संजना भाभी का व्यक्तित्व किसी मादक कविता जैसा था जिसे पढ़ते ही मन में हलचल मच जाए। उनकी उम्र करीब बत्तीस साल थी, लेकिन उनके शरीर की बनावट अभी भी किसी मदहोश कर देने वाली सुराही की तरह ढली हुई थी। उनकी सांवली रंगत पर जब पसीने की बूंदें चमकती थीं, तो ऐसा लगता था जैसे कुंदन पर ओस गिरी हो। वह घर में अक्सर ढीली सूती साड़ी पहनती थीं, लेकिन उस कपड़े के नीचे उनके भारी और रसीले तरबूज हमेशा अपनी मौजूदगी का अहसास कराते रहते थे। जब भी वह चलती थीं, उनके पिछवाड़े का उभार एक लयबद्ध तरीके से हिलता था, जिसे देख कर मेरे मन में अजीब सी अशांति पैदा हो जाती थी। उनके नैन-नक्श तीखे थे और उनकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी जो किसी को भी खुद में डुबो लेने का दम रखती थी। संजना भाभी न केवल शारीरिक रूप से सुंदर थीं, बल्कि उनका स्वभाव भी बहुत कोमल और ममतामयी था, जिसने मेरे मन में उनके प्रति सम्मान और दबी हुई चाहत का एक अनूठा मिश्रण पैदा कर दिया था।
मेरे और भाभी के बीच एक ऐसा रिश्ता था जो शब्दों से परे था। मेरे बड़े भाई शहर से बाहर काम करते थे, इसलिए घर की सारी जिम्मेदारी मुझ पर और भाभी पर ही थी। धीरे-धीरे हमारी बातचीत में एक सहजता आने लगी थी। मैं अक्सर रसोई में उनकी मदद करने के बहाने घंटों उनके पास खड़ा रहता था। जब वह आटा गूंथती थीं, तो उनके हाथों के झटकों के साथ उनके तरबूज ऊपर-नीचे होते थे, जिसे देखना मेरे लिए किसी दिव्य अनुभव से कम नहीं था। उनकी साड़ी का पल्लू जब कभी उनके कंधे से फिसल जाता, तो मेरी नजरें उनके उन उभारों पर टिक जातीं जहाँ ब्लाउज के भीतर से तरबूज झांक रहे होते थे। भाभी मेरी नजरों को भांप लेती थीं, लेकिन वह कभी गुस्सा नहीं करती थीं, बल्कि उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ जाती थी जो मेरे हौसले को और बढ़ा देती थी। वह प्यार भरी झिड़की देतीं तो मेरा दिल और जोर से धड़कने लगता था।
उस दोपहर घर में कोई नहीं था और बाहर सूरज आग उगल रहा था। कूलर की ठंडी हवा के बीच संजना भाभी सोफे पर लेटी हुई थीं। उनकी साड़ी कमर के पास से काफी सरक गई थी, जिससे उनका गोरा पेट और गहरी नाभि साफ नजर आ रही थी। मैं पास ही बैठा एक किताब पढ़ने की कोशिश कर रहा था, लेकिन मेरा ध्यान पूरी तरह से उनके शरीर के उन उतार-चढ़ाव पर था। उनके सांस लेने के साथ उनके तरबूज धीरे-धीरे ऊपर और नीचे हो रहे थे। कमरे में एक अजीब सी खामोशी और उत्तेजना भरी हुई थी। मेरा मन कर रहा था कि मैं आगे बढ़कर उनकी नाभि को छू लूं, लेकिन मन में एक डर भी था। अचानक भाभी ने आँखें खोलीं और मुझे अपनी ओर निहारते हुए पाया। उन्होंने न तो साड़ी ठीक की और न ही नजरें हटाईं, बस एक गहरी सांस ली और धीरे से बोलीं, ‘अकेले क्या देख रहे हो अर्जुन? क्या तुम्हें प्यास लगी है?’ उनके उस एक वाक्य ने मेरी सारी झिझक मिटा दी।
