नेहा मैडम की उम्र लगभग बत्तीस साल थी, और उनकी शारीरिक बनावट ऐसी थी कि किसी भी पुरुष का मन डोल जाए। उनका शरीर दूध जैसा सफेद और भरा हुआ था, जो अक्सर एक पतली शिफॉन की साड़ी में लिपटा रहता था। समीर, जो उनसे पिछले दो महीनों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था, हमेशा उनके पढ़ाने के तरीके से ज्यादा उनके शरीर के उतार-चढ़ाव पर ध्यान देता था। उस दोपहर कमरे में सन्नाटा था और केवल कूलर की हल्की आवाज गूंज रही थी, जिससे माहौल में एक अजीब सी गर्माहट और नमी घुली हुई थी। समीर मेज के दूसरी तरफ बैठा नेहा मैडम के हाथ की हरकत देख रहा था, जो पेन से कुछ लिख रही थीं, लेकिन उसकी निगाहें उनके ब्लाउज से झांकते सफेद तरबूजों पर टिकी थीं।
नेहा मैडम के तरबूज इतने बड़े और सुडौल थे कि उनके ब्लाउज के बटन हमेशा तनाव में महसूस होते थे। जब भी वह सांस लेतीं, वे तरबूज ऊपर-नीचे होते और समीर की धड़कनें तेज कर देते। उनके तरबूजों के बीच की गहरी घाटी साफ नजर आ रही थी, जिसमें पसीने की एक नन्हीं बूंद धीरे-धीरे नीचे की ओर सरक रही थी। नेहा को पता था कि समीर उन्हें देख रहा है, लेकिन उन्होंने कभी टोकने की कोशिश नहीं की, शायद उनके मन के किसी कोने में भी उस जवान लड़के के प्रति एक अनकही प्यास दबी हुई थी। उनकी कमर का घेरा और उनके चौड़े कूल्हे जब साड़ी के पीछे से लचकते थे, तो समीर का खीरा अपने आप कड़ा होने लगता था और उसकी पैंट में हलचल होने लगती थी।
उस दिन पढ़ाई में किसी का मन नहीं लग रहा था, वातावरण में कामुकता का एक भारी पर्दा लटका हुआ था। समीर ने धीरे से अपना हाथ मेज पर आगे बढ़ाया और ‘अनजाने’ में नेहा के हाथ को छू लिया। नेहा की त्वचा रेशम जैसी मुलायम और गर्म थी, जिसे छूते ही समीर के शरीर में बिजली सी दौड़ गई। नेहा ने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा, बल्कि उनकी नजरें समीर की आंखों में धंस गईं, जिनमें गहरी हवस और चाहत साफ झलक रही थी। समीर की सांसें अब भारी होने लगी थीं और उसे अपने खीरे में जबरदस्त तनाव महसूस हो रहा था, जो अब आजाद होने के लिए मचल रहा था। नेहा ने एक गहरी आह भरी, जिससे उनके तरबूज और भी ज्यादा उभर कर सामने आ गए और उनके मटर जैसे हिस्से ब्लाउज के कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब दिखने लगे।
नेहा ने धीरे से कुर्सी पीछे खिसकाई और समीर के पास आकर खड़ी हो गई, जिससे उसकी खुशबू समीर के नथुनों में भर गई। समीर ने हिम्मत जुटाई और अपना हाथ नेहा की पतली कमर पर रख दिया, जहां साड़ी और ब्लाउज के बीच का हिस्सा नग्न था। जैसे ही समीर की उंगलियों ने नेहा की गर्म त्वचा को छुआ, वह सिहर उठीं और उनके मुंह से एक दबी हुई कराह निकल गई। समीर ने उन्हें अपनी ओर खींचा और नेहा उनके करीब आती चली गईं, उनका भारी शरीर समीर के चेहरे के बिल्कुल सामने था। अब दोनों के बीच कोई दूरी नहीं बची थी, समीर ने अपने चेहरे को उनके तरबूजों के बीच की खाई में छिपा लिया और उनकी भीनी-भीनी खुशबू को महसूस करने लगा। नेहा ने समीर के सिर को मजबूती से पकड़ लिया और उसे अपने शरीर में भींच लिया।
