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रिया दीदी और मेरी कमरे वाली पहली खुदाई


समीर अपने ट्यूशन के बाद घर जाने की तैयारी कर रहा था, तभी रिया दीदी कमरे में चाय लेकर आईं और उनके आने से कमरे का माहौल अचानक से बदल गया। उनका गुलाबी रंग का पारदर्शी सूट उनके बदन से इस तरह चिपका था जैसे किसी ने उनके शरीर पर ही रंग उड़ेल दिया हो और उनकी हर हरकत से बदन का उभार साफ दिख रहा था। उनके चेहरे पर एक हल्की सी रहस्यमयी मुस्कान थी जो समीर के दिल की धड़कनें तेज कर रही थी और वह चाहकर भी अपनी नजरें उनके चेहरे से नीचे नहीं हटा पा रहा था। समीर ने उनके भीगे हुए बालों और गर्दन पर चमकती पसीने की नन्हीं बूंदों को देखा तो उसका गला प्यास से सूखने लगा और उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी और हलचल पैदा होने लगी जो उसे काबू से बाहर कर रही थी।

रिया दीदी के बदन का ढांचा किसी अनुभवी मूर्तिकार की बनाई बेहतरीन कृति जैसा था, उनके सूट के साये के नीचे दबे हुए भारी और गोल मटोल तरबूज हर सांस के साथ ऊपर नीचे हो रहे थे। सूट के पतले और महीन कपड़े से उन सफेद तरबूजों के ऊपर मौजूद नन्हे मटर साफ झलक रहे थे, जो समीर की आंखों को अपनी ओर चुंबकीय शक्ति की तरह खींच रहे थे और उसे मदहोश कर रहे थे। रिया दीदी ने जब झुककर मेज पर चाय का कप रखा, तो उनके सूट का गला थोड़ा और गहरा हो गया और उन गोरे तरबूजों के बीच की गहरी लकीर समीर को किसी तिलिस्म की तरह नजर आने लगी जिसमें वह डूब जाना चाहता था। उनका सुडौल शरीर और चौड़े कूल्हे उस सूट में एक अलग ही कयामत ढा रहे थे जिसे देखकर समीर के शरीर का तापमान तेजी से बढ़ने लगा था।

समीर ने अपनी नजरें चुराने की बहुत कोशिश की, लेकिन रिया दीदी की आंखों में भी आज एक अलग ही शरारत भरी चमक थी, जैसे वे समीर के मन में चल रहे तूफ़ान को बखूबी पढ़ रही हों। रिया दीदी बिना कुछ कहे उसके बगल में सोफे पर बैठ गईं और धीरे से अपना कोमल हाथ समीर के हाथ पर रख दिया, उनकी उंगलियों का वह रेशमी स्पर्श समीर के पूरे शरीर में बिजली के करंट की तरह दौड़ने लगा। एक अनकहा जज्बात और गहरी खामोशी उन दोनों के बीच में एक दीवार की तरह खड़ी थी, जहां न कोई शब्द थे और न ही कोई वादा, बस एक गहरी और तड़पती हुई शारीरिक प्यास थी जिसे दोनों शायद बहुत समय से अपने भीतर दबाए बैठे थे। समीर को अपनी रगों में खून का बहाव तेज होता महसूस हो रहा था और उसका ध्यान बार-बार रिया के उन मादक उभारों पर जा रहा था।

झिझक के बावजूद समीर ने हिम्मत जुटाई और रिया दीदी के कंधे पर अपना हाथ रखा और उन्हें धीरे से अपनी ओर खींच लिया, रिया दीदी ने भी कोई विरोध नहीं किया बल्कि अपनी झील सी गहरी आंखें मूंद लीं। धीरे-धीरे समीर के होंठ उनकी गर्दन की ओर बढ़ने लगे, जहां से मोगरे की धीमी खुशबू आ रही थी और रिया की सांसों की गर्मी अब समीर के चेहरे पर महसूस हो रही थी। जैसे ही समीर के कांपते हाथों ने उनके उभरे हुए भारी तरबूजों को पहली बार सहलाना शुरू किया, रिया दीदी के मुंह से एक धीमी सी मधुर सिसकी निकली, जिसने समीर के अंदर छिपे हुए बरसों के शांत तूफान को पूरी तरह से जगा दिया। उनका बदन अब समीर की बाहों में पिघलने लगा था और शर्म की जगह अब बेपनाह हसरत लेने लगी थी।

कमरे का दरवाजा पहले ही बंद था और अब वहां सिर्फ उन दोनों की भारी होती सांसों की आवाजें गूंज रही थीं, समीर ने धीरे से रिया के सूट की जिप खोली और उनका बदन धीरे-धीरे आजाद होने लगा। जैसे ही रिया का सूट नीचे गिरा, उनके दूध जैसे सफेद तरबूज पूरी तरह सामने आ गए, जिनके ऊपर लगे गुलाबी मटर ठंड और उत्तेजना की वजह से अकड़ चुके थे। समीर ने अपनी जुबान से उन मटरों को सहलाना और हल्के से दांतों से दबाना शुरू किया, जिससे रिया दीदी का पूरा बदन धनुष की तरह ऊपर की ओर तन गया। रिया ने समीर के बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ लिया और अपनी पीठ को सोफे से सटाते हुए समीर को अपने और करीब खींचने लगी, जैसे वह चाहती हो कि समीर उन्हें अपने भीतर समा ले।

