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अजनबी पड़ोसन की चु@@ई

अजनबी पड़ोसन की चु@@ई—>शहर की उस शोर-शराबे वाली रात में जब सन्नाटा धीरे-धीरे अपनी चादर फैला रहा था, रोहन अपनी बालकनी में खड़ा ठंडी हवा के झोंकों का आनंद ले रहा था। रोहन एक छरहरा और गठीले बदन वाला नौजवान था जिसकी उम्र करीब छब्बीस वर्ष थी। तभी उसकी नजर सामने वाली बालकनी पर पड़ी जहाँ उसकी नई पड़ोसन कविता खड़ी थी। कविता की उम्र करीब पैंतीस साल रही होगी, लेकिन उसका यौवन किसी कच्ची कली की तरह खिला हुआ था। उसने गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी, जिसमें उसके शरीर के उतार-चढ़ाव साफ झलक रहे थे। उसकी साड़ी के नीचे दबे हुए भारी और गोल तरबूज बालकनी की रेलिंग से टिके हुए थे, जिससे उनकी गोलाई और भी उभर कर सामने आ रही थी।

कविता का शरीर किसी तराशी हुई मूरत जैसा था, जिसके हर अंग में एक अजीब सी कशिश थी। उसके तरबूज इतने बड़े और रसीले लग रहे थे कि रोहन की नजरें उन पर से हट ही नहीं रही थीं। साड़ी के पल्लू से झांकते हुए उसके पेट की चिकनाई और गहरी नाभि रोहन के मन में हलचल पैदा कर रही थी। कविता ने जब पीछे मुड़कर देखा, तो उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जैसे वह भी किसी अपनेपन की तलाश में हो। उसके चेहरे पर बिखरी लटें और उसकी भीनी-भीनी खुशबू हवा के साथ उड़कर रोहन के नथुनों तक पहुँच रही थी, जिससे उसके शरीर के भीतर एक अनजानी सी गर्मी दौड़ने लगी।

दोनों की नजरें मिलीं और एक मूक संवाद शुरू हो गया। कविता ने हल्की सी मुस्कान के साथ रोहन को अंदर आने का इशारा किया। रोहन का दिल जोरों से धड़कने लगा, उसकी धड़कनें किसी नगाड़े की तरह उसके सीने में गूंज रही थीं। वह बिना सोचे-समझे कविता के घर के दरवाजे पर पहुँच गया। दरवाजा आधा खुला था, जैसे उसका ही इंतजार हो रहा हो। अंदर कदम रखते ही रोहन ने देखा कि कविता सोफे पर बैठी थी, जहाँ उसकी साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसक गया था और उसके तरबूजों के बीच की गहरी घाटी साफ नजर आ रही थी। रोहन के शरीर में उत्तेजना का संचार होने लगा और उसका खीरा उसकी पैंट के भीतर अंगड़ाइयां लेने लगा।

रोहन धीरे से कविता के पास जाकर बैठ गया। कविता की सांसों की गर्माहट उसे अपने चेहरे पर महसूस हो रही थी। कविता ने अपना हाथ रोहन के हाथ पर रखा, तो रोहन के पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई। उसने महसूस किया कि कविता का शरीर भी वासना की आग में तप रहा है। रोहन ने हिम्मत जुटाकर अपना हाथ कविता की कमर पर रखा और उसे धीरे-धीरे सहलाने लगा। कविता ने अपनी आँखें मूंद लीं और एक गहरी आह भरी। उसके चेहरे पर छाई शर्म और हया अब धीरे-धीरे कम हो रही थी और उसकी जगह एक गहरी प्यास लेती जा रही थी।

रोहन ने अपना चेहरा कविता के करीब लाया और उसके कानों के पास फुसफुसाते हुए कहा, “तुम बहुत सुंदर हो कविता, तुम्हारी खुशबू मुझे पागल कर रही है।” कविता ने जवाब में रोहन के गले में अपनी बाहें डाल दीं और उसे अपनी ओर खींच लिया। अब दोनों के बीच की दूरी खत्म हो चुकी थी। रोहन ने कविता के होठों का रस चखना शुरू किया, तो उसे ऐसा लगा जैसे वह जन्नत के किसी झरने से अमृत पी रहा हो। उसके हाथ अब कविता के ब्लाउज के ऊपर से उसके भारी तरबूजों को सहला रहे थे, जो उसके स्पर्श से और भी कड़े होते जा रहे थे।

जैसे-जैसे स्पर्श गहरा होता गया, रोहन ने कविता के ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने शुरू कर दिए। जैसे ही अंतिम हुक खुला, कविता के सफेद और चमकदार तरबूज आज़ाद होकर बाहर आ गिरे। उनके ऊपर मौजूद छोटे-छोटे मटर ठंड और उत्तेजना के कारण पत्थर की तरह सख्त हो चुके थे। रोहन ने अपनी जीभ से उन मटरों को सहलाया, जिससे कविता के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली कराह निकली। वह रोहन के बालों में अपनी उंगलियां फँसाकर उसे अपने और करीब खींचने लगी, जैसे वह चाहती हो कि रोहन उसके पूरे वजूद को अपनी गिरफ्त में ले ले।

रोहन ने अब अपना ध्यान नीचे की ओर लगाया और कविता की साड़ी की गांठ खोल दी। रेशमी कपड़ा सरक कर फर्श पर गिर गया, जिससे कविता का पूरा बदन निर्वस्त्र होकर उसके सामने आ गया। उसकी टांगों के बीच घने बालों से ढकी हुई वह गहरी खाई किसी रहस्मयी गुफा की तरह लग रही थी, जो पूरी तरह से गीली हो चुकी थी। रोहन ने अपनी उंगली से उस खाई को टटोलना शुरू किया, तो उसे वहां की चिकनाहट और गर्मी ने और भी उत्तेजित कर दिया। कविता की खाई से निकलने वाला प्राकृतिक रस अब उसकी जांघों तक बहने लगा था, जो इस बात का सबूत था कि वह पूरी तरह तैयार है।

रोहन ने अपनी पैंट उतारी और उसका फौलादी खीरा अब पूरी तरह से सीधा खड़ा था। कविता ने जैसे ही उस विशाल खीरे को देखा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाकर उस खीरे को थामा और उसे सहलाने लगी। फिर उसने बिना देर किए उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे चूसने लगी। रोहन को लगा जैसे उसके प्राण निकल जाएंगे, वह आनंद के चरम पर था। कविता की जीभ और तालू का स्पर्श उस खीरे पर जादू की तरह काम कर रहा था। कुछ देर बाद रोहन ने उसे रोका और उसे बिस्तर पर लेटा दिया।

अब खुदाई का असली वक्त आ चुका था। रोहन ने कविता की दोनों टांगों को अपने कंधों पर रखा और अपने खीरे की नोक को उस गीली खाई के मुहाने पर टिका दिया। एक गहरे झटके के साथ उसने अपना आधा खीरा उस तंग खाई के भीतर उतार दिया। कविता के मुँह से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि बेइंतहा सुख की थी। उसने अपने नाखून रोहन की पीठ में गड़ा दिए। रोहन ने धीरे-धीरे अपनी रफ्तार बढ़ानी शुरू की और सामने से खोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे, जो एक अद्भुत दृश्य पेश कर रहे थे।

कमरे में केवल उनके जिस्मों के टकराने की आवाज़ और भारी सांसें गूँज रही थीं। रोहन का खीरा पूरी तरह से उस खाई की गहराइयों को नाप रहा था। कविता बार-बार कह रही थी, “रोहन, मुझे और जोर से खोदो, आज मुझे पूरी तरह अपना बना लो।” रोहन ने उसकी इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी रफ्तार को और तेज कर दिया। वह अब पागलों की तरह उस खाई की खुदाई कर रहा था। पसीने की बूंदें उनके शरीरों से फिसलकर बिस्तर को भिगो रही थीं, लेकिन उन्हें किसी बात की परवाह नहीं थी। वे दोनों बस उस पल में खो जाना चाहते थे।

कुछ देर बाद रोहन ने कविता को पलटा दिया और उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। यह तरीका और भी आनंददायक था क्योंकि अब रोहन को कविता के चौड़े पिछवाड़े और उसकी खाई का एक साथ आनंद मिल रहा था। वह अपने हाथों से उसके तरबूजों को मसलते हुए पीछे से धक्के मार रहा था। कविता घोड़ी बनी हुई अपनी कमर को नीचे की ओर झुकाए हुए थी और हर प्रहार पर जोर-जोर से कराह रही थी। उसकी आहें अब सिसकियों में बदल रही थीं, जो इस बात का संकेत था कि वह अपने रस छूटने के करीब पहुँच रही है।

अंततः वह क्षण आ गया जब दोनों का सब्र जवाब दे गया। रोहन ने अपनी रफ्तार को अपनी चरम सीमा तक पहुँचा दिया और कविता की खाई के भीतर अपने खीरे को पूरी गहराई तक घुसा दिया। एक जोरदार झटके के साथ रोहन का सारा सफेद रस कविता की खाई की गहराइयों में छूटने लगा। उसी समय कविता का भी रस निकल गया और उसका पूरा बदन थरथरा उठा। वह बिस्तर पर निढाल होकर गिर पड़ी। रोहन भी उसके ऊपर ही लेट गया, दोनों की सांसें अब भी तेज थीं लेकिन उनमें एक अनोखी शांति और संतुष्टि थी।

खुदाई खत्म होने के बाद कमरे में एक मीठा सन्नाटा पसर गया। रोहन ने कविता को अपनी बाहों में भर लिया और उसके माथे को चूमा। कविता की आँखों में खुशी के आँसू थे, उसने महसूस किया कि आज उसे वह सुख मिला है जिसकी उसे बरसों से तलाश थी। उसके शरीर का हर हिस्सा अब भी कंपन कर रहा था, और उसकी खाई में अभी भी रोहन की गर्माहट महसूस हो रही थी। दोनों एक-दूसरे से लिपटे रहे, जैसे वक्त को वहीं रोक देना चाहते हों। इस अजनबी मुलाकात ने उनके बीच एक ऐसा रिश्ता बना दिया था जिसे शब्द बयां नहीं कर सकते थे।

पूरी रात वे इसी तरह एक-दूसरे के प्यार में डूबे रहे। रोहन ने महसूस किया कि यह केवल शारीरिक भूख नहीं थी, बल्कि दो अकेलेपन का एक-दूसरे में समा जाना था। कविता का वह कोमल स्पर्श और उसके शरीर की वह खुशबू रोहन की रूह में बस गई थी। सुबह की पहली किरण जब खिड़की से अंदर आई, तो उन्होंने एक-दूसरे की आँखों में देखा और समझ गए कि यह सफर अभी खत्म नहीं हुआ है। उनके बीच की वह खुदाई केवल एक शुरुआत थी, एक ऐसी कहानी की जिसे वे हर रात दोहराना चाहते थे।

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