समीर ने अब धीरे-धीरे नेहा की साड़ी के पल्लू को उनके कंधे से नीचे गिरा दिया, जिससे उनके तरबूजों का आधा हिस्सा बिना किसी रुकावट के समीर की नजरों के सामने आ गया। उसने अपने हाथों से उन भारी तरबूजों को सहलाना शुरू किया, जो बहुत ही कोमल और गदबदे थे। नेहा की सांसें अब तेज हो चुकी थीं और वह समीर के बालों में अपनी उंगलियां फिरा रही थीं। समीर ने अपने मुंह से नेहा के ब्लाउज के ऊपर से ही उनके मटर को चूसना शुरू किया, जिससे नेहा का शरीर धनुष की तरह तन गया। वह बार-बार समीर का नाम पुकार रही थीं और उनकी आवाज में एक अजीब सी तड़प थी। समीर ने महसूस किया कि नेहा की खाई अब धीरे-धीरे गीली हो रही है और वह खुदाई के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
समीर ने नीचे झुककर नेहा की साड़ी को ऊपर उठाना शुरू किया, जिससे उनके गोरे और भारी पैर दिखाई देने लगे। नेहा की जांघों के बीच बाल बहुत कम थे और उनकी खाई से निकलता हुआ प्राकृतिक रस अब उनकी जांघों तक बहने लगा था। समीर ने अपना हाथ वहां ले जाकर उनकी खाई को टटोलना शुरू किया, जो बहुत ही गर्म और फिसलन भरी थी। जब समीर ने अपनी उंगली से खाई को थोड़ा गहरा खोदा, तो नेहा के मुंह से एक जोर की चीख निकली और उन्होंने समीर के कंधे पर अपने नाखून गड़ा दिए। समीर अब और इंतजार नहीं कर सकता था, उसने जल्दी से अपनी पैंट उतारी और अपना फन फैलाए हुए कड़े खीरे को बाहर निकाला, जो अब पूरी तरह से सुर्ख लाल हो चुका था और आकार में काफी बड़ा लग रहा था।
नेहा ने जैसे ही समीर के उस लंबे और मोटे खीरे को देखा, उनकी आंखें फटी की फटी रह गई और उन्होंने धीरे से उसे अपने हाथ में पकड़ लिया। खीरे की गर्मी और उसकी कठोरता ने नेहा को पागल कर दिया था। उन्होंने बिना देरी किए अपने घुटनों के बल बैठकर समीर के खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे चूसना शुरू कर दिया। समीर को ऐसा लगा जैसे वह स्वर्ग में पहुंच गया हो, नेहा का मुंह बहुत गर्म था और उनकी जीभ खीरे के हर कोने को चाट रही थी। समीर ने नेहा के बाल पकड़ लिए और अपने खीरे को उनके मुंह में गहराई तक डालने लगा। कुछ देर तक खीरा चूसने के बाद नेहा ने उसे अपनी खाई के पास ले जाने का इशारा किया, क्योंकि अब उनकी सहनशक्ति जवाब दे रही थी।
समीर ने नेहा को मेज पर लिटा दिया और उनकी दोनों टांगों को अपने कंधों पर रख लिया, जिससे उनकी गहरी खाई पूरी तरह से खुल गई। उसने अपने खीरे की नोक को खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से एक धक्का दिया। जैसे ही खीरा थोड़ा अंदर गया, नेहा ने अपना पिछवाड़ा ऊपर की ओर झटका और उनकी आंखों से आंसू निकल आए। समीर ने कुछ देर रुककर उन्हें शांत होने दिया और फिर एक गहरा और जोरदार धक्का मारा, जिससे उसका पूरा खीरा नेहा की तंग खाई में समा गया। नेहा के मुंह से एक लंबी आह निकली और उन्होंने समीर को कसकर जकड़ लिया। अब कमरे में केवल खीरे के खाई के अंदर जाने और बाहर आने की ‘चप-चप’ की आवाजें गूंज रही थीं, जो बहुत ही उत्तेजक लग रही थीं।