समीर ने अब रिया की सलवार को भी नीचे उतार दिया और उसके सामने रिया दीदी का वह रहस्यमयी खजाना था जिसे देखने के लिए वह कब से तड़प रहा था। रिया की खाई के ऊपर काले और रेशमी बाल थे जो उस जगह की सुंदरता को और बढ़ा रहे थे, समीर ने अपनी उंगलियों से उन बालों को सहलाया और फिर अपनी उंगली से उस नम खाई की गहराई को टटोलने लगा। रिया दीदी की आंखों से अब प्यास छलक रही थी और उन्होंने समीर के पैंट की चेन खोलकर उसके अंदर छिपे गर्म और सख्त खीरा को बाहर निकाल लिया। रिया ने जैसे ही उस विशाल खीरा को अपने हाथ में लिया, समीर की आंखों के आगे अंधेरा छा गया और वह सुख की एक अलग ही दुनिया में पहुंच गया जहां सिर्फ अहसास थे।

रिया ने कुछ देर तक समीर के खीरा को प्यार से सहलाया और फिर उसे अपने मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दिया, वह उसे इस तरह स्वाद लेकर चाट रही थी जैसे कोई कीमती फल हो। समीर के मुंह से आहें निकलने लगीं और उसे महसूस हुआ कि अब वह और ज्यादा बर्दाश्त नहीं कर पाएगा, उसे उस खाई में उतरने की सख्त जरूरत महसूस होने लगी। उसने रिया को बिस्तर पर लिटाया और उनके पैरों को फैलाकर उनकी खाई के मुहाने पर अपना गर्म खीरा टिका दिया। रिया ने समीर के कूल्हों को पकड़कर उसे इशारा किया और समीर ने एक ही झटके में अपना पूरा खीरा रिया की तंग और गीली खाई के अंदर उतार दिया, जिससे रिया की एक लंबी चीख निकल गई।

शुरुआत में रिया को थोड़ी तकलीफ हुई लेकिन जैसे ही समीर ने सामने से खोदना (missionary) शुरू किया, वह दर्द धीरे-धीरे एक बेमिसाल मजे में तब्दील होने लगा। समीर का हर धक्का रिया के शरीर को हिलाकर रख देता था और उसके तरबूज हवा में किसी गेंद की तरह उछल रहे थे जिन्हें समीर अपने हाथों से मसल रहा था। समीर अब अपनी पूरी ताकत से उस खाई को खोद रहा था और रिया भी नीचे से अपनी कमर ऊपर उठाकर उसका पूरा साथ दे रही थी। कमरे में जिस्मों के टकराने की आवाजें और रिया की सिसकारियां मिलकर एक कामुक संगीत पैदा कर रही थीं जिसे सुनकर दोनों की उत्तेजना सातवें आसमान पर पहुंच गई थी।

समीर ने अब रिया को घुमाया और उन्हें बिस्तर पर घुटनों के बल खड़ा कर दिया ताकि वह पिछवाड़े से खोदना (doggy style) शुरू कर सके। इस स्थिति में समीर का खीरा और भी गहराई तक जा रहा था और रिया दीदी का पिछवाड़ा समीर के धक्कों से लाल हो चुका था लेकिन वे और ज्यादा की मांग कर रही थीं। रिया बार-बार कह रही थी, ‘समीर और जोर से खोदो, आज मुझे पूरी तरह अपना बना लो।’ समीर ने उनकी कमर पकड़कर अपनी रफ्तार और बढ़ा दी, उसका खीरा अब रिया की खाई की आखिरी दीवारों को छू रहा था और दोनों का पसीना आपस में मिल चुका था।

अचानक समीर को महसूस हुआ कि उसका रस अब निकलने ही वाला है और ठीक उसी वक्त रिया का शरीर भी बुरी तरह कांपने लगा। रिया की खाई ने समीर के खीरा को चारों तरफ से कसकर जकड़ लिया और रिया ने चिल्लाते हुए अपना रस छोड़ दिया, जिसके ठीक बाद समीर का भी गर्म रस फव्वारे की तरह रिया की खाई के अंदर भर गया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े, उनकी सांसें अब भी तेज थीं लेकिन मन में एक असीम शांति और संतुष्टि थी। उस दिन की उस खुदाई ने उन दोनों के बीच के रिश्ते को हमेशा के लिए बदल दिया था, अब वहां कोई पर्दा नहीं था, बस एक-दूसरे के जिस्म की महक और वो यादें थीं जो उम्र भर उनके साथ रहने वाली थीं।

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