मैं धीरे से उनके पास सोफे पर बैठ गया और उनके हाथ को अपने हाथ में ले लिया। उनकी हथेलियाँ बहुत नरम और गर्म थीं। मैंने धीरे से उनके हाथ को चूमना शुरू किया, जिससे उनके शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। भाभी ने अपनी आँखें मूंद लीं और एक लंबी कराह भरी। मैंने अपना हाथ बढ़ाकर उनके चेहरे को सहलाया और फिर धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ते हुए उनकी साड़ी के पल्लू को पूरी तरह से हटा दिया। अब उनके तरबूज ब्लाउज में कैद होकर फड़फड़ा रहे थे। जैसे ही मैंने अपने हाथ उनके तरबूजों पर रखे, उन्होंने जोर से मेरा नाम पुकारा, ‘अह्ह्ह अर्जुन… ये तुम क्या कर रहे हो?’ लेकिन उनके स्वर में मनाही नहीं बल्कि एक तीव्र पुकार थी। मैंने उनके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने शुरू कर दिए। जैसे ही अंतिम हुक खुला, उनके विशाल और दुधिया तरबूज आजाद होकर बाहर आ गए। उनके ऊपर छोटे-छोटे गुलाबी मटर बिल्कुल सख्त हो चुके थे, जो उनकी उत्तेजना की गवाही दे रहे थे।
मैंने बिना देर किए अपना मुंह उनके एक तरबूज पर जमा दिया और मटर को अपनी जुबान से सहलाने लगा। भाभी ने मेरे सिर को जोर से अपने सीने से चिपका लिया और उनके मुंह से सिसकारियां निकलने लगीं। वह बार-बार कह रही थीं, ‘ओह अर्जुन, तुम तो बहुत भूखे निकले… कितना तड़पाया है तुमने मुझे।’ मैंने दूसरे हाथ से उनके पिछवाड़े को सहलाना शुरू किया जो बहुत ही गदबदा और मुलायम था। मैंने उनकी साड़ी और पेटीकोट को धीरे-धीरे उनके पैरों से नीचे उतार दिया। अब वह मेरे सामने बिल्कुल प्राकृतिक अवस्था में थीं। उनके गुप्त अंगों के पास हल्के बाल बिखरे हुए थे जो उनकी सुंदरता को और बढ़ा रहे थे। उनकी खाई से अब रस निकलने लगा था, जिसकी महक पूरे वातावरण को और भी ज्यादा कामुक बना रही थी। मैंने अपना हाथ नीचे ले जाकर उनकी खाई में उंगली डाली, तो वह गर्म और गीली महसूस हुई। भाभी ने अपनी कमर ऊपर उठाई और मेरे चेहरे को अपनी खाई के पास खींच लिया।
मैंने अपनी जुबान से उनकी खाई चाटना शुरू किया, तो वह पागलों की तरह तड़पने लगीं। ‘हाँ अर्जुन… वहीं… आह्ह्ह… कितना मजा आ रहा है… और तेज करो,’ वह चिल्ला रही थीं। मैंने अपनी जुबान को उनकी खाई के अंदर तक ले जाने की कोशिश की, जिससे उनके शरीर का कोना-कोना कांप उठा। उनकी खाई का रस मेरे मुंह में भर गया था जो बहुत ही मीठा और नशीला था। अब मेरी अपनी उत्तेजना भी चरम पर थी। मैंने अपनी पेंट उतारी और मेरा सात इंच का खीरा पूरी तरह से अकड़ कर बाहर निकल आया। भाभी ने जैसे ही मेरे खीरे को देखा, उनकी आँखें फटी की फटी रह गई। उन्होंने अपने कोमल हाथों से मेरे खीरे को पकड़ा और उसे सहलाने लगीं। फिर उन्होंने धीरे से मेरा खीरा मुंह में लेना शुरू किया। उनके गर्म मुंह के अंदर खीरे का अहसास इतना जबरदस्त था कि मुझे लगा मेरा रस अभी निकल जाएगा।