समीर अब सामने से खुदाई की गति बढ़ाने लगा था, हर धक्के के साथ नेहा के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे। समीर ने उनके मटरों को अपने दांतों से हल्का सा काटा, जिससे नेहा को दर्द और आनंद का एक मिला-जुला अहसास हुआ। वे दोनों पसीने से पूरी तरह तरबतर हो चुके थे और उनका पसीना आपस में मिलकर एक नई फिसलन पैदा कर रहा था। नेहा अब पूरी तरह से लय में आ चुकी थीं और वह खुद भी नीचे से अपने कूल्हे ऊपर की ओर उछालकर समीर का साथ दे रही थीं। खुदाई इतनी गहरी थी कि समीर को महसूस हो रहा था कि उसका खीरा नेहा के गर्भ के द्वार को छू रहा है। नेहा बार-बार कह रही थीं, ‘और जोर से समीर… और अंदर तक खोदो… मुझे पूरा खत्म कर दो।’
कुछ देर बाद समीर ने नेहा को घुमाया और उन्हें पिछवाड़े से खोदने के लिए डॉगी स्टाइल में कर दिया। नेहा का भारी पिछवाड़ा अब समीर के सामने था, जो किसी बड़े पहाड़ की तरह लग रहा था। समीर ने पीछे से फिर से अपना खीरा नेहा की खाई में डाल दिया और उनके कूल्हों को पकड़कर जोर-जोर से झटके देने लगा। इस पोजीशन में खुदाई और भी गहरी हो रही थी और समीर का खीरा नेहा की खाई की दीवारों को रगड़ता हुआ अंदर-बाहर हो रहा था। नेहा अपने हाथ मेज पर टिकाए हुए केवल कराह रही थीं और उनका पूरा शरीर हर धक्के के साथ कांप रहा था। समीर ने उनके दोनों तरबूजों को पीछे से पकड़ लिया और उन्हें बुरी तरह मसलने लगा, जिससे नेहा का रस और भी तेजी से निकलने लगा।
अब दोनों अपनी चरम सीमा के करीब पहुंच चुके थे। समीर के खीरे से अब रस निकलने वाला था और नेहा की खाई भी पूरी तरह से रस से लबालब भर चुकी थी। समीर ने अपनी गति को और तेज कर दिया और पागलों की तरह धक्के मारने लगा। नेहा के शरीर में एक तेज कंपन शुरू हुआ और उन्होंने अपना रस छोड़ना शुरू कर दिया, उनकी खाई की मांसपेशियां समीर के खीरे को कसकर जकड़ने लगीं। उसी पल समीर ने भी अपना सारा गर्म रस नेहा की गहराई में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए मेज पर ही ढेर हो गए, उनकी सांसें इतनी तेज थीं कि जैसे किसी ने दौड़ लगाई हो। नेहा ने समीर के माथे को चूमा और दोनों कुछ देर तक उसी अवस्था में शांत पड़े रहे, उस सुखद थकान का आनंद लेते हुए जो उन्हें इस खुदाई के बाद मिली थी।
थोड़ी देर बाद जब उनकी सांसें सामान्य हुईं, तो नेहा ने मुस्कुराते हुए समीर की ओर देखा और उसके चेहरे पर बिखरे बालों को हटाया। समीर को अपनी मैडम के साथ इस तरह के जुड़ाव का अहसास बहुत अनोखा लग रहा था। उनके शरीर की हलचल अब शांत थी, लेकिन मन में एक नई संतुष्टि का अहसास था। नेहा ने धीरे से अपने कपड़े ठीक किए और समीर को भी कपड़े पहनने का इशारा किया। कमरे में अभी भी उस खुदाई की गंध और प्रेम का अहसास बाकी था। उस दिन की पढ़ाई तो नहीं हो पाई, लेकिन उन दोनों ने जीवन का एक ऐसा पाठ सीखा था जो किताबों में नहीं मिलता। समीर ने नेहा के हाथ को चूमकर विदा ली, यह जानते हुए कि अब उनकी यह गुप्त मुलाकातें अक्सर हुआ करेंगी।