का सुपारा मेरी चु@@@#@ की गहराई में… ओह्ह… मेरे स्त@@@#@ दबा… नि@@@#@ चूस… आह्ह… तेरी माँ तेरे लन@@@#@ पर उछल रही है… देख… मेरी चु@@@#@ कैसे तेरे लन@@@#@ को निचोड़ रही है… चो@@@#@ कर मुझे बेटा… अपनी माँ की चु@@@#@ को जोर से चो@@@#@ कर… आह्ह… ओह्ह… रस बह रहा है… मेरी चु@@@#@ से… तेरे लन@@@#@ पर चिपक रहा है…”
मैं तेज हो गया। “माँ… तेरी चु@@@#@… कितनी गर्म… ओह्ह… मैं तेरी चु@@@#@ में रस डालूंगा… अंदर ही… हां… ले… ले मेरे लन@@@#@ की पूरी ताकत…” माँ ने मेरे बाल पकड़े, “हां… अंदर छोड़… अपनी माँ की चु@@@#@ भर दे… आह्ह… मैं झड़ रही हूं… तेरे लन@@@#@ पर… आआआह्ह्ह्ह… ऑर्ग@@@#@… रस निकल रहा है… ओह्ह… मेरी चु@@@#@ तेरे लन@@@#@ से कांप रही है… और तेज… बेटा… माँ को और जोर से चो@@@#@ कर… मेरी चु@@@#@ फाड़ दो… आह… तेरे लन@@@#@ की गर्मी महसूस हो रही है… हां… अंदर… पूरा अंदर छोड़…”
हम दोनों एक साथ कांपे। मेरा रस उनकी चु@@@#@ में गरम-गरम बहा। माँ मेरे सीने पर गिर पड़ीं, सांसें भारी। “ये… हमारा राज… अब कभी नहीं टूटेगा…” लेकिन तभी बाहर से नानी की खांसने की आवाज आई। हम दोनों सांस रोके लेट गए। माँ ने मेरे कान में फुसफुसाया – “कल सुबह… फिर से… लेकिन धीरे… कोई नहीं जानना चाहिए…” मैंने हल्का सा सिर हिलाया। माँ ने मुझे चु@@@#@ दिया, गहरा, लंबा, जीभ अंदर घुसाकर। फिर हम दोनों करवट लेकर लेट गए, लेकिन हाथ एक-दूसरे पर थे। नींद आने में देर लगी, क्योंकि मन में अगली रात की कल्पना चल रही थी।
अगले दिन सुबह-सुबह माँ ने मुझे जगाया। “बेटा… उठ… चाय पी ले…” लेकिन उनकी आंखों में वही चमक थी। हम दोनों जानते थे – ये सफर अभी खत्म नहीं हुआ। गांव में दिन बीतते गए, लेकिन रातें हमारी हो गईं। हर रात माँ की चु@@@#@ मेरे लन@@@#@ का इंतजार करती, और हर सुबह हम नई कहानी लिखते। लेकिन वो राज हमेशा हमारा रहा – सिर्फ हम दोनों का।