भाभी ने कुछ देर तक मेरा खीरा चूसना जारी रखा और फिर वह सोफे पर ही लेट गईं। उन्होंने अपनी टांगें फैला दीं और मुझे अपने ऊपर आने का इशारा किया। मैंने उन्हें सामने से खोदना शुरू करने का फैसला किया। जैसे ही मैंने अपने खीरे की नोक उनकी खाई के द्वार पर रखी, भाभी ने एक लंबी सांस ली। मैंने धीरे से दबाव डाला और मेरा आधा खीरा उनकी तंग खाई के अंदर समा गया। वह दर्द और आनंद के मिश्रित अहसास से कराह उठीं, ‘आह्ह्ह… धीरे अर्जुन… बहुत बड़ा है तुम्हारा खीरा… फाड़ दोगे क्या?’ मैंने उनके होठों को चूमते हुए अपनी गति बढ़ा दी। धीरे-धीरे पूरा खीरा उनकी खाई की गहराइयों को छूने लगा। हम दोनों के शरीरों के बीच पसीने की वजह से एक चिपचिपाहट पैदा हो गई थी। हर धक्के के साथ उनके तरबूज जोर-जोर से हिल रहे थे और कमरे में ‘चप-चप’ की आवाज गूंज रही थी।
कुछ देर सामने से खोदने के बाद मैंने उन्हें पलटने के लिए कहा। वह घुटनों के बल बैठ गईं और अपना भारी पिछवाड़ा मेरी ओर कर दिया। यह दृश्य इतना उत्तेजक था कि मेरा खीरा और भी ज्यादा सख्त हो गया। मैंने पीछे से उनके पिछवाड़े को पकड़कर फिर से अपनी खुदाई शुरू की। पिछवाड़े से खोदना उन्हें और भी ज्यादा आनंद दे रहा था। वह जोर-जोर से चिल्ला रही थीं, ‘हाँ अर्जुन… ऐसे ही… आज अपनी भाभी को पूरी तरह से खोदो… छोड़ना मत मुझे।’ मेरी गति अब बहुत तेज हो गई थी। हम दोनों ही चरम सुख के करीब थे। भाभी की खाई अब पूरी तरह से रसीली हो चुकी थी और मेरा खीरा उसमें फिसल रहा था। अचानक भाभी का पूरा शरीर अकड़ गया और उनकी खाई से भारी मात्रा में रस निकलना शुरू हुआ। वह जोर से चिल्लाईं और निढाल हो गईं। ठीक उसी पल मेरा भी सब्र टूट गया और मैंने अपना सारा गर्म रस उनकी खाई की गहराइयों में छोड़ दिया।
खुदाई खत्म होने के बाद हम दोनों काफी देर तक एक-दूसरे की बाहों में बंधे रहे। कमरा शांत था, सिर्फ हमारी भारी सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। भाभी के चेहरे पर एक गजब का सुकून और चमक थी। उन्होंने मेरे माथे को चूमा और धीरे से बोलीं, ‘आज तुमने मुझे एक नई जिंदगी दी है अर्जुन। मैंने कभी नहीं सोचा था कि तुम मुझे इतना सुख दोगे।’ हम दोनों के बीच का वह डर और झिझक अब पूरी तरह से खत्म हो चुकी थी। उनकी हालत अभी भी वैसी ही थी, बिखरे हुए बाल और पसीने से लथपथ बदन। हमने एक-दूसरे को फिर से ढक लिया, लेकिन हम जानते थे कि अब यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है। वह शाम हमारे लिए सिर्फ एक शारीरिक मिलन नहीं थी, बल्कि यह हमारे दिलों के जुड़ाव की एक नई शुरुआत थी, जहाँ हमने समाज की बंदिशों को पीछे छोड़कर अपनी इच्छाओं को प्राथमिकता दी